मुद्रा और तानाशाही


मैं
और मेरे आईने
वे सब
केवल आईने

मैं अपने आप को देखता हूँ उनमें
वे मैं ही तो हैं
वे मुझमें

जो नहीं
पता नहीं

कोई नहीं

मैं
और
कुछ नहीं

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सहारा


जब अपने ही लोग पराये हो जाएँ
तो ये मत समझो कोई नहीं है तुम्हारा
तुम्हारा सुरक्षाकवच छल ले कोई
तो ये मत समझो कहीं नहीं है सहारा

मीलों तक फैले रास्ते कितने हैं जिनको
बसेरा कहीं नहीं मिला आओ देखो
ये सभी तुम्हारी तरह ही हैं सूर्यपुत्र
सूतपुत्र और बेबस महिलाओं के बच्चे

तपती धरती ने इनको पाला है संभाला है
सूरज की किरणों ने चलना सिखाया है
जीवन से मरने तक जलते ही रहना
हलाहल इस सृष्टि ने ऐसा पिलाया है

ऐसा नहीं है ये जानते नहीं हैं
अपने पराये में फर्क करते नहीं हैं
ये आना और जाना इन्हें सब पता है
सदियों से चलती आई कथा है

तुम आओ सही और अपने को जानो
आग़ोश में इनके मिलता सहारा
जब धरती फटेगी फिर बादल छँटेगा
कहाँ होगा ये हमारा तुम्हारा

***
सड़क पर आओ तो सही फेंक दो सभी
सहारे जो बांधते हैं तुम्हें तुम्हें आश्रित
करते हैं छीनते हैं तुमको तुमसे तुममें
सूर्य है भस्म करता नवजीवन दान देता

प्रेस क्लब में


क्या हो गया है इन चेहरों को जो
भिज्ञता और संयम के प्रतीक थे
कि उनके सामने फटकना
मुश्किल था आज वे ऐसे क्यों हो गए

हर बात पर तुनकते जैसे
लगता है कि इनकी आवाज़
दब रही है भीड़ में स्वयं को
देख कर घबरा से गए हैं

अपने आप को खोते उसमें जहाँ
कोई नहीं है पहचानने वाला
भीड़ है सतत एक होती
फिर बिखरती मारती मरती

बस क्या हुआ क्या हो रहा है
क्या होने वाला है यही चर्चा
कोई नहीं जानता क्यों हो रहा
सारा तर्क वितर्क खो रहा है

कैसा ये न्याय न्यास


हे इंद्रदेव, हे मेघराज
तुम देवों के राजाधिराज
राक्षस समाज ने अमृत मथ
वचनानुकूल बाँटा तुमसे

पर कैसा ये न्याय न्यास
सत्ता की कैसी अंध प्यास
तुम देवों की कमज़ोर शक्ति
उतनी ही तेज़ चतुर भक्ति

तुम पर आसक्त विष्णु प्रधान
राक्षस गण थे बिल्कुल अजान
दे दिया मोहिनी को अमृत धन
हुए तभी वे पातालवासिनः

महाबली गौरव विराट
त्रिलोक जीत बन गए सम्राट
तुम अमरदेव साष्टांग किए
भगवन के चरणों में गिरते

फिर हुए अवतरित लघु वामन
और सत्यभक्त का हुआ परीक्षण
त्रिलोक लाँघ कर किया प्रतिष्ठित
देवों को निष्कासित सज्जन

(ओणम, २०१९)

ग्राफ


ये ग्राफ अब नीचे की तरफ मुँह बाये सरपट दौड़ रहा है
क्या क्या संकुचित होगा नष्ट होगा इतिहास से हम जानते हैं

मगर इतिहास ये नहीं तय करता कि हम क्या करेंगे
ये हमें ही बताना होगा कि इतिहास से हमने क्या सीखा

क्या हम वो गलतियाँ दोहराएँगे और इतिहास एक बार
फिर सेअपने रास्ते चलेगा इसी मोड़ पर पहुँचने के लिए

रेखाओं का खेल


लक्ष्मण बारबार रेखाएँ खींचता है मगर सीता
लांघ देती है उन रेखाओं को नए के अनुराग में
राम का रोष नई चढ़ाइयाँ चढ़ता है सीता के लिए
और सीता को बारबार अग्निपरीक्षा देनी होती है
साबित करनी होती है अपनी पवित्रता कि आज भी
है व्रता वो राम के स्वामित्व की कदमों की दासी

क्या गुदगुदी होती है पृथ्वी को जब जमीन पर
रेखाएँ बनाते हैं ये लोग और मिटाते हैं कुछ और
हँसी तो ज़रूर आती होगी इस खेल को देख कर
आसमान भी कहता होगा ये कौन सा खेल खेलते हैं
सदियों से कितनी बार रेखाएं बदलीं और खून से
सनी मिट्टी क्या मज़ा इस खेल में आता है इनको

सत्ता के घोड़े – एक कविता


ज्ञान मानचित्र की रेखाओं को नहीं मानता
न वे उसको बांध सकते हैं
इसीलिए तो वे ज्ञान की बात नहीं करते
यान की बात करते हैं

तुम सत्ता के घोड़े हो
तुम पर लद के नई ऊँचाइयाँ चढ़ेगी वो
मिलने जाएगी चंद्रमा की बुढ़िया से
जीतने जाएगी राहु को
कहीं ग्रहण न लगा दे उसके भविष्य को
आखिर भगवान को भी माननी पड़ी उसकी शक्ति
अलग करना पड़ा उसके सिर को उसके धड़ से
मस्तिष्क को शारीरिक बल से
कहीं उखाड़ न दे देवताओं का वैभव जड़ से

भगवान को भी मानना पड़ा अमरत्व उसका
जिसने छल लिया था छलिया को
उसको जिसने छल से परिश्रमी राक्षसों के
परिश्रम को पिला दिया देवों को
जो हमेशा हारते रहे मैदानों में
भागते रहे सत्ता के वीरानों में

तभी तो डरते हैं
राहु को केतु से मिलने नहीं देते
सत्ता इसी अलगाव को ही कहते हैं

सत्ता ने तुम्हें अदना बना दिया है
तुम्हारी उड़ान को लगाम पहना दिया है
अब तुम जहाँ भी जाओगे सत्ता तुम पर लदी होगी
मिमियाते तुम खड़े होगे
सारी गलतियाँ तुम्हारे सिर होगी
और जीत उसकी
उसकी थपथपाहट तुम्हारा पारिश्रमिक
उसका पुचकारना तुम्हारा ईनाम

देश देख रहा था उस दिन
और तुम सुन रहे थे उसके मन की बात
स्कूली बच्चों की तरह
तुम्हें सिखा रही थी सत्ता
बता रही थी मतलब तुम्हें तुम्हारा
और उसकी चढ़ाइयों का

और तुम इतराते
सत्ता को अपने करीब पाते