भूत का शासन


दशकों तक धज्जियाँ उड़ाई
टुकड़े-टुकड़े कर
खुद खाई औरों को खिलाई

अब आत्मा भूत बन गई है तो
कहीं भी किसी में भी समा जाती है
नफरत है बस अंधियारा है
किसी के चेहरे पर भी छा जाती है
साँसों से होती हुई दिल में आ जाती है

जो है उसका मान नहीं
भूत है वर्तमान नहीं
उसे तो बस मिटाना है
वर्तमान को भूत बनाना है

घटना


“नहीं, ऐसे काम नहीं चलेगा –
ज़िन्दगी को अखबार बनाकर पढ़ते रहना!
कोई-न-कोई तो बता ही देगा वह रास्ता
जिस पर घटनाएँ मिलती हैं”
भारतभूषण अग्रवाल

घटनाएँ होती थीं मगर अब नहीं
अब तो स्क्रीन पर फैलती सिकुड़ती
ज्यामितिक रेखाएँ हैं
और उनके पीछे अदृश्य फार्मूलें

जितनी भी खूबसूरत या
भयंकर खबरें हैं
उनके तह में यही फार्मूलें हैं
और घटती बढ़ती चर राशियाँ
यही घटनाएँ हैं
और घटनाओं की अभिव्यक्तियाँ

और परत हटाएँ
तो उनके पीछे सर्किटों का अजीब सर्कस है
जो आदमी सुलझा नहीं सकते
मगर लगातार उलझते जाते हैं

और उनके पीछे अनगिनत लोग हैं
ज़िंदा और मुर्दा अपने खोह में समाए हुए
कब्र में दफ़नाए हुए
सभी से ओझल अपने आप से ओझल
उन्हें पता है कि वे खुद क्या करते हैं
मगर अनभिज्ञ हैं
इनसे क्या करते हैं

घटनाएँ कहाँ हैं
सामने होती हुईं
या उनके होने में खोती हुईं

तार टूट गए


कैसे फिर से एक नई लय बनाऊँगा

जो बनी थी
और रखी थी सँजो कर मैंने

उस पर धूल और समय के बोझ
लदते चले गए

खबर ही नहीं थी
और तार टूट गए

फिर से तार तो जुड़ जाएँगे
मगर लय वह नहीं होगी

मगर क्या लय ही नहीं होगी
ऐसा तो नहीं

क्या खबर?


कोई खबर नहीं है वतन से
कि हमको आदत पड़ी है
कि हम सोते रहें और खबर मिल जाए

कि कल तक तो कोई चिंता नहीं थी
खबर भी नहीं थी
जरूरत नहीं थी

सिर पर बहुत बोझ आन पड़ा था
मुश्किल में खुद ही कल तक पड़ा था
आज अब मौका मिला है

खबर खोजते हैं
जिनके सहारे
अपनी खबर हम खुद को सुनाएँ

हवा तो निकलनी ही है


समय पर बांध सत्ता है वो भ्रम है
नहीं क्योंकि वो सत्य नहीं है ऐसा नहीं है
वह सत्य है मगर शाश्वत नहीं है
बांध को टूटना ही है उसको टूटना ही होता है

समय दस्तक देता है घड़ी के टिकटिक की तरह
मगर समय घंटों के रहम पर नहीं है
घंटियाँ हमें सतर्क करती हैं
बांध कभी भी टूट सकता है

कितना सैलाब रोकोगे देख लो
उसका आक्रोश बढ़ता चला जाएगा
नतीजा हमारे हदों में नहीं है
उबलते पानी को भाप बनना ही है

समय को पहचानों हर मौसम के लिये
तैयार हो ऐसा हो नही सकता
तुमने कैलेण्डर बना लिया घड़ी बांध ली
तो सोचा समय को बांध लिया

समय का रूप ही क्या है बढ़ती धार है
अदृश्य तलवार है चक्र में क्या बांधोगे
सत्ता की हवा निकलनी ही है
आज नहीं तो कल हमें इंतज़ार है

समुन्दर के साथ (रूमी के सहारे: १)


साथ रहना, डूबना मत मछलियों जैसे
कहीं नींद में तुम।
बहते रहो रात भर समुन्दर के साथ,
मत बिखरना बारिशों की तरह।

जो बसंत हम खोजते हैं
यहीं कहीं छुपा है धुंध में।
देखो रात जगमगाती साथ चलती है,
दीपक अभी भी जागता है सोने की अपनी थाली में।

कहीं ज़मीन के दरारों में बिखरे पारों की तरह मत खोना।
जब चाँद नज़र आए तब देखना तुम।

तुम्हारा ही प्रतिरूप है


वह कहीं का नहीं है क्योंकि वह सब जगह है
वह कहीं का नहीं है इसीलिए वह सब जगह है
वह ऊपर और नीचे दोनों जगह अपनी टांगें जमाए हुए है
उसका यही योग श्रृंखलाओं में बांधे हुए है तुमको और उनको

उसकी विद्युत गति तुम्हें उसकी अगति और रूढ़िता लगती है
उसके चाल और पहनावे को ही देखते हो तुम
और उनमें तुम्हें असामंजस्य दिखता है
उसके परिष्कृत भोंडेपन में वैमनस्य दिखता है
उसे देख वैमनस्य जगता है

मगर वही है जो नीचे की आकांक्षाओं की घातकता को जानता है
और वही है जो उसको अपने में भर लेता है
एक मिसाइल की तरह एक ही छलांग में सीमा पार उसे छोड़ देता है
और कभी सीमा के अंदर भी इसकी जरूरत होती है

दूर विस्फोट का हल्का असर तुम पर भी पड़ता ही होगा
और तुम दुबक जाते हो
ध्यान नहीं है तुम्हें
तुम्हारी बौद्धिकता की गगनचुम्बी इमारतों की नींव अब भी नीचे ज़मीन के अंदर ही होती है
उसने तुम्हें बचाया है

उसने तुम्हें बचाया है
क्योंकि उसको तुम्हीं से प्यार है
वह तुममें से एक होना चाहता है
वह तुम्हारे भय और नीचे उभरते आक्रोश का औसत है
वह औसत आदमी की दबी आकांक्षाओं की मूर्ति है
वह तुम्हारा ही प्रतिरूप है
पहचानो उसे!