Beyond Capital

Polemics, Critique and Analysis

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मन की बात

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साहब बता रहे थे
अपने मन की बात
सब कुछ अच्छा ही बताया उन्होंने
कैसे वो पशुओं का दर्द समझते हैं
उनके लिए रोज़ अपने घर के आगे
गाछ के नीचे खाने पीने की सुविधा करते हैं

वो हरा भरा गाछ है
दिन में सैकड़ों पक्षियों की चहलकदमी रहती है
उनके अनूठे सुरसंगम का आनन्द लेने
कई जानवर भी आते हैं
छाँव का मज़ा लेने
कुत्ते बिल्लियों चूहे बिच्छु सांप छुछुंदर
और गिलहरियों के अलावे
कहाँ से शहर के मध्य रास्ता तय करती
आ रही हैं आजकल गायें
शायद साहब को आशीर्वाद देने के लिए

साहब ने बताया कैसे इन कार्यों से
ह्रदय ही नहीं होता स्वच्छ
धन भी गोरा नहीं तो सांवला हो ही जाता है
काला नहीं रहता
और व्यवहार कहता है
हमें बरबादियों से बचना है
क्या पता क्या कब किस काम आ जाए
चाहे वो पण्य हो या परंपरा

साहब हमेशा अच्छी बात ही बताते हैं
परीक्षा में पास होना भी सिखाते हैं
बताते हैं कि फेल करने से घबराना नहीं चाहिए
रास्ता निकल ही जायेगा
कुछ तो हो ही जायेगा
हमारी परंपरा ही है जुगाड़ की
हम कुछ भी बरबाद नहीं होने देते
ब्रह्माण्ड में सभी चीज़ें उपयोगी हैं
तभी तो गणेश हमारे सहयोगी हैं
कार्य शुरू करने का मतलब
हम श्री गणेश करते हैं
उन्हीं से शुभलाभ है
सब कुछ ठीक हो ही जायेगा
कुछ तो हो ही जायेगा

आज पूरे देश में गूँज है
इसी दर्शन की
इसी भावना ने साहब को बनाया है
इसी भावना ने साहब को चढ़ाया है
चोटी पर
अगर ये सच नहीं
तो कुछ और ही होगा
कुछ तो होगा
अगर मार्स नहीं तो चन्द्रमा होगी
कुछ तो होकर रहेगा
कुछ तो होते रहेगा

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Written by Pratyush Chandra

August 11, 2019 at 12:27 am

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सत्ता की रात – कुछ कविताएँ

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सत्ता की रात में

हे उदारपंथियों
पहचानो
ये तुम्हीं हो
तुम्हारा ही विकृत रूप है
नशे में धुत्त
तुमने कर दिखाया
जो तुम्हें पहले कर दिखाना था
सही दिमाग़ से
बिन पगलाये
तुम इसको कर सकते थे
मगर तुम्हें हिम्मत कहाँ थी
समय ही कहाँ था
मठाधीशों में तिकड़म भिड़ाने से
तो लो सत्ता की रात में
मदहोश हो
मठाधीशों में मठाधीशी जमाने के लिए
एक नया चिलम चढ़ा कर
किया है वही जो तुम्हें करना था
मगर विकृत रूप में

आत्ममुग्ध

1
सत्ता के पौध हैं
सत्ता के गलियारे में ही खिलेंगे
माली बदल जाए पर वे न बदलेंगे
वे यहीं उगते हैं
सत्ता है तो वे हैं
पर उन्हें मुगालता है कि वे हैं तो सत्ता है

2
किसी को खुशफहमी पालने से
कौन रोक सकता है भला
प्रजा सोचती है उसका तन्त्र है
वे नहीं जानती कि वह मात्र यंत्र है

3
चाँद कहता भागा अंधेरा है
रात कहती तू मेरा है
सूर्य कहता रोशनी मेरी
अंतरिक्ष बस मुसका रहा

4
आत्ममुग्ध हैं सभी
आत्ममुक्त कुछ नहीं

दो भाई

हाथ में हथियार है
कौम की ललकार है
दिल मे धिक्कार है
साँप की फुफकार है

हाथ में हाथ है
साथियों का साथ है
सत्ता से प्यार है
उम्मीद शानदार है

तू

क्या हुआ
इतना कुछ हो गया लेकिन तू न हिला
समय को बदलते तूने देखा है
जीवनियों को मूर्ति होते पिघलते देखा है
क्या हुआ तुझको सब पता है
फिर भी तेरी धमनियों में खून ठंडा क्यों रहा

Written by Pratyush Chandra

August 7, 2019 at 1:06 am

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सरकार है सरकार के आगे झुको: पाँच कविताएँ

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महासभा

आज सूरज की तीव्रता,
आसमान के नीलेपन को ढांपते
बेमौसम कालिख कैसे पुत गई?
इतने गिद्ध और चील कहाँ से आ गए?
झोपड़ों, बहुमंजिलों और मैदानों पर मंडराते
मानो भक्षियों की विशाल महासभा हो रही है।
प्रतिनिधित्व के काँव काँव में
सड़कों और घरों की आवाजें दब गई हैं
जैसे मेजों पर रखे फाइलों के नीचे
जिंदा आदमी की ज़िन्दगी…

संसद में कविता

आज जब संसद में कविताओं की बारिश हो रही है
शब्द बेधड़क टपकते हैं
जैसे सिर पर ओले

हमें यह मान लेना चाहिये कि कविताओं के दिन लद गए
ये कविताएं नहीं नश्तर हैं
जो सीधे हमारी ओर बढ़ रहे
जहां आदमी और आदमियत
थक कर सड़ रहे

मगर इसके हर वार का जवाब हमारे पास है
हम उनके नश्तर का जवाब खाली कनस्तर से देंगे
जिनके शोर के आगे अच्छे अच्छे गामाओं को
हमने पिद्दी बनते देखा है
हमारी भूख के आगे कितने शेर को
गीदड़ बनते देखा है
भागते देखा है
अपने दुर्ग की ओर
फिर अन्दर से मुर्ग के शोर
अपना किला जगाने के लिए
बस्तियों में आग लगाने के लिए
भाइयों को लड़ाने के लिए
फिर पंचों में सरपंच बनने के लिए
कविताओं की बारिश हो रही है

नया आंदोलन

सुना है नया आंदोलन छिड़ेगा
स्वच्छता में तरलता लानी है
देवगण गाड़ियों से उतरेंगे
पेप्सी बिसलेरी रम स्कॉच के बोतलों में
अब बारिश का पानी है

बूंद बूंद बटोरेंगे
पानी राष्ट्र निर्माण के लिये बचाना है
बिसलेरी बहुत महंगा है
हम सस्ता पानी बेचेंगे
हम वैदिक पानी बेचेंगे
क्लोरीन, आर ओ की ज़रूरत नहीं
गोमूत्र काफी है
जैसे रक्त के लिए साफ़ी है

गोमूत्र हरेक के पास नहीं है तो क्या
एक बूंद उसका हर मूत्र को गोमूत्र बना देता है
तुम नहीं जानते एक मछली पूरे तालाब को गंदा करती है?
गजब है उसकी शक्ति
माता की शक्ति कैसी होगी
जो सारी गंदगी को मंदा करती है
गजब है उसकी शक्ति
गजब है अपनी भक्ति

वैंगार्ड

कौन कहता है कि तुम गलत हो मैं नहीं मानता
जब तक तुम दिखते थे सड़कों पर जागते और जगाते
हम सबने देखा किया तुम पर पूरा विश्वास
मसीह के समान तुम्हारी तेज़ी जो आज भी कम नहीं है
जब तुम मशीन में लद चुके हो इंतजार है हमें
कि यकायक थम जायेगा तुम्हारे दम से इसका चलना
तुममें हमने अपना अग्रज देखा तुम्हारा धैर्य
तुम्हारी चतुराई जो आज भी कम नहीं हैं
जब तुम बह गए या पिस गए मशीन ने ढाल लिया
अपने रूप में तुम्हें तुम गलत नहीं हो

सरकार है

बात बात पर निकल आते हैं खंजर
सचमुच किसी ज़ोरदार सरकार की ज़रूरत पड़ी है
जिसके हाथों में चुम्बक है
सारे खंजरों को हरेक हाथ से छीन ले
फिर करे मुद्रित जिसे चाहता करना
बाकियों को पड़ेगा मरना
सरकार है सरकार के आगे झुको
फिर करो मारने मरने का पर्व
अगर आखेट में भी मृत्यु हो
गम न कर सरकार है
मारने वाला जवां
मरने वाला आततायी या कोई हुतात्माई

प्रकाशन: जनज्वार

Written by Pratyush Chandra

July 24, 2019 at 11:13 am

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