मोमबत्तियाँ


कॉन्सटेंटाइन पेट्रो कवाफी

आने वाले दिन हमारे आगे खड़े हैं
जैसे छोटी-छोटी जलती मोमबत्तियों की कतार –
सुनहरी, गर्म, और झूमती छोटी बत्तियाँ।

दिन जो बीत गए हमारे पीछे खड़े हैं,
अब बुझ गईं मोमबत्तियों की उदास पंक्ति;
जो सबसे पास हैं वे अब भी छोड़ती हैं धुआँ,
ठंडी मोमबत्तियाँ, पिघली हुईं, बिगड़े रूप जिनके।

मैं उनको देखना नहीं चाहता; वे मुझे उदास करती हैं,
और मैं उदास होता हूँ, पहले की उनकी रोशनी याद कर।
मैं अपने सामने देखता हूँ, अपनी जलती मोमबत्तियों को।

मैं मुड़ना नहीं चाहता, कहीं देख घबरा न जाऊँ,
कितनी जल्दी बढ़ रही है काली रेखा की लंबाई,
कितनी जल्दी बढ़ रही है बुझी हुईं मोमबत्तियों की गिनती।

बहुत देर


बहुत देर बहुत देर बहुत देर बाद
रोशनी पहुँची मगर सितारा न रहा
दूर दूर बहुत दूर पहुंच मुड़ना क्या
सैलाब ही है कोई किनारा न रहा

सत्ता के तभी तो दावेदार हैं


स्वामी ने कहा
ये तो जंगल हो गया है
इसमें मेरा महल खो गया है
अब इन झाड़ों को काट दो
जो भी फैलता नज़र आए उन्हें छांट दो
ऐसे तो नहीं चलेगा
मेरा गौरव तब कैसे पलेगा

नौकर ने बात मानी
भर दी हमेशा की तरह हामी
लगा दिया मशीनों को
सारे अल्हड़ पौधों को छांट दिया
सारे अक्खड़ तनों को काट दिया

मच गया हाहाकार
तभी हुआ चमत्कार
जो शांति के प्रतीक थे
अपने-अपने कोनों में ही ठीक थे
न झेल पाए वे यह क्रूरता
कर दी क्रांति की उद्घोषना
हवा में तैरती थी
शूरता

कर दिया नींद स्वामी का हराम
मचा दिया हर दिशाओं में कोहराम
सामने था नौकर
लग रही थी उसको ठोकर
झाड़ फैलते गए
मशीनों को घेर लिया
कटते रहे पटते रहे
मगर अंत ही नहीं हुआ
मशीनों को ओवरटाइम ने
कर दिया धुँआ

स्वामी ने बिगुल बजाई
नौकर को संदेसा पठाई
आ रहा हूँ मैं
सुनूंगा कहानी दोनों ओर की
अपने आगे शान्ति दूत भिजवाई

स्वामी अपने नौकर को फटकारता है
ऐसा क्यों किया
ये तो अभी फूल हैं
इनको संजोना है हमें
इनसे बात करनी चाहिए थी
इन्हें समझाना चाहिए था

और तुमलोगों को भी समझना चाहिए
बुज़ुर्ग हैं
हमारी व्यवस्था के ये दुर्ग हैं
इज्ज़त से पेश आना चाहिए
तुम्हें भी तौर सीखना होगा
तुम फूल हो
तुम्हारा काम है सुगंध फैलाना
तुम्हीं तो गौरव हो हमारे
ध्रुव तारे

चलो अच्छा हुआ
हम सब अपनी गलतियों से सीखते हैं
अब ख़त्म हो यह झगड़ा
और सम्बन्ध बनाओ तगड़ा
दुर्ग हैं ये तुम्हारी सीमा दिखाते हैं
कूदने की सीमा फांदने की सीमा
और आप भी कड़ाई कीजिए धीमा

शांत हो गए स्वामी
नौकर ने भरी हामी
अब कौन बनेगा हरामी

कितने समझदार हैं
सत्ता के तभी तो दावेदार हैं

भूत का शासन


दशकों तक धज्जियाँ उड़ाई
टुकड़े-टुकड़े कर
खुद खाई औरों को खिलाई

अब आत्मा भूत बन गई है तो
कहीं भी किसी में भी समा जाती है
नफरत है बस अंधियारा है
किसी के चेहरे पर भी छा जाती है
साँसों से होती हुई दिल में आ जाती है

जो है उसका मान नहीं
भूत है वर्तमान नहीं
उसे तो बस मिटाना है
वर्तमान को भूत बनाना है

घटना


“नहीं, ऐसे काम नहीं चलेगा –
ज़िन्दगी को अखबार बनाकर पढ़ते रहना!
कोई-न-कोई तो बता ही देगा वह रास्ता
जिस पर घटनाएँ मिलती हैं”
भारतभूषण अग्रवाल

घटनाएँ होती थीं मगर अब नहीं
अब तो स्क्रीन पर फैलती सिकुड़ती
ज्यामितिक रेखाएँ हैं
और उनके पीछे अदृश्य फार्मूलें

जितनी भी खूबसूरत या
भयंकर खबरें हैं
उनके तह में यही फार्मूलें हैं
और घटती बढ़ती चर राशियाँ
यही घटनाएँ हैं
और घटनाओं की अभिव्यक्तियाँ

और परत हटाएँ
तो उनके पीछे सर्किटों का अजीब सर्कस है
जो आदमी सुलझा नहीं सकते
मगर लगातार उलझते जाते हैं

और उनके पीछे अनगिनत लोग हैं
ज़िंदा और मुर्दा अपने खोह में समाए हुए
कब्र में दफ़नाए हुए
सभी से ओझल अपने आप से ओझल
उन्हें पता है कि वे खुद क्या करते हैं
मगर अनभिज्ञ हैं
इनसे क्या करते हैं

घटनाएँ कहाँ हैं
सामने होती हुईं
या उनके होने में खोती हुईं

तार टूट गए


कैसे फिर से एक नई लय बनाऊँगा

जो बनी थी
और रखी थी सँजो कर मैंने

उस पर धूल और समय के बोझ
लदते चले गए

खबर ही नहीं थी
और तार टूट गए

फिर से तार तो जुड़ जाएँगे
मगर लय वह नहीं होगी

मगर क्या लय ही नहीं होगी
ऐसा तो नहीं

क्या खबर?


कोई खबर नहीं है वतन से
कि हमको आदत पड़ी है
कि हम सोते रहें और खबर मिल जाए

कि कल तक तो कोई चिंता नहीं थी
खबर भी नहीं थी
जरूरत नहीं थी

सिर पर बहुत बोझ आन पड़ा था
मुश्किल में खुद ही कल तक पड़ा था
आज अब मौका मिला है

खबर खोजते हैं
जिनके सहारे
अपनी खबर हम खुद को सुनाएँ