रूस-यूक्रेन युद्ध: फायदा किसका?


मोर्चा, अप्रैल 2022

ड्राफ्ट

यूक्रेन पर रूस की चढ़ाई को लेकर कोई भी सारगर्भित टिप्पणी बिना भूमंडलीय पूंजी की प्रक्रियाओं और प्रवृत्तियों को नजर में रखे नहीं की जा सकती। इस तरह की घटनाएं नेताओं के बयानों, उनके तात्कालिक चालों और हमारी स्वाभाविक प्रतिक्रियाओं के आधार पर नहीं समझी जा सकतीं। देशों की, विशेषकर उनकी जो इस युद्ध में निर्णायक भूमिका अदा कर रहे हैं, राजनीतिक-आर्थिक प्रकृति को समझना अत्यंत आवश्यक है, परंतु उसके बाद भी हमें इस बात को नजरंदाज नहीं करना चाहिए कि सम्पूर्ण अपने भागों के योग से बड़ा होता है। एक तरफ, पूंजी की संपूर्णता, और दूसरी तरफ, उसका विभिन्न और विरोधाभासी आर्थिक, सामाजिक और राज्य सत्ताओं के रूप में प्रसार और उनके बीच द्वंद्व — इन दोनों के बीच के संबंध को हमेशा ध्यान में रखना आवश्यक है। इसी द्वन्द्वात्मकता को हम मार्क्स-एंगेल्स द्वारा अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और घटनाओं पर लिखे लेखों में तथा लेनिन की साम्राज्यवाद पर लिखी पुस्तिका में देख सकते हैं। हमारी समझ है कि यूक्रेन-रूस युद्ध की व्याख्या के लिए इसी द्वन्द्वात्मक पद्धति को हमें अपना हथियार बनाना होगा।

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अमरीका के नेतृत्व में नाटो की विस्तारकारी और एकछत्रवादी चालबाज़ी, नए शीत युद्ध का आरंभ, रूस की आक्रामकता, पुतिन की साम्राज्यिक बृहत रूसी अंधराष्ट्रवादी बयानबाजी, यूक्रेन में फासीवादी समूहों का वर्चस्वकारी उभार — ये सब हो रही घटनाओं के विभिन्न विवरण हैं, परन्तु सत्य की पहचान केवल उसके इन सतही पहलुओं की व्याख्या द्वारा नहीं हो सकती। भविष्य की संभावनाओं की पहचान और उनके परिपेक्ष में सर्वहारा वर्गीय दृष्टिकोण और गतिविधियों के लक्षणों की पहचान जिनके अनुसार क्रांतिकारी समूहों को अपनी भूमिका को तय करना होता है, सतही उपस्थितियों के चित्रण से नहीं हो सकती।

ऐसे चित्रण के आधार पर केवल प्रतिक्रियात्मक नारेबाजी ही हो सकती है और यही देखने को आज मिल रहा है। भारतीय वामपंथ में रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर कई तरह की समझ है। कई इस युद्ध को यूक्रेनी आत्मनिर्णय के नजरिए से देखते हैं, और रूस के आक्रमण में उन्हें पुरानी दकियानूसी रूसी साम्राज्यिक नास्टैल्जिया का प्रकटीकरण दिखता है। राष्ट्रपति पुतिन के बयानों में इसके लिए भरपूर सामग्री तैयार मिलती है। दूसरी ओर वे हैं जिन्हें इस युद्ध को उकसाने में अमरीकी षड्यंत्र दिखता है। उन्हें इस युद्ध में और इससे पहले भी यूक्रेन के समाज में फासीवादी तत्वों को भड़काकर रूस को उसके ही क्षेत्र में हाशिए पर डालने के अमरीकी नेतृत्व और नाटो के प्रयास दिखाई देते हैं। इसके लिए भी अमरीकी, उसके सहयोगी देशों के नेतृत्व और यूक्रेनी नेतृत्व के बयानों में और गतिविधियों में व्यापक सामग्री तैयार मिलती है। तो कौन सही है? शायद इसी तरह के माहौल में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान यूरोप के क्रांतिकारियों ने क्रांतिकारी पराजयवाद के अस्थायी रणनीति को अपनाया। परंतु यह भी तब तक केवल अटकल ही है और महज़ नारा है, जब तक हम इस युद्ध के पीछे विद्यमान राजनीतिक आर्थिक प्रक्रियाओं और प्रवृत्तियों की व्याख्या नहीं कर लेते। “वास्तविक स्थिति की जांच किए बिना, वर्ग शक्तियों का आदर्शवादी मूल्यांकन और काम में आदर्शवादी मार्गदर्शन ही हो सकता है, जिसका नतीजा या तो अवसरवाद या तख्तापलटवाद होगा”। (माओ)

राष्ट्रीय आत्मनिर्णय कोई निरपेक्ष सिद्धांत नहीं है। लेनिन की तर्ज पर हम जरूर बोल सकते हैं कि रूसी जनता के लिए यूक्रेनी राष्ट्रीय आत्मनिर्णय का सवाल महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह रूसी राजसत्ता की महत्वाकांक्षाओं को चुनौती देता है। परन्तु यूक्रेनी आत्मनिर्णय को सकारात्मक रूप में पेश करने वालों को यूक्रेनी कुलीन वर्गों द्वारा दक्षिणपंथी अंधराष्ट्रवादी लामबंदी को ध्यान में रखना होगा, जो यूक्रेन की अन्य उप-राष्ट्रीयताओं की आकांक्षाओं को दबाने का जरिया है। ऐसा तो नहीं कि यूक्रेनी राष्ट्रवाद महज़ वैश्विक नवउदारवादी नव-रूढ़िवाद का हथियार है?

आगे, जो रूसी राजसत्ता के नव-साम्राज्यिक राजनीतिक अर्थशास्त्र को नजरअंदाज़ करते हैं, वे ज्यादा बड़ी गलती करते हैं। शायद वे अभी भी अपने अवचेतन में पुराने फादरलैंड की रंगीनियत को संजोए हुए हैं। वे भूल जाते हैं कि विद्यमान रूसी राजसत्ता विश्व नवउदार पूंजीवादी दौर में पैदा हुई है, जिस दौर में राजसत्ता ने विश्व भर में दमनकारी चरित्र अख्तियार कर लिया है, कल्याणकारी मुखौटे को उतार फेंका है। रूसी राजसत्ता का प्रतिक्रियावादी चरित्र वहां के पूंजीवादी वर्ग के चरित्र पर निर्भर है। रूस और अन्य पूर्वी यूरोप के देशो में (जिसमें यूक्रेन भी शामिल है) पूँजीवादीकरण की प्रक्रिया मुख्यतः भूतपूर्व राजकीय समाजवादी व्यवस्था के तहत विकसित संसाधनों पर कुलीन वर्ग को काबिज कर विश्व पूंजी के साथ उन संसाधनों का दोहन कर मुनाफे में रॉयल्टी अथवा लगान के रूप में हिस्सेदारी करना रही है। इन देशों के बीच सहयोग और प्रतिस्पर्धा का रिश्ता भी इसी पूंजीवादी चरित्र द्वारा निर्धारित है।

वर्तमान युद्ध की व्याख्या के लिए सबसे प्रमुख तथ्य जिसे हमे ध्यान रखना चाहिए वह यही है कि रूस से यूरोप सप्लाई होती ऊर्जा का बड़ा हिस्सा यूक्रेन होकर गुजरता है, और इस व्यवस्था से यूक्रेन को अच्छा खासा फायदा भी है परंतु यूक्रेन के ट्रांजिट फ़ी के कारण ऊर्जा की यूरोप सप्लाई पर लागत बढ़ जाता है। इसी कारण से बाल्टिक सागर से ऊर्जा सीधे यूरोप पहुंचाने के लिए नॉर्द स्ट्रीम पाइपलाइनों का निर्माण चल रहा है जो इस लागत को काफी कम कर देगा, परंतु ट्रांसिट फी पाते यूक्रेन समेत कई केन्द्रीय और पूर्वी यूरोपीय देश इसका विरोध कर रहे हैं। (संयुक्त राज्य अमरीका इन पाइपलाइनों के बनने को शुरुआत से ही रोकने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि उसका मानना है कि इससे यूरोप पर रूसी प्रभाव अत्यधिक बढ़ जाएगा। चल रहे युद्ध के कारण पहली बार नॉर्द स्ट्रीम का निर्माण रुक गया है।) इस संदर्भ में यह तथ्य भी गौर करने योग्य है कि पिछले साल 2021 में रूस ने यूक्रेन से गुजरती ऊर्जा की मात्रा में अत्यधिक कटौती कर दी जिसकी वजह से यूक्रेन की राष्ट्रीय आय पर अच्छा खासा असर पड़ा है।

यूक्रेन नाटो और युरोपियन यूनियन में शामिल होने की धमकियों का लगातार इस्तेमाल इस सप्लाई चेन और ट्रांजिट फी की राजनीति में रूस के साथ मोल-भाव करने में करता रहा है। रूस भी लगातार यूक्रेन के अंदर अपने हितों के अनुकूल शासन व्यवस्था बनाने की कोशिश में लगा रहा है। 2014 में क्रिमिया पर कब्जा करने का भी कारण यही था। यूक्रेन के रूसी उप-राष्ट्रीयताओं के अपने वास्तविक संघर्षों को रूस अपने साम्राजयिक इरादों की पूर्ति में चारे की तरह इस्तेमाल करता रहा है। रूस-विरोधी यूक्रेनी शासक वर्ग को संयुक्त राज्य अमरीका और नाटो से भरपूर सहयोग मिलता रहा है।

पर इन सब तथ्यों और आपसी राजनीति के पीछे कुछ पूंजी की भूमंडलीय संरचनात्मक और ऐतिहासिक पहलू भी काम कर रहे हैं, जिनकी संक्षेप में चर्चा आवश्यक है।

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पिछली शताब्दी के अंत में सोवियत संघ और उसके आश्रित शासनों के विघटन ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की दिशा को एक नए मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया। इसने वैश्विक राजनीति की पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह से ढहा दिया। यह व्यवस्था द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान फासीवादी एक्सिस शासनों की हार के बाद उभरी थी। इस व्यवस्था को शीत युद्ध प्रोटोकॉल और मानदंडों द्वारा नियंत्रित किया जाता था। इस व्यवस्था के तहत विभिन्न देशों में उनके विशिष्ट और विविध प्रकार के श्रम और अन्य संसाधनों के आधार पर पूंजीवादी संबंधों को विकसित और दृढ़ करने के विभिन्न विकासीय मॉडल तैयार हुए। इसने आयुध और रक्षा उद्योगों के विशाल और व्यवस्थित विकास में भी मदद की, और वैश्विक ध्रुवीकरण के तहत तमाम देशों को गोलबंद किया। वह सैन्य कींसियवाद का युग था, जब यह समझ थी कि “सरकारी खर्च के उच्च स्तर की नीति — भले ही कभी-कभी घाटे के माध्यम से वित्तपोषित हो — अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दे सकती है”। सैन्य खर्च का उद्देश्य भी “बेरोजगारी की दर को कम करने, मजदूरी बढ़ाने और श्रमिकों की आर्थिक सुरक्षा में योगदान देना था” (जेम्स सी. साइफर) ताकि प्रभावी मांग में बढ़ोत्तरी हो सके, आर्थिक गतिविधियों में तेजी आए और पूंजीवाद-विरोधी सामाजिक वर्गीय जन-उभार की संभावना को खत्म किया जा सके।

पूंजीवाद के तथाकथित स्वर्ण युग के 1970 में पतन के साथ, सोने-डॉलर के रिश्ते के अंत और सूचना प्रौद्योगिकी के विकास के कारण, जिसने श्रम प्रणालियों के सतत असततीकरण (infinite discretisation) को और उत्पादन प्रक्रियाओं के भूमंडलीय एकीकरण को संभव बना दिया, पूंजीवाद के वित्तीयकरण की प्रक्रिया शुरू हुई जिसने आर्थिक के घेरे से राजनीतिक प्रभाव को लगातार नदारद किया, और राष्ट्रीय सत्ताओं को महज पुलिस फोर्स बन सामाजिक असंतोष को प्रबंधित और उत्पादित करने का काम सौप दिया। इस बदलाव ने धीरे-धीरे शीत युद्ध युगीन स्थायित्व को नष्ट कर दिया और राष्ट्रीय विकास के प्रतिमानों को लगातार ध्वस्त कर वैश्विक वित्तीय बाजार और एकीकरण के दायरे में लाकर खड़ा कर दिया। अब पूंजी के संकटग्रस्त प्रवृत्तियों से कोई भी अर्थतंत्र अपने आप को अछूता नहीं रख पाएगा।

शीत युद्ध के अंत को जिसे बर्लिन दीवार के ढहने और पूर्वी यूरोप के देशों के विघटन से चिह्नित किया जाता है, अमरीकी नेतृत्व की जीत के रूप में देखा गया। लेकिन यह एकछत्रवादी उत्साह तुरंत ही फीका पड़ गया क्योंकि अमरीकी नेतृत्व वाले गठबंधन यानी नाटो ने अपना तात्कालिक औचित्य खो दिया। मास्त्रिख्त संधि (Maastricht Treaty) और अन्य नए क्षेत्रीय गठबंधनों के जन्म के साथ, अमरीका और डॉलर की वर्चस्वता सर्वमान्य नही रह गई। कुछ सुरक्षा विचारकों ने इस मौके को एकध्रुवीयता की असंभावना और बहुध्रुवीय दुनिया के उदय के आग़ाज़ के रूप में देखा, जिसे वे एक तरह से अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र का पर्याय मानते थे।

दूसरी ओर, अमरीकी-परस्त सुरक्षा विचारक पुराने गठबंधन के औचित्य को साबित करने के लिए कई तरह की अटकलों का इस्तेमाल करते रहे। सोवियत संघ के विघटन के बाद कई तरह के स्थानीय और आर्थिक-हितार्थी गठबंधनों का जन्म होता दिखाई देता है, जिसमें ग्लोबल साउथ अथवा तीसरी दुनिया के वे अवसरवादी और तानाशाही देश भी शामिल हो रहे थे जो अमरीकी खेमे में रहा करते थे। ये स्थानीकरण वित्त पूंजी के भूमंडलीकरण के लिए तात्कालिक चुनौती प्रतीत होते हैं। इसी चुनौती ने शीत युद्ध के बाद भी अमरीकी नेतृत्व में भूमंडलीय पुलिसशाही को आरंभिक दिनों में जिंदा रखा — कई यूरोपीय देशों को इस युद्ध में अनमने ढंग से ही सही मगर इस गठजोड़ को जिंदा रखना पड़ा। इसी परिपेक्ष में पिछली सदी के अंत के साथ, इस वैश्विक पुलिसिंग की रणनीतियों को मजबूत करने के लिए “आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध” के रूप में तात्कालिक कामचलाऊ सैन्य विचारधारा उभरी। यह विचारधारा अत्यधिक शक्तिशाली थी क्योंकि यह किसी भी हस्तक्षेप को सही ठहरा सकती थी। यह नवउदारवादी युग के लिए काफी उपयुक्त भी थी क्योंकि यह मरीचिकानुमी, गतिशील और सर्वव्यापी वित्तीय पूंजी के फैलाव का साधन बन सकती थी। जहां-जहां राजनीतिक को आर्थिक के तहत अधीनार्थ करने की आवश्यकता है यानी जहां-जहां स्थानीय संसाधनों और अर्थतंत्रो को पूंजी के खुले दोहन में राजनीतिक और सामाजिक अड़चनें पैदा हो रही हैं वहां आतंकवाद-विरोधी मुहिम चलाई जा सकती है। इस अंतहीन युद्ध के परिवेश ने न केवल सैन्य और सैन्य प्रौद्योगिकियों पर जारी सार्वजनिक खर्च के लिए, बल्कि विशेष रूप से सुरक्षा और निगरानी के ढांचे के सामान्यीकरण और निजीकरण के लिए भी औचित्य प्रदान किया, क्योंकि वित्त की तरह आतंकवाद कोई सीमा नहीं जानता — इसलिए आतंकवाद के खिलाफ युद्ध जितना विदेशी भूमि पर होता है, उतना ही (शायद अधिक ही) घरेलू सीमाओं के भीतर छेड़ा जाता है।

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इस संदर्भ में, शायद प्रासंगिक है मार्क्सवादी इतिहासकार और चिंतक एलेन मेक्सिन्स वुड की “अधिशेष साम्राज्यवाद” की थीसिस — जो नव-उदारवादी दौर में साम्राज्यवादी प्रक्रियाओं को सैन्य उद्योग में अतिसंचय की अभिव्यक्ति के रूप में देखती है। मेक्सिन्स वुड तर्क देती हैं,

“यह पहला साम्राज्यवाद है जिसमें सैन्य शक्ति न तो क्षेत्र को जीतने के लिए और न ही प्रतिद्वंद्वियों को हराने के लिए निर्मित हुई है। यह ऐसा साम्राज्यवाद है जो न तो क्षेत्रीय विस्तार चाहता है और न ही व्यापार मार्गों पर भौतिक प्रभुत्व। फिर भी इसने इस विशाल और अनुपातहीन सैन्य क्षमता का विकास किया है जिसकी अभूतपूर्व वैश्विक पहुंच है। शायद इतने बड़े सैन्य बल की आवश्यकता इसी वजह से है क्योंकि नए साम्राज्यवाद का कोई स्पष्ट और सीमित उद्देश्य नहीं है। वैश्विक अर्थव्यवस्था और इसे संचालित करने वाले विभिन्न राज्यों पर असीम वर्चस्व के लिए अंतहीन, उद्देश्य अथवा समय के मामले में, सैन्य कार्रवाई की आवश्यकता होती है।”

आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध निश्चित रूप से वैश्विक पुलिस व्यवस्था के विस्तार में शानदार रूप से उत्पादक है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है दुश्मन को वास्तव में पहचानने और नियंत्रित करने में असमर्थता। यह सहयोगियों से ज्यादा नाराजगी और दुश्मन पैदा करता है, और वे कहीं से भी उभर सकते हैं। मेक्सिन्स वुड आगे कहती हैं,

“हमें बताया गया है कि सीमाओं के बिना युद्ध सीमा-विहीन विश्व की अनुक्रिया है, एक ऐसी दुनिया की जिसमें राष्ट्र-राज्य अब प्रमुख खिलाड़ी नहीं हैं और गैर-राज्य विरोधी, या ‘आतंकवादी’ एक बड़ा खतरा बन गए हैं। इस तर्क में विशिष्ट संतुलन आकर्षक है, लेकिन यह जांच में खरा नहीं उतरता। आतंकवाद का खतरा, बल-प्रयोग के किसी भी अन्य खतरे से अधिक, भारी सैन्य विरोध का प्रतिरोधक है — राज्यविहीनता के बावजूद नहीं बल्कि उसके कारण; और, वैसे भी, ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ से आतंकवादी हमलों के रुकने से ज्यादा, उनको बढ़ावा मिलने की संभावना है। गैर-राजकीय दुश्मनों का खतरा सैन्य बल के अनुपातहीन जमावड़े, जिनका कोई अभिज्ञेय लक्ष्य नहीं है, की सफाई नहीं हो सकते। इसके विपरीत, ‘अधिशेष साम्राज्यवाद’, चाहे वह कितना भी विकृत और अंततः आत्म-पराजयशील क्यों न हो, तर्कसम्मत है, परंतु केवल वैश्विक राज्य प्रणाली और उसकी विरोधाभासी गतिकी की प्रतिक्रिया के रूप में।”

इसलिए, यह अंतहीन वैश्विक युद्ध कभी भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों के नियमन का कुशल साधन नहीं हो सका। इसके अलावा, घरेलू राजनीति पर इस वैश्विक युद्ध का प्रभाव अत्यंत विघटनकारी और अस्थिर होता है, जैसा कि अमरीकी राजनीति पर खाड़ी और अफगानिस्तान युद्धों के प्रभाव ने स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया है। वर्तमान सदी के दूसरे दशक के दौरान अमरीका में विभिन्न सरकारें इन युद्धों से बाहर निकलने का उचित समय और रास्ता खोजने की कोशिश करती रहीं। हाल ही में अमरीका ने शर्मनाक ढंग से अफगानिस्तान से अपने आप को बाहर खींचा — अफगानिस्तान युद्ध तालिबान शासन को अपदस्थ करके शुरू हुआ और इसे पुनर्स्थापित करके समाप्त हुआ।

आतंकवाद के बहाने ने सामान्य निगरानी (surveillance) उद्योग के अंतर्गत सैन्य और आयुध उद्योग के विस्तार और एकीकरण में मदद की, जिसने सार्वजनिक/निजी विभाजन और शांति/युद्धकालीन जरूरतों के विभाजन को व्यर्थ करार दिया। इसने अस्थायी रूप से वैश्विक सैन्य-औद्योगिक परिसर पर अमरीकी आधिपत्य को जीवित रखा, लेकिन वर्तमान शताब्दी के पहले दशक में नाटो की गतिविधियों को सही ठहराने के लिए इस्तेमाल किए गए ज़बरदस्त झूठ और छल ने एकछत्र अमरीकी नेतृत्व के प्रति सर्वसम्मति को खतरे में डाल दिया। आतंकवाद के खिलाफ युद्ध कभी भी वैश्विक राजनीतिक शक्तियों के आपसी गठजोड़ के लिए सुसंगत साधन प्रदान नहीं कर सका। शीत युद्ध की द्विध्रुवीयता के स्थायित्व और संतुलन की जगह लेने के लिए आज तक कोई नया समीकरण नहीं पैदा हो सका है।

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एक तरफ, पूंजीवाद के नव-उदारवादी चरण ने तमाम राजसत्ताओं को महज पुलिस-प्रशासन में तब्दील कर दिया है, परंतु उस कार्य को भी निभाने के लिए उनके बीच प्रतिस्पर्धा को अत्यधिक तेज कर दिया है। दूसरी ओर, अमरीका को यदि ग्लोबल पुलिसशाही के शीर्ष पर रहना है, तो उसे अपने ऐतिहासिक वर्चस्व को बचाना होगा, जिसके लिए आतंकवाद जैसा चेहराविहीन दुश्मन नहीं सोवियत संघ जैसे खतरे को सामने रखना होगा। मुख्यधारा के सुरक्षा विचारक और अमरीकी नेतृत्व अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रबंधन में इस संकट के बारे में जानते हैं और पिछले एक दशक से द्विध्रुवीयता के मिथक को फिर से बनाने में व्यस्त हैं — इस बार सोवियत संघ का जगह चीन को मिल रहा है। प्रारंभ में, यह केवल हॉलीवुड था जिसने इस कार्य को गंभीरता से लिया, लेकिन ट्रम्प शासन और भारत के मोदी जैसे उसके स्थायी सहयोगियों ने इसको मुख्य एजेंडा बना दिया। बाइडेन शासन डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा छोड़ी गई विरासत को बखूबी व्यवस्थित कर आगे ले जा रहा है। हालांकि, हाल तक चीनी नेतृत्व लगातार इस मिथक में पड़ने से बचता रहा है। चीन दूसरों के खेलने के लिए गैजेट्स और गिज़्मोस के आपूर्तिकर्ता के रूप में अपने आप को रखे रहना चाहता है, लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध के साथ अमरीकी रणनीतिकारों और उनके ग्राहकों को अपना सपना साकार होता दिख रहा है।

शीत युद्ध की द्विध्रुवीयता के पुनर्निर्माण के लिए उनके मिथक-निर्माण को साकार करने में मदद करने के लिए उन्हें दो कारकों की आवश्यकता है— पहला, निश्चित रूप से, उन्हें उम्मीद है कि चीन रूस के साथ गठबंधन करेगा, और दूसरा है, जो अमरीका की पिछले तीन दशकों से प्रमुख चिंता रही है, यूरोपीय संघ के जर्मन नेतृत्व की तटस्थता का प्रश्न। यूक्रेन-रूस युद्ध ने इतना तो किया है कि विश्व के तमाम देशों को सैन्यीकरण के प्रति घरेलू सहमति बनाने में लालायित देशों के लिए काम आसान कर दिया है और तटस्थ देशों को मजबूर कर दिया है। भारत की मोदी सरकार की गिनती लालायितों में होगी। दूसरी ओर, यूक्रेन-रूस द्वंद्व का नतीजा यह है कि अनिच्छुक जर्मनी ने अपनी सैन्य अक्षमता का आभास करते हुए 2022 के बजट में दस हज़ार करोड़ यूरो सैन्य खर्च के लिए तय कर लिया। मैक्सिन्स वुड की बात माने तो यह अमरीका के अधिशेष साम्राज्यवाद के लिए उत्तम अवसर है। इस दौर में उसकी सैन्य क्षमता के खरीददार अनेक होंगे।

परन्तु पुरानी द्विध्रुवीयता का आधार सैन्य कींसियवाद था जो कि घरेलू अर्थतंत्र के सुनियोजित संतुलित विकास पर केंद्रित था। उसके विपरीत नई द्विध्रुवीयता का संदर्भ वित्तीय पूंजी और बाजार की स्वच्छंद और अनियत प्रकृति है जिसके आगे सारी दूरगामी संरचनात्मक स्थानीय नीतिगत योजनाएं विफल हैं और जिसने विश्व को भूमंडलीय ग्रामीण व्यवस्था में तब्दील कर दिया है जहां कभी अकेले कभी साथ मिल कर एक दूसरे की नोच-खसोट में सभी लगे हुए हैं — यही ज़ोंबी युग है जहां खून पीने की होड़ को प्रतिस्पर्धा का नाम दिया गया है। वैसे भी पूंजीवाद में “जो कुछ भी ठोस है वह हवा में उड़ जाता है” (मार्क्स) परंतु शुरुआती चरणों मे स्थान और समय में अंतराल का अर्थ था, जो कि नव-उदारवादी चरण में असीम क्षणभंगुर और संयोगात्मक होता चला जा रहा है — कैंसर मौजूद है परंतु वह तात्कालिक रूप में किस जगह और कब उभरेगा यह तय नहीं है। जॉन मैकमूर्टी ने पूंजीवाद के विद्यमान चरण को “पूंजीवाद का कैंसर चरण” नाम दिया है।

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जबतक रणक्षेत्र मध्य-एशिया, अफगानिस्तान या ग्लोबल साउथ के कोई और देश में स्थित थे तब तक इन युद्धों के पीछे मूल रूप से काम कर रही वर्चस्वकारी राजसत्ताओं की संरचनात्मक कमजोरियाँ और उत्कंठाएँ साफ नहीं दिखती थीं। यूक्रेन-रूस युद्ध ने इन सब पर से पर्दा हटा दिया। वित्तीयकृत पूंजी ने किस रूप में पूंजीवादी राजसत्ताओं और उनके बीच के संबंधों की सर्वमान्यता और स्वरूपों को अनिश्चित कर दिया है, यह आज साफ है।

आने वाले वर्षों में घटनाएं क्या मोड़ लेंगी यह बताना शायद मुश्किल है। लेकिन इतना तो साफ है कि चीन और रूस पुराने सोवियत संघ नहीं है। चीन विश्व पूंजीवाद का सबसे बड़ा विनिर्माण केंद्र ही नहीं है, वित्तीय पूंजी का भी केंद्र बनता जा रहा है, और साथ ही पूंजी के वैश्विक फैलाव का वह अहम जरिया भी है। आगे, संयुक्त राज्य अमरीका की स्थिति 1950-80 में जैसी थी वैसी नहीं है — वह न तो विश्व पूंजीवादी उत्पादन का केंद्र है, न ही डॉलर की वर्चस्वता निर्विरोध सर्वस्वीकृत है। परंतु संयुक्त राज्य अमरीका तमाम अर्थतन्त्रों के लिए, विशेषकर चीन के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण बाजार है। इसी कारण अमरीका के अर्थतंत्र के पोषण में सभी पूंजीवादी राष्ट्र अपना हित देखते हैं।

इसके अलावे, यूक्रेन-रूस युद्ध के नतीजे के तौर पर कई लोग नव-शीत युद्ध की परिकल्पना करते हुए हथियारों के होड़ की फिर से शुरुआत की संभावना को देखते हैं। क्या यह कभी रुका था? अगर हम इस युद्ध में अमरीका और रूस के बीच प्रतिस्पर्धा को देख रहे हैं तो यह हमें समझना चाहिए कि वैश्विक सैन्य-औद्योगिक परिसर के फैलाव में मुख्य प्रतिस्पर्धक होने के कारण रूस और अमरीका दोनों सहयोगी भी हैं। संयुक्त रूप से, अमरीका और रूस का हथियारों के वैश्विक निर्यात में 57% हिस्सा है। इस मामले में यह युद्ध दोनों ही देशों के हित में है।

इस युद्ध के मामले में भारत और अन्य देशों की तटस्थता को देखकर कुछ विद्वानों को गुटनिरपेक्ष आंदोलन की याद आने लगी है और उसके पुनरागमन की संभावना भी दिखने लगी है। इस मोह का इस्तेमाल कर मोदी सरकार और विश्व की अन्य अवसरवादी सरकारें सैन्य खर्चों की बढ़ोत्तरी के प्रति घरेलू सर्वसम्मति तैयार कर रहीं है। शायद वे इसमें आर्थिक मंदी से उबरने का जरिया देख रहीं हैं। रोजा लुक्सेमबुर्ग ने कभी कहा था — “जो चीज सेना की आपूर्ति को, उदाहरण के लिए, सांस्कृतिक उद्देश्यों (स्कूलों, सड़कों, आदि) पर राज्य के व्यय की तुलना में, अधिक लाभदायक बनाती है, वह है सेना का निरंतर तकनीकी नवाचार और इसके खर्चों में लगातार वृद्धि।”

मोदी सरकार शुरुआत से ही भारत में सैन्य-औद्योगिक परिसर के विकास पर जोर दे रही है। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के नाम पर उदारीकरण और निजीकरण की प्रक्रिया स्थापित हो चुकी है। रक्षा औद्योगिक कॉरिडोरों का निर्माण किया जा रहा है। विदेशी निवेश को खुला निमंत्रण दिया जा चुका है, और कंपनियों का आगमन शुरू हो चुका है। यही कंपनियां है जो पहले देश के खिलाफ दूसरे देश को, और दूसरे के खिलाफ पहले देश को हथियार सप्लाई करती हैं। इस संदर्भ में हम लेनिन की बात को उद्धृत कर इस लेख को यहीं पर विराम देंगे —

“हथियारों को एक राष्ट्रीय मामला, देशभक्ति का मामला समझा जाता है; यह माना जाता है कि हर कोई उनके बारे में अधिकतम गोपनीयता बनाए रखेगा। लेकिन जहाज निर्माण कारखाने, तोपें, डाइनेमाइट और लघु शस्त्र बनाने के कारखाने अंतरराष्ट्रीय उद्यम हैं, जिनमें विभिन्न देशों के पूंजीपति विभिन्न देशों की जनता को धोखा देने और मुड़ने के लिए और इटली के खिलाफ ब्रिटेन के लिए और ब्रिटेन के खिलाफ इटली के लिए समानरूप से जहाज और तोपें बनाने के लिए मिलकर काम करते हैं।”

Brahma against Brahmanism — Ambedkar’s Battle over the History of Ideas


The right-wing in its endeavour to keep the opposition in the loop of reactivity that it has created to secure its hegemony has started deploying even Ambedkar frequently. Its favourite rumour is of course about the fact that Ambedkar chose to convert to an Indic religion rather than Islam and Christianity, glossing over another fact that he didn’t choose Sikhism (though after much pondering). Of course, his main concern behind not choosing Islam and Christianity was to continue the struggle of the Shudras on the very socio-ideological turf on which the caste system originated. Conversion to Islam or Christianity would have externalised him and his supporters from the day-to-day struggle for the abolition of the caste system that is anchored in the Hindu community. As Sikhism had already internalised the caste hierarchy prevalent in the Hindu society, a conversion to Sikhism would not have changed anything. In the end, for Ambedkar, it was the marginality of Buddhism and its ambiguous integration into the Hindu culture, along with its rationalist foundation that made Buddhism attractive for the Dalit conversion. As Gail Omvedt, rightly says,

“Buddhism could not even offer the limited resources of community support that Sikhism could, but it was also a religion that Ambedkar could shape on his own, could mould to suit what he felt to be the spiritual and moral needs of Dalits. Sikhism already had its set religious hierarchy, to which Ambedkar – however strong and determined a leader – would have been subordinate.”

Ambedkar converted to Buddhism because he didn’t want any distraction from the focus on the caste question and to get embroiled in other kinds of hegemonic conflicts involving the leadership of other religious identities. Buddhism was a vacant space to fit in and rebuild, yet it opened up a different level of resources for the anti-caste movement —  it allows the oppressed and the exploited to reclaim and reinterpret the whole legacy of the politico-ideological struggle against the caste system throughout the written history of India. By reinvigorating this legacy, the present struggle against caste builds a new perspective on Indian history —  towards the ideological, political, and social struggles of Indian people. The recognition and reclamation of these struggles in Indian history is an important ideological task that Ambedkar considered very crucial. 

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While describing one of the riddles of Hinduism, Ambedkar says something which could have become a weapon in the struggle for reinterpreting and reclaiming the philosophical legacy of India from its conventionalised appropriation by the right-wing forces. Unfortunately, because of the ineptitude of the liberal elements of the status quo and the demoralised self of the left, the same words are being mobilised to appropriate Ambedkar for Hindutva. 

Ambedkar in his Riddle No. 22, discusses the characteristics of democracy, beyond electoral fetishism. According to him, democracy cannot even be reduced to a mere form of government. For him, “it is a form of the organization of society.” In fact, good government to a large extent “depends upon the mental and moral disposition of its subjects…. Democracy is more than a political machine. It is even more than a social system. It is an attitude of mind or a philosophy of life.”

Ambedkar considers equality and liberty as “the deepest concern of democracy,” yet he considers their equation with democracy not correct. The most crucial element that defines democracy is what sustains even equality and liberty. It is not “the law of the state” that sustains them, but fraternity, fellow-feeling. The better expression for this, according to him, is MAITRI — compassionate companionship. “If in democracy, liberty does not destroy equality and equality does not destroy liberty, it is because at the basis of both there is fraternity.”

Thus, Ambedkar asks the crucial question that forms the basis of one of the riddles of Hinduism. “Why did democracy not grow in India?” As the roots of the fraternity are found in the ethical and social life of the community, which for Ambedkar is organised in religion, it is the lack of fraternity in the Hindu religion that doesn’t allow democracy to grow in India. 

But this leads Ambedkar to a further investigation, which is very crucial for us today, as it provides a perspective to rewrite the history of ideas in India. He says that the absence of fraternity in Hinduism does not mean “that the doctrine of fraternity was unknown to the Hindu religious and philosophic thought.” In fact,

“The Hindu religious and philosophic thought gave rise to an idea which had greater potentialities for producing social democracy than the idea of fraternity. It is the doctrine of Brahmaism.”

Had anybody other than Ambedkar written this, one could imagine the response from the “politically correct” community. Remember the reaction to EMS Namboodiripad’s innocent remarks in 1990 on the significance of Advaita Vedanta and Shankaracharya from his comrades!

Coming back to the text, Ambedkar here differentiates between Brahmaism, Vedanta, and Brahmanism. “Although they are correlated they stand for three different and distinct ideologies.”

The essence of Brahmaism is coded in the mahavakyas which identify Brahma with me, you, and everybody. Vedanta accepts the mahavakyas but views the world as unreal or maya [thus making the principle of Brahma socially impotent]. And, Brahmanism brought in its defence of chaturvarna, infallibility of the Vedas, and sacrifices to gods as the only way to salvation, perhaps to complement Vedanta’s unconcern for reality. 

Ambedkar defends Brahmaism against those who consider it a piece of impudence. Even aham brahmasmi is not an arrogant statement, but “an assertion of one’s own worth” – a remedy against the inferiority complex from which humanity suffers today. Further, this vakya should be read along with tattvamasi – which allows each individual to know himself to be as good as everybody. “Democracy demands that each individual shall have every opportunity for realizing his worth.” And, Brahmaism provides a philosophical ground for this aspect of democracy.

For Ambedkar, the unknowability of Brahma too is of no significance. More important are the social implications of the theory of Brahma — that everybody is a part of the same cosmic principle. This provides a solid foundation for democracy — “If all persons are parts of Brahma then all are equal and all must enjoy the same liberty, which is what democracy means.”

According to Ambedkar, the Christian principle of us being children of God is a very weak foundation for democracy. He says,

“That is why democracy is so shaky wherever it made to rest on such a foundation. But to recognize and realize that you and I are parts of the same cosmic principle leaves room for no other theory of associated life except democracy. It does not merely preach democracy. It makes democracy an obligation of one and all.”

But then what happened to Brahmaism, “why did it fail to produce a new society”? Of course, it was due to the Hindu social system and its defence in the shape of the alliance between Vedanta and Brahmanism, best epitomised in the persona and “the teaching of the Great Shankaracharya.” Ambedkar says,

“For it was this Shankaracharya who taught that there is Brahma and this Brahma is real and that it pervades all and at the same time upheld all the inequities of Brahmanic society. Only a lunatic could be happy with being the propounder of two such contradictions. Truly as the Brahman is like a cow, he can eat anything and everything as the cow does and remain a Brahman.”

Beyond the symbolic burning of Manusmriti, Ambedkar’s agenda was to reclaim the philosophy of Brahma as a principle for social organisation. Once Hegel remarked that the history of philosophy would be better if less deserts and merits are accorded to particular individuals — “the more it deals with thought as free, with the universal character of man as man, the more this thought, which is devoid of special characteristic, is itself shown to be the producing subject.” (Hegel, Lectures on the History of Philosophy) What Ambedkar proposes here is to free the concept of Brahma, which has the potential of founding a solid social bond of Maitri, necessary to achieve equality and liberty, and build a vibrant social democracy, from the Brahman who is like a cow…

(Ambedkar’s quotes are from Riddles in Hinduism: An Exposition to Enlighten the Masses, The Annotated Critical Selection, Navayana, Delhi, pp. 166-179)

कोरोना का पार्श्व-असर


अस्पताल में बेड की कमी
आक्सिजन की कमी
दवाइयों की अनुपलब्धि

स्वास्थ्य उद्योग के व्यापारिक हितों द्वारा
मरीजों और उनके परिवारों का दोहन
महंगी और गलत दवाइयों के पार्श्व-असर
ब्लैक फंगस का फैलना

शमशान घाट में जगह और जलावन की कमी
नदियों में तैरती लाशें

घर लौटते बेरोजगार प्रवासियों को मुर्गा बना
उनको रसायनों से नहलाना
उनका रेलगाड़ी से पटरी पर कटना

और भुखमरी

— यह थी 2020-21 के संकट की कहानी
जिसे अवसर बनाया गया
विकास का

जिसकी सीढ़ी पर चढ़ कर
बन गए अंबानी-अडानी
विश्व भर के अमीरों के अग्रणी

कोरोना का पार्श्व-असर
आज की ताजा खबर
संकट में है अवसर
आज भारत हो गया है धनी!

अधिनायक के गुण — बर्तोल्त ब्रेष्ट


अधिनायक साधारण फार्म हाउस में रहता है
बेहतर होता अगर सम्राट नीरो की तरह महल में रहता
और मेहनतकश आवाम के सिर पर छत होते।

अधिनायक माँस नहीं खाता
बेहतर होता कि वो दिन में सात बार खाता
और मेहनतकश आवाम को दूध मयस्सर होता।

अधिनायक पीता नहीं है
बेहतर होता हर रात सड़कों पर वह पीकर धुत्त रहता
और अपनी मदहोशी में वह सच बकता।

अधिनायक भोर से लेकर देर रात तक काम करता है
बेहतर होता अगर वह बेकार कहीं पड़ा रहता
तब ये दमनकारी कानून कभी नहीं बनते।

(बर्तोल्त ब्रेष्ट की कविता “Die Tugenden des Kanzlers” का अनुवाद। यहाँ Kanzler (चांसलर) का अनुवाद साधारणीकरण के हित में “अधिनायक” किया गया है। )

किससे ये डरती है?


बड़ी ही कमजोर ये सरकार है

किससे ये डरती है?
उससे
जो रोज़ मरती है?

सत्ता को जनता से डर है
सत्ता जो आती है जाती है

आना-जाना एक सतत सफर है
सत्ता को क्रिया की सततता से डर है

जनता मरती है,
फिर भी जनता अमर है
इसीलिए सत्ता को डर है!

A Note on Premchand and the Proletarian Context


“अब तो शहरों में मजदूरों की मांग है, रुपया रोज खाने को मिलता है, रहने को पक्का घर अलग। अब हम जनिंदारों का धौंस क्यों सहें, क्यों भर पेट खाने को तरसें? —  प्रेमाश्रम (Premashram)

While Premchand’s stories have numerous references to proletarian life, they generally portray a realist sad picture of a rickshaw-puller, of workers and the cesspool of urban life. However, a careful reading of Premashram shows how the presence of wage labour gave peasants of Awadh a context to act transcending the fatalism of rural life. 

The greatness of a fiction writer depends on her awareness of those aspects of reality which are essential to produce its fictionalised model and, of course, on her ability to connect them sensitively to generate such a model, which is then incubated to develop a full-scale narrative. It is not any “scientific knowledge” of the reality, but its sensitive awareness, which helps her uncover and/or discover those irrational and rational socio-psychological aspects, which non-fiction cannot even imagine to reach. 

It is important to remember that reality is not simply the real, i.e., what is, but what is not too, the unreal, the imaginary that stays with us as possibilities — again not just as actual possibilities, but also as remote and abstract possibilities, constituting the horizons of our imagination. Fictions work at the level of those horizons.

Premchand’s Premashram demonstrates his awareness of the rural reality of Awadh and of the constitutive conflicts.  He is able to capture the passive revolution that was changing the rural setting, and emergent class consciousness and solidarity among the rural poor grounded in their everyday class experience and conflicts.

The novel is able to provide us an insight into the antinomies of Indian nationalism too — we have characters representing patriarchal humanism of the rentier class, incipient calculative rural bourgeois landlord interests, enlightened bourgeois utopians, diverse levels of indigenous bureaucratic class, proletarianising peasantry, all feeding into the constitution of this nationalism.

The global context of  socialist movements, the Russian revolution and productive-technological evolution too become important elements in the novel as a constant background and through their discursive contributions. Many critics have of course mentioned this. 

But an element of the contemporary reality which in my view is very crucial to grasp the novel and Premchand’s astuteness has generally been ignored or has not been identified. It is the fact of rural-urban migration and wage labour which in this novel at least exists not as a sign of distress, but as an opportunity and freedom for the rural poor. Migration and wage labour are escape routes that allow the rural poor enough confidence especially among the youth to engage in open conflict with rural oppressors. 

It is not to say that Premchand considers wage labour to be an opportunity for a better life (in many of his stories he has shown the plight of migrants and wage labour). However, he is definitely aware, at least in Premashram, that the rural poor’s militancy is derived to a large extent from the proletarian context.

क्यूबा: खाई में या खटाई में?


मोर्चा, अक्टूबर 2021

1. क्यूबा के कवि सिन्तियो वितियेर ने दशकों पहले क्यूबा क्रांति के लक्ष्य को चिह्नित किया था — “nuestro desafío es construir un parlamento en una trinchera” (खाई में संसद बनाना हमारी चुनौती है)। खाई में संसद – इसके दो अर्थ होते हैं।  एक है कि संसद खाई में फंस गई, और दूसरा है कि खाई में धँसे लोगों ने अपनी संसद बनाई। क्यूबा में जब भी कुछ ऐसा होता है जो क्यूबा की राजसत्ता को चुनौती देता नजर आता है, तो क्यूबा के बाहर दो तरह की प्रतिक्रिया जन्म लेती है। क्यूबाई शासन के हितैषी इसमें बाहरी शक्तियों के षड्यन्त्र को देखते हैं और दूसरी ओर क्यूबाई  क्रांति के विरोधी इसमें अवसर देखते हैं।  दोनों ही खाई को खटाई ही समझते हैं, और मानते हैं कि क्यूबा को बाहरी साम्राज्यवादी शक्तियां खाई में ढकेल रही हैं । बस इतना ही अंतर है कि एक दुखी होता है तो दूसरा खुश होता है। यही माहौल जुलाई के महीने में देखने को मिला, जब महामारी के दौर में आज क्यूबा क्या विश्व के हर कोने मे जनता सामाजिक और आर्थिक दोनों ही दिक्कतों को झेल रही है। 

2. पिछले डेढ़ साल से कोरोना महामारी ने विश्व के सभी देशों में सामान्य जीवन अस्तव्यस्त कर रखा है। तमाम देशों की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं तो इस महामारी के समक्ष विफल हुई ही हैं, परंतु उससे भी अधिक सामान्य आर्थिक गतिविधियों और संबंधों पर इस महामारी का दूरगामी, गहरा और घातक असर पड़ा है। मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति और सेवाओं का  क्रियान्वयन व्यापक स्तर पर अवरुद्ध हुआ है। जिन देशों में कल्याणकारी जनस्वास्थ्य व्यवस्थाएं मौजूद थीं वे अपने आप को जल्दी संभाल पाईं, जैसे कि चीन जहां से इस बीमारी की शुरुआत हुई, और यूरोप के कुछ देश जहां स्वास्थ्य के क्षेत्र में बाजार की घुसपैठ अपेक्षाकृत कम  है। परंतु जिन देशों में स्वास्थ्य सेवाएं मूलतः बाजार आधारित रही हैं, वहाँ महामारी की विकटता अत्यंत आक्रामक दिखी — उदाहरणार्थ, संयुक्त राज्य अमरीका (सं.रा.अ.), भारत इत्यादि। तब भी जहां तक सामान्य जीवन पर दबाव बढ़ने की बात है, कमोबेश सारे देशों में इसके नतीजतन अलग-अलग स्तर के असंतोष का जन्म हुआ है। संयुक्त राज्य अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प की हार और बाइडन की जीत में महामारी का कुप्रबंधन भी एक प्रमुख कारण था। 

3. पिछले साल जब सं.रा.अ. में ट्रम्प प्रशासन कोरोना के संकट से आंख मिचौनी खेल रहा था, और यूरोप और बाकी दुनिया में भी तबाही मची हुई थी, उसी दौरान बगल में  छोटा सा पड़ोसी देश क्यूबा अपनी प्रभावशाली और व्यवस्थित जनस्वास्थ्य सेवाओं के जरिए महामारी के फैलाव को तकरीबन पूरी तरह से काबू मे रखे हुए था। यह हमें याद रखना चाहिए कि मेडिकल अन्तर्राष्ट्रीयवाद की बात क्यूबा के संदर्भ में ही ज्यादातर की जाती है, और स्वास्थ्य सेवाओं का निर्यात क्यूबा के अर्थतन्त्र का एक अहम हिस्सा है। अपनी स्वास्थ्य सेवाओं के  जनोन्मुख चरित्र और उनकी मजबूती के कारण 2020 में, जब बाकी विश्व महामारी के प्रकोप से त्रस्त था, क्यूबा में कोरोना से संक्रमितों की और मृतकों की संख्याएँ अल्पतम थीं।  परंतु 2021 आते ही क्यूबा में महामारी का असर दिखने लगता है। इस साल जून से संक्रमितों की संख्या में घातीय वृद्धि हुई है। ऐसी स्थिति में प्रशासकीय व्यवस्था से अलगाव और असंतोष स्वाभाविक है। यही तथ्य  जुलाई महीने में क्यूबा में हुए विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख तात्कालिक संदर्भ था। 

4. क्यूबा के हरेक संकट में अमरीका और उसके द्वारा संरक्षित पूंजीवादी आर्थिक और राजनीतिक हित अपने लिए अवसर देखते हैं। यही कारण है कि विश्व की  बड़ी तमाम मीडिया संस्थाएं और उनके दलाल जुलाई की घटनाओं को बढ़ाचढ़ा कर पेश कर रहे थे। उनका आकलन था कि क्यूबा की  राजनीति से फिदेल कास्त्रो और अन्य प्रारंभिक क्रांतिकारियों के हट जाने के बाद वहाँ के नेतृत्व के लिए इस तरह के संकट से निकलना मुश्किल होगा। अमरीकी तंत्र खुले तौर पर क्यूबा में सत्ता परिवर्तन के लिए लगातार माहौल गरम रखने की कोशिश करता रहा है। जब भाड़े वाले आतंकवादियों को शस्त्रों के साथ उतारने में कामयाब न रहा तो  कई सालों से वह आर्थिक बंदिशों द्वारा असंतोष और बगावत पैदा करने की कोशिश में लगा रहा है। इन प्रतिबंधों का असर संकट के दौर में और भी साफ दिखता है। आज जब क्यूबा ने अपने वैज्ञानिकों के मेहनत के बलबूते पर कोरोनावाइरस के खिलाफ कई बेहतरीन वैक्सीन तैयार कर लिए हैं, जो बच्चों के लिए भी कारगर हैं, तब अचानक वैक्सीन देने के लिए आवश्यक सिरिंज की कमी हो गई है। जुलाई के प्रदर्शनों में निहित असंतोष को प्रतिबंधों के तथ्य और उनके तात्कालिक असर से काट कर नहीं देखा जा सकता। 

5. ओबामा प्रशासन के वक्त इन बंदिशों में ढील दी गई थी क्योंकि यह माना जा रहा था कि इनसे बाजार का विकास होगा और नतीजे के तौर पर पूंजी-पक्षीय सामाजिक और राजनीतिक बदलाव की संभावना बढ़ेगी। उदारवादी पूंजीवादी तबके में 2000 के दशक से ही यह समझ बनती दिखाई देती है कि लातिन-अमरीका पर आर्थिक बंदिशों और राजनीतिक हस्तक्षेपों का उल्टा असर हो रहा है और क्षेत्रीय वामपंथ मजबूत होता जा रहा है। उनका मानना है कि वांछित बदलाव के लिए मिलिट्री व खुलमखुला राजनीतिक दखलंदाजी के बजाए बाजार ज्यादा कारगर साबित हो सकता है। 

6. पिछले तीन दशकों का अनुभव ऐसा ही बताता है। इस दौरान में विश्व ने कई रंगीन (प्रति)क्रांतियों को देखा है, जिसने पुराने समाजवादी और राजकीयवादी शासनों को ढहा दिया — वे वित्त-पूंजी संचालित पूंजीवादी भूमंडलीकरण के सामने नहीं टिक पाए। उन शासनों ने एक समय राष्ट्रीय आर्थिक विकास के वैकल्पिक मॉडल के रूप में अपनी पहचान बनाई थी। परंतु 1960 के दशक से कल्याणकारी पूंजीवाद के बढ़ते संकट के परिपेक्ष्य में वित्तीय पूंजी के मौन अंतःसरण ने उनके औचित्य को ही नकार दिया। अपने आप को बचाने की  होड़ में अपने अंतिम दिनों में महज सत्ताई आतंक पर वे निर्भर होते चले गए — और गठित सत्ता (constituted power) से घटक सत्ता (constituent power) अलग होती चली गई। यही 1989 से 1992 के बीच मे तथाकथित समाजवादी देशों के अन्तःस्फोटन का चरित्र था। आगे चल कर अन्य राजकीयवादी शासनों का भी यही हश्र हुआ। 

7. इन व्यवस्थाओं में जिन्होंने समय के अनुसार वित्तीय नेटवर्क में अपनी जगह बना ली, वे विश्व पूंजीवाद के लिए बाजार बनने के अलावे सस्ता अनुशासित श्रम और अन्य संसाधन मुहैया करने के साधन हो गए। उन्होंने अपने अस्तित्व को बचाने हेतु पूंजीवादी व्यवस्थाओं के साथ विकासवादी प्रतिस्पर्धा में घोर उत्पादनवाद को अपना लिया (“संचय की खातिर संचय”, “उत्पादन की खातिर उत्पादन” — मार्क्स) और अंत मे पूंजी के अंदरूनी तर्क के अंश बन गए। निष्कर्षतः, शीत युद्ध और हथियारों की प्रतिस्पर्धाई होड़ ने अपना काम कर दिखाया। ये व्यवस्थाएं कई मायने में अन्तःस्फोट के शिकार हो गए, साम्राज्यवादी शक्तियों को इन्हें आक्रमण द्वारा हटाने की जरूरत नहीं पड़ी। चीन तो पहले ही विश्व पूंजीवाद के विकास का सबसे महत्वपूर्ण इंजन बन चुका था। वियतनाम औऱ उत्तरी कोरिया में अमरीका की हार को हम सब याद करते हैं, परंतु उन जीतों के बावजूद आज वित्त-पूंजी ने वियतनाम के अर्थतन्त्र को पूर्णतः अपने शिकंजे में ले लिया है, और प्योंगयांग अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम के कारण और नव-ध्रुवीकरण की संभावनाओं के कारण जिंदा है। 

8. इस सहस्राब्दी के आते ही नए तरह का जन-प्रतिरोध पैदा होता दिखता है, और विशेषकर लातिन अमरीका में नव जनतान्त्रिक और समाजवादी लक्ष्यों को राजकीय स्वरूप देने की प्रक्रिया शुरू होती है। प्रथम दशक में वेनेजुएला, बोलीविया, अर्जेन्टीना और अन्य देशों में राजनीतिक बदलाव डॉलर के एकाधिकार को सीधी चुनौती देते हैं। उसके खिलाफ अमरीकी बंदिशें विफल होती नजर आती हैं। उलटे लातिन-अमरीका में पहली बार एक मजबूत साम्राज्यवाद-विरोधी अंतर्राष्ट्रीय तालमेल पैदा होता दिखाई देता है, जिसमें क्यूबा की राजनीतिक-वैचारिक साख साफ तौर पर बढ़ती दिखती है, और अमरीकी बंदिशों के बावजूद, उसके अर्थतन्त्र को व्यापक सहारा मिलता है। यही वजह है कि ओबामा प्रशासन को अमरीकी राजनीतिक आर्थिक डिप्लोमेसी में बदलाव लाना पड़ा, जिसके तहत वह लातिन अमरीका में फूट डालो और राज करो को ही बढ़ाते हुए दोहरी नीति अपनाता है। एक तरफ दक्षिणी अमरीकी देशों में वामपंथी शासनों के खिलाफ स्थानीय विपक्षों को खुले तौर पर वित्तीय और राजनीतिक संरक्षण देता है और दूसरी तरफ क्यूबा के साथ दोस्ताना हाथ बढ़ाते हुए आर्थिक बंदिशों में कई स्तरों पर ढील देता  है। आशा वही रही है कि क्यूबा में भी बाजार का तर्क सामाजिक और संपत्ति रिश्तों को बदलने में मदद करेगा, और अंततः राजनीतिक परिवर्तन को अंजाम देगा। 

9. 2010 के दशक में एक बार फिर लातिन अमरीका में दक्षिणपंथी और वैश्विक वित्तीय नेटवर्क के सहयोगी पार्टियों का वर्चस्व कायम होता दिखता है। इस अचानक परिवर्तन का मुख्य कारण भी यही नेटवर्क है जिसने विश्व के तमाम राज्यों को जकड़ रखा है, और राजकीयवाद के दायरे में इसके चंगुल से बचना मुश्किल है। इस बदलाव ने एक बार फिर क्यूबा की क्रांति को आत्म-रक्षात्मक रुख दे दिया था। ओबामा प्रशासन ने इस मौके का इस्तेमाल करते हुए पूंजीवादी बाजार के अंतर्गत आने को प्रेरित करता रहा। आर्थिक बंदिशों में ढील ने अवश्य ही कुछ हद तक ऐसा ही किया, और कई स्तरों पर बाजार का विस्तार हुआ है।  क्यूबा को इसी के द्वारा सांस लेने के लिए राहत भी मिली। दशकों से आवश्यक वस्तुओं के आयात-निर्यात पर सं.रा.अ. के बंदिशों का असर क्यूबा के उत्पादन और उपभोग के क्षेत्रों को प्रभावित करता रहा है। अवश्य ही इन बंदिशों का क्यूबा की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव भी पड़ा है, आर्थिक और राजनीतिक स्वावलंबन अत्यंत मजबूत हुआ है। तब भी ये प्रतिबंध आर्थिक विस्तार को संकुचित और उसकी गति को मद्धम करते रहे हैं, क्योंकि उस विस्तार और उसके सुदृढीकरण के लिए आवश्यक सामग्रियों की कमी को निरंतर झेलना पड़ता है। ओबामा प्रशासन द्वारा बंदिशों में ढील बड़ी राहत थी, परंतु उस राहत का पर्याप्त फायदा उठाने के लिए पूंजीवादी बाजार और वित्तीय पूंजी के संरचनात्मक दबाव से समझौता करना पड़ता है, और जिसके नतीजे हैं —  क्यूबा के राजनीतिक अर्थशास्त्र में पूंजीवादी संपत्ति और उत्पादन संबंधों को अहम जगह मिलती जा रही है, समन्वय और सहयोग पर आधारित सामाजिक संबंधों के खिलाफ मुनाफाखोरी और प्रतिस्पर्धात्मक मूल्यों का विकास हो रहा है, और प्रतिक्रांतिकारी हितों की राजनीतिक एकजुटता कायम होने की संभावना पैदा होती दिखाई दे रही है। इन्हीं नतीजों का संकेत जुलाई के प्रदर्शनों में दिखता है।

10. 2016 के बाद से ट्रम्प और अब बाइडेन प्रशासनों ने ओबामा की उदारवादी क्यूबा नीति को छोड़ पुरानी आक्रामक नीति को फिर से बहाल किया है। इस नीति में बदलाव एक बार फिर से बंदिशों में जकड़ कर क्यूबा के अंदर प्रतिक्रियावादी विपक्ष को सशक्त करने की कोशिश को दिखाता है — क्योंकि सं.रा.आ. के सत्ताधारी वर्ग को क्यूबा शासन की लोकप्रियता में कहीं कमी आती नहीं दिखती है। जुलाई के प्रदर्शनों में इस नीति का कुछ हद तक खुला क्रियान्वयन दिखता नजर आया। 

11. यह अवश्य है कि बाहरी दोस्तों और दुश्मनों दोनों को विपक्ष में केवल प्रतिक्रान्तिकारी लोग दिखते हैं जिन्हें मियामी फंड करता है, जबकि राजसत्ता के आलोचकों में सर्वाधिक क्रांति-समर्थक विपक्ष है जो आर्थिक सुधारों की आलोचना करता है जिनकी वजह से पूंजीवादी तबके सशक्त हो रहे हैं। यह क्यूबाई क्रांति की एक विशेषता की ओर इंगित करता है कि उसने क्रांति को स्थायित्व (स्टबिलिटी) के समानार्थी कभी  नहीं देखा। इस वजह से क्यूबा में यथास्थितिवाद के खिलाफ लगातार संघर्ष मौजूद रहा है। स्थायित्व के खूंटा-गाड़ संस्कृति के खिलाफ क्यूबा की क्रांति में अनित्यता के सिद्धांत का क्रांतिकारी समन्वय है। पूंजीवादी विश्व मे क्रांति की अपूर्णता और अविच्छिन्नता की अनिवार्यता को मानते ही हुए सामाजिक क्रांति की वर्चस्वता को लगातार पुनरुत्पादित किया जा सकता है। शायद आज भी क्यूबा के क्रांतिकारी “खाई में संसद” चलाने के दायित्व को गंभीरता से लेते हैं। और यही वजह है कि क्यूबा में आज भी क्रांति जिंदा है — हाँ, उसकी गति ग्राफ के उतार-चढ़ाव में बहुत हद तक बदलती अंतरराष्ट्रीय स्थिति निर्णायक भूमिका निभाती है। 

राजनीतिक विकल्प: चुनावी या आंदोलनकारी (Political Alternatives: Electoral or Movemental)


राजा का डर – पास्कल


महान फ्रांसीसी दार्शनिक और गणितज्ञ ब्लेज़ पास्कल की पुस्तक पौंसे (Pensees) के एक अनुच्छेद का अनुवाद

राजाओं को आदतन सिपाहियों, नगाड़ों, अफसरों और अन्य चीजों के साथ देखा जाता है जिनसे आदर और डर की भावनाएँ जागृत होती हैं – इस तथ्य का नतीजा यह होता है कि जब कभी-कभी वे अकेले और बिना किसी के साथ पाए जाते हैं, तो उनकी मुखाकृति ही काफी होती है प्रजा में आदर और भय पैदा करने के लिए, क्योंकि हम उनके व्यक्तित्व और परिचारक-वर्ग, जिसके साथ वे साधारणतया जोड़ कर देखे जाते हैं, के बीच मानसिक अंतर नहीं करते। और संसार जो नहीं जानता है कि यह आदत का असर है सोचता है कि यह किसी प्राकृतिक शक्ति से प्राप्त है, तभी तो इस तरह की कहावतें मिलती हैं – “उसके चेहरे पर ही दैविकता की छाप है”।

On the Significance of the Polemical in Marxism


1

A polemic for revolutionaries is a militant dialogic practice to reveal the contradictions of a position, hammering it down to break open its hardened crust in order to rescue life from the stifle of the canon. It is akin to the Socratic dialectic or a militant वादकथा in the Indian tradition, where you demonstrate the limits of a given position – you don’t deny its truth, you begin from it, while going beyond it through the process of dialectical sublation.

However, standard polemics are mere means of defending a canonised position against every particular context. They fetishise forms as in the old tradition of liturgical polemics. Such polemics oscillate between captions criticism or वितंडावाद and जल्पकथा seeking to vanquish the opponent.This polemical exercise is totally opposite of the conception of immanent critique so essential to Marxism. It dualises the text and the context, and then trims the latter to fit the former. This is what can be called lilliputianism —tickling and tempting the giant, while attempting to bind him with the fragile threads of mental schemas.

2

The purpose of a revolutionary polemic is not just defending a position against another, but to clarify and sharpen one’s own by assimilating the partial but essential truth of the other, while rejecting its form. The polemical form is a means of unfolding one’s own position — towards “self-revelation”. That is why emerging from the polemical furnace the position actually doesn’t remain the same. A proof is Marx’s treatment of Feuerbach, Stirner, Bauers & c. in The German Ideology or of Proudhon in The Poverty of Philosophy or even The Holy Family. This polemical phase of Marx’s biography had the sole purpose of clarification (which included self-clarification, as Marx later mentions in the preface to his The Contribution to the Critique of Political Economy).

This polemical form that we see dominating in many of Marx’s early writings mutated into an important formal and literary element of his critique of economic categories, of his practice of immanent critique. This is evident in his published and unpublished economic writings. It never lost its vigour, the proof is Capital itself, where it helps in building the rigour. In fact, Marx is at his polemical best in all these writings —eg., his fragments on Bastiat and Carey in Grundrisse.

3

On Anti-Dühring

Engels’s Anti-Dühring is a landmark in Marxist discourse and practice. It is arguably the most important exercise in the polemical clarification of ideas within the tradition of the working class movement and Marxism. The German Ideology, which could compete, remained in the notebooks. “We abandoned the manuscript to the gnawing criticism of the mice all the more willingly since we had achieved our main purpose – self-clarification.” Anti-Dühring, on the other hand, was the movement’s self-clarification.

For a century at least, Anti-Dühring continued to be the model of Marxist polemics for both revisionist and revolutionist Marxists. In fact, it became a foundational textbook for learning Marxism throughout the globe. It is a polemical text (as clear from the name itself) with the purpose of systematic self-clarification. Nobody reads this text to know the blunders of Dühring, but everybody comes to it for the most accessible treatment of various tenets of Marxism.

But then a textbook always has its limitations and drawbacks. This is true about every good polemical text too —it has a pedagogical significance, students must outgrow it. But like any textbook, such texts become the texts of institutional orthodoxy, not a mere initial stepping stone — not just a transitory moment in theoretical development. The polemical form is autonomised, it becomes an end in itself, not a means of self-clarification. This has been the fate of many of Engels’ works, especially Anti-Dühring, in the hands of Marxist believers.

4

The recent phenomena of academic industrialisation and corporatisation of Marxism through the depoliticised liberal formal academia, on the one hand, and of the supra-political institutionalisation of public intellectual Marxism, on the other, by the publishing industries have marginalised the polemical aspect of Marx and Engels’ works (especially Engels’) to insignificance. It has been reduced to a mere literary form or style appropriate for twitter, Facebook and other social media channels.

However, the political-pedagogical nature of the polemical and its unique relevance in the development of Marxism and working class politics in general can scarcely be denied. It is definitely a form, but which is organic to the essence of Marxism. It is very different from the schematic lilliputianism of sectist politics that seeks to dominate and annihilate. It emerges as a method to demonstrate limits of ideas, positioning them to various levels of abstraction, while approximating the concrete in thought through the dialectic of the polemical dialogue.