हवा तो निकलनी ही है


समय पर बांध सत्ता है वो भ्रम है
नहीं क्योंकि वो सत्य नहीं है ऐसा नहीं है
वह सत्य है मगर शाश्वत नहीं है
बांध को टूटना ही है उसको टूटना ही होता है

समय दस्तक देता है घड़ी के टिकटिक की तरह
मगर समय घंटों के रहम पर नहीं है
घंटियाँ हमें सतर्क करती हैं
बांध कभी भी टूट सकता है

कितना सैलाब रोकोगे देख लो
उसका आक्रोश बढ़ता चला जाएगा
नतीजा हमारे हदों में नहीं है
उबलते पानी को भाप बनना ही है

समय को पहचानों हर मौसम के लिये
तैयार हो ऐसा हो नही सकता
तुमने कैलेण्डर बना लिया घड़ी बांध ली
तो सोचा समय को बांध लिया

समय का रूप ही क्या है बढ़ती धार है
अदृश्य तलवार है चक्र में क्या बांधोगे
सत्ता की हवा निकलनी ही है
आज नहीं तो कल हमें इंतज़ार है

समुन्दर के साथ (रूमी के सहारे: १)


साथ रहना, डूबना मत मछलियों जैसे
कहीं नींद में तुम।
बहते रहो रात भर समुन्दर के साथ,
मत बिखरना बारिशों की तरह।

जो बसंत हम खोजते हैं
यहीं कहीं छुपा है धुंध में।
देखो रात जगमगाती साथ चलती है,
दीपक अभी भी जागता है सोने की अपनी थाली में।

कहीं ज़मीन के दरारों में बिखरे पारों की तरह मत खोना।
जब चाँद नज़र आए तब देखना तुम।

तुम्हारा ही प्रतिरूप है


वह कहीं का नहीं है क्योंकि वह सब जगह है
वह कहीं का नहीं है इसीलिए वह सब जगह है
वह ऊपर और नीचे दोनों जगह अपनी टांगें जमाए हुए है
उसका यही योग श्रृंखलाओं में बांधे हुए है तुमको और उनको

उसकी विद्युत गति तुम्हें उसकी अगति और रूढ़िता लगती है
उसके चाल और पहनावे को ही देखते हो तुम
और उनमें तुम्हें असामंजस्य दिखता है
उसके परिष्कृत भोंडेपन में वैमनस्य दिखता है
उसे देख वैमनस्य जगता है

मगर वही है जो नीचे की आकांक्षाओं की घातकता को जानता है
और वही है जो उसको अपने में भर लेता है
एक मिसाइल की तरह एक ही छलांग में सीमा पार उसे छोड़ देता है
और कभी सीमा के अंदर भी इसकी जरूरत होती है

दूर विस्फोट का हल्का असर तुम पर भी पड़ता ही होगा
और तुम दुबक जाते हो
ध्यान नहीं है तुम्हें
तुम्हारी बौद्धिकता की गगनचुम्बी इमारतों की नींव अब भी नीचे ज़मीन के अंदर ही होती है
उसने तुम्हें बचाया है

उसने तुम्हें बचाया है
क्योंकि उसको तुम्हीं से प्यार है
वह तुममें से एक होना चाहता है
वह तुम्हारे भय और नीचे उभरते आक्रोश का औसत है
वह औसत आदमी की दबी आकांक्षाओं की मूर्ति है
वह तुम्हारा ही प्रतिरूप है
पहचानो उसे!

उत्साह


यानिस रित्सोस

जिस तरह चीज़े धीरे-धीरे खाली हो गयी हैं,
उसके पास करने को कुछ नहीं है। वह अकेला बैठता है,
अपने हाथों को देखता, नाख़ून – अजनबी लगते हैं –
बारबार अपनी ठुड्डी छूता है, कोई और ठुड्डी
लगती है, बिलकुल ही अजनबी,
इतनी नितांत और स्वभावतः अजनबी कि उसे खुद
इसके नएपन में मजा आने लगा है।

Nobel to Abhijit Banerjee: who celebrates and why


The Nobel prize to Abhijit Banerjee seems to have given a fresh lease of life to the embattled identities of JNUites and Bengali intellectuals, even for many leftists who are caught up in dystopic existentialism, and hence are unable to see beyond immediacies. The general secretary of the biggest communist party in India said:

He again twits:

Another erudite general secretary of a radical communist party twitted:

However, Banerjee himself is busy dissociating himself from any political tag quite vocally and finds himself to be a mere surgeon who will cut into anything that comes on his table (or a mere plumber who will make this table!)- it is not about right and left. In fact, he has been working with all sorts of governments. Just because he was a JNUite or he criticised the Modi government’s particular policies, he is being celebrated by the anti-Modi forces, whether rightist, leftist or centrist. Of course, the Modi ministers themselves are becoming jittery at the wake of the deepening economic crisis, and are losing sanity by disowning people like Manmohan Singh, Banerjee & co (a point made by none other than Parakala Prabhakar, India’s Finance Minister Nirmala Sitharaman’s husband). And leftists too caught up in the cycle of reaction along with official rightists have lost all tactfulness.

Politically, the awarding of the Nobel prize in economics this year is a recognition by bourgeois (finance capital) internationalism and its agencies that rightist neoliberal etatist minimalism that has emerged globally, if left to itself, will not be able to contain and sublimate the growing discontentment in societies towards serving the bourgeois interests. As a result, the states might collapse or will start going beyond policing usurping the domain of the economic. The global corporate social responsibility (CSR) institutions must take over the task through the networks of NGOs throughout the globe and palliate the soaring social injuries, while productivising them for the benefit of capitalist expansion.

Abhijit Banerjee and his colleagues have been at the forefront of creating a model of treating poverty as a disease. They have been involved with states and corporate institutions in this regard for a very long time. And, we know, a disease is not just itself, it is a great industrial opportunity too (the booming hospital and pharmaceutical industries are clear examples). The Nobel laureates of this year have shown through randomized controlled trials how to dynamically customise strategies to recognise symptoms and provide palliatives or incentives to integrate the poor in the mainstream network of commodity market and finance. This capitalist inclusiveness is what Negri called differential inclusion. It is undoubtedly an effective tactic to encourage capitalist accumulation from below within a post-fordist neoliberal frame that allows heterogeneity in entrepreneurial forms (by including pakodawallahs, chaiwallahs etc), while networking them through finance.

Whether we recognise it or not, demonetisation and GST in India have at least created the digitised infrastructure to put such an effort in place. As Marxists we know, this will never be able to save capitalism from crisis, but it may have the impact of deferring the collapse.

So, comrades, is this a cause enough to celebrate?

The Banking Crisis


Your sweat measured
Barrelled at the banks of the market
To be thrown in the deluge
In the hope of a golden axe golden tears

But the giving spirit
Suffers Midas’ gluttony
Stands immobile
Amidst waves
Lashing the isle of liberty.

बीमारी सच बोलने की


वे हैं तो सब कुछ मुमकिन है
क्योंकि इन सब के बाद भी वे हैं
और तुम सोचते हो उनको नंगा
और अपने आपको बालक

जो कि तुम बिलकुल हो अबोध
अपने ख्यालों की दुनिया की
सच्चाई को ही सच्चाई मानते
और पनचक्की पर वार करते हो

ये बीमारी सच बोलने की
बेवकूफी है कि तुम्हें कौन सुनेगा
जो सुनते हैं वे जानते हैं
वे तुम्हीं हो अपने आपको सुनते

मगर यह सच उनका नहीं है
जिन्हें तुम सुनाना चाहते हो
बताना चाहते हो सच्चा सच
आंकड़ों में ढूंढ़ते हो जिन्हें

वे अपना सच अपनी रोज़
की थकान में गुज़ार देते हैं
तुम्हारे आँकड़े उस कशमकश
के नतीजों को मापते हैं

मशीनों से पसीनों की जूझ
व उनके गंध तक नहीं पहुँचते
जहाँ खून और तेल के मिलाप से
अजीब सा नशा फैल जाता है