तार टूट गए


कैसे फिर से एक नई लय बनाऊँगा

जो बनी थी
और रखी थी सँजो कर मैंने

उस पर धूल और समय के बोझ
लदते चले गए

खबर ही नहीं थी
और तार टूट गए

फिर से तार तो जुड़ जाएँगे
मगर लय वह नहीं होगी

मगर क्या लय ही नहीं होगी
ऐसा तो नहीं

The General and the Specific in the Working Class Movement


Notes on Various Prefaces of the Communist Manifesto

Published in Padakkhep

In prefaces that Marx and Engels wrote for various German and other language editions of The Manifesto of the Communist Party, they reread the text in specific geographical and historical contexts. This gave them the opportunity to (re)historicise the text itself and (re)articulate the general principles in multiple contexts and in sharper ways. In fact, this exercise is never complete with regard to a text like the Manifesto, and only this way it “would be possible to revitalise [its] propaganda effect,” as Brecht once put it.

In almost all the prefaces, the central idea is that in accordance to time and space, “the state of things may have altered”, however, without affecting the general principles. It is recognised that “the practical applications of the principles” are dependent on historical conditions. Hence, Marx and Engels without any remorse declared in the 1872 German edition that revolutionary measures enumerated in section II must be altered according to time and place. Similar was the case of section IV about the communists’ relations with other parties which were in principle correct but most of the parties had already been eliminated by the progress of history itself.

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क्या खबर?


कोई खबर नहीं है वतन से
कि हमको आदत पड़ी है
कि हम सोते रहें और खबर मिल जाए

कि कल तक तो कोई चिंता नहीं थी
खबर भी नहीं थी
जरूरत नहीं थी

सिर पर बहुत बोझ आन पड़ा था
मुश्किल में खुद ही कल तक पड़ा था
आज अब मौका मिला है

खबर खोजते हैं
जिनके सहारे
अपनी खबर हम खुद को सुनाएँ

हवा तो निकलनी ही है


समय पर बांध सत्ता है वो भ्रम है
नहीं क्योंकि वो सत्य नहीं है ऐसा नहीं है
वह सत्य है मगर शाश्वत नहीं है
बांध को टूटना ही है उसको टूटना ही होता है

समय दस्तक देता है घड़ी के टिकटिक की तरह
मगर समय घंटों के रहम पर नहीं है
घंटियाँ हमें सतर्क करती हैं
बांध कभी भी टूट सकता है

कितना सैलाब रोकोगे देख लो
उसका आक्रोश बढ़ता चला जाएगा
नतीजा हमारे हदों में नहीं है
उबलते पानी को भाप बनना ही है

समय को पहचानों हर मौसम के लिये
तैयार हो ऐसा हो नही सकता
तुमने कैलेण्डर बना लिया घड़ी बांध ली
तो सोचा समय को बांध लिया

समय का रूप ही क्या है बढ़ती धार है
अदृश्य तलवार है चक्र में क्या बांधोगे
सत्ता की हवा निकलनी ही है
आज नहीं तो कल हमें इंतज़ार है

समुन्दर के साथ (रूमी के सहारे: १)


साथ रहना, डूबना मत मछलियों जैसे
कहीं नींद में तुम।
बहते रहो रात भर समुन्दर के साथ,
मत बिखरना बारिशों की तरह।

जो बसंत हम खोजते हैं
यहीं कहीं छुपा है धुंध में।
देखो रात जगमगाती साथ चलती है,
दीपक अभी भी जागता है सोने की अपनी थाली में।

कहीं ज़मीन के दरारों में बिखरे पारों की तरह मत खोना।
जब चाँद नज़र आए तब देखना तुम।

तुम्हारा ही प्रतिरूप है


वह कहीं का नहीं है क्योंकि वह सब जगह है
वह कहीं का नहीं है इसीलिए वह सब जगह है
वह ऊपर और नीचे दोनों जगह अपनी टांगें जमाए हुए है
उसका यही योग श्रृंखलाओं में बांधे हुए है तुमको और उनको

उसकी विद्युत गति तुम्हें उसकी अगति और रूढ़िता लगती है
उसके चाल और पहनावे को ही देखते हो तुम
और उनमें तुम्हें असामंजस्य दिखता है
उसके परिष्कृत भोंडेपन में वैमनस्य दिखता है
उसे देख वैमनस्य जगता है

मगर वही है जो नीचे की आकांक्षाओं की घातकता को जानता है
और वही है जो उसको अपने में भर लेता है
एक मिसाइल की तरह एक ही छलांग में सीमा पार उसे छोड़ देता है
और कभी सीमा के अंदर भी इसकी जरूरत होती है

दूर विस्फोट का हल्का असर तुम पर भी पड़ता ही होगा
और तुम दुबक जाते हो
ध्यान नहीं है तुम्हें
तुम्हारी बौद्धिकता की गगनचुम्बी इमारतों की नींव अब भी नीचे ज़मीन के अंदर ही होती है
उसने तुम्हें बचाया है

उसने तुम्हें बचाया है
क्योंकि उसको तुम्हीं से प्यार है
वह तुममें से एक होना चाहता है
वह तुम्हारे भय और नीचे उभरते आक्रोश का औसत है
वह औसत आदमी की दबी आकांक्षाओं की मूर्ति है
वह तुम्हारा ही प्रतिरूप है
पहचानो उसे!

उत्साह


यानिस रित्सोस

जिस तरह चीज़े धीरे-धीरे खाली हो गयी हैं,
उसके पास करने को कुछ नहीं है। वह अकेला बैठता है,
अपने हाथों को देखता, नाख़ून – अजनबी लगते हैं –
बारबार अपनी ठुड्डी छूता है, कोई और ठुड्डी
लगती है, बिलकुल ही अजनबी,
इतनी नितांत और स्वभावतः अजनबी कि उसे खुद
इसके नएपन में मजा आने लगा है।