श्रीलंका का संकट और “जनता अरगलय”  


“हम नहीं जानते और न ही जान सकते हैं कि संसारव्यापी आर्थिक और राजनीतिक संकट के परिणामस्वरूप सभी देशों में उड़ने वाली असंख्य चिंगारियों में से कौन सी चिंगारी आग को भड़काएगी, यानी जनता को उठा खड़ा कर देगी।” — लेनिन (1920)

I

श्रीलंका की हाल की घटनाएँ आशा और निराशा दोनों ही पैदा करती हैं — अगर एक तरफ पिछले कई महीनों से दिखती जन-क्रियाओं की दृढ़ता, निरंतरता और  बहुआयामिता को देख कर आशा पैदा होती है, तो दूसरी तरफ इन घटनाओं के तात्कालिक नतीजे निराश करते हैं। यह बात सही है कि जिस फुर्ती से आंदोलन के नतीजतन राजसत्ता के चिह्नित मोहरे अप्रैल से जुलाई के अंतराल में एक एक कर लुढ़क रहे थे — मंत्रियों की कैबिनेट,  केन्द्रीय बैंक के गवर्नर, प्रधानमंत्री, और अंत में राष्ट्रपति गोताबया का देश से भागना और बाहर से इस्तीफा देना — उतनी ही तेजी से नए मोहरे जुलाई के मध्य से सत्ता की सीढ़ियों पर चढ़ते गए। श्रीलंका में जहाँ तमाम राजनीतिक आभिजात्य संकर नस्ल के हैं — यानी उनके बीच आंतरिक और आपसी प्रजनन (केवल वैचारिक नहीं) की एक मजबूत परंपरा रही है, वहाँ महान इतालवी लेखक ज्यूसेप्पे तोमासी दी लांपेदूजा के उपन्यास “इल गात्तोपार्दो” (तेंदुआ) का व्यवस्थापरक कूटनीतिक निचोड़ — Cambiare tutto perché niente cambi (सब कुछ बदलो ताकि कुछ न बदले) पूरी तरह से लागू होता है। और कई दशकों से यही होता रहा है। 

परंतु इस बार कुछ तो अलग हुआ  —  श्रीलंका में वैश्विक सत्ताओं को भी श्रीलंका के इस आभिजात्य वर्ग की क्षमता पर शक होने लगा। यही वजह थी कि अमरीकी राजदूत जुली चुँग भूतपूर्व-“क्रांतिकारी आतंकवादी” जनता विमुक्ति पेरामुन (जेवीपी) के नेतृत्व को भी एक विकल्प के रूप में पेश करने लगीं। इन पिटे हुए नेताओं से मिलकर चुँग ने कहा कि “मुझे पता है कि अतीत में बहुत सारी बयानबाजी हुई थी”, परंतु आज “मेरे लिए जेवीपी एक महत्वपूर्ण पार्टी है। उसकी मौजूदगी बढ़ रही है। आज की जनता पर उसकी पकड़ मजबूत है।” सचमुच सब कुछ बदलना पड़ता है ताकि कुछ न बदले। परंतु विक्रमसिंघे के राष्ट्रपति पद पर काबिज होने और भूतपूर्व त्रात्स्कीपंथी दिनेश गुणवर्देन के प्रधानमंत्री पद को संभालने से जेवीपी की बढ़ती महत्वाकांक्षा को एक हास्यास्पद अंत मिला, और फिलहाल सब कुछ बदलने की जरूरत नहीं पड़ी।

जो श्रीलंका की घटनाओं में निश्चित यथेष्ट “क्रांतिकारी” बदलाव देखना चाहते थे उनको अवश्य ही यह नतीजा उदासीन करता है। मगर तात्कालिक  राजनीतिक बदलावों से आंदोलन की महत्ता तय नहीं होती। ऐसे बदलावों में क्रांति को ढूँढ़ने वाले यह  भूलते हैं कि फ्रांसीसी क्रांति ने पूंजीवाद को पैदा नहीं किया, पूंजीवाद ने फ्रांसीसी क्रांति को जन्म दिया; या फिर, रूसी क्रांति बोलशेविकों के दिमाग की उपज नहीं थी, सोवियतों और अन्य सामाजिक सरोकारों में होते बदलावों ने रूसी क्रांति को जन्म दिया। नतीजों के आधार पर अगर जन उभारों और क्रांतियों के औचित्य को तय करेंगे तो निराशा हाथ लगनी ही है। यदि हम इन आंदोलनों को  जन-क्रिया के संघटन और अवस्थाओं के रूप में न देखकर कर्मफलहेतु समझते रहेंगे हमें ये आंदोलन विफल क्या निरर्थक भी लगेंगे — और तब तो बीसवीं सदी की महान क्रांतियों और प्रतिक्रांतियों के सौ साल को हम एक जगह पर घूमने वाले चक्र की तरह देखेंगे और हम नहीं समझ पाएंगे कि किस प्रकार सर्वहारा जन की क्रियाओं और उनके सामूहिक आत्मनिर्णय ने पूंजीवाद के तमाम अवतारों को संकटग्रस्त रखा, उनको भी जो सर्वहारा क्रांतियों में जनित सत्ता के अलगाव के मूर्तरूप थे और जिन्हें समाजवाद का नाम दिया गया था। 

श्रीलंका को लेकर तमाम व्याख्याओं में जन-संघर्ष (जनता अरगलय) को जीवन-स्तरों में गिरावट को लेकर श्रमिक वर्ग (खास तौर पर उसके मध्य-वित्तीय तबके — इन्हें ही मध्यम वर्ग आजकल कहते हैं) की प्रतिक्रिया के रूप में देखा गया है। इनकी दृष्टि में जनता क्रियाशील नहीं प्रतिक्रियाशील है। वर्चस्वकारी शक्तियों के बौद्धिक सिपाही इसमें कुछ विपक्षीय दलों और राष्ट्रविरोधी तत्वों का षड्यंत्र देखते हैं तो प्रगतिशील लोग आशातीत होते हैं परंतु वांछित नतीजा न देखकर आंदोलन के अंदर राजनीति और राजनीतिज्ञों की कमी का रोना रोते हैं। श्रीलंका के संदर्भ में तो कुछ लोग इसे चीन के खिलाफ अमरीका के नेतृत्व में साम्राज्यवादी खेमे की चालबाज़ी देखते हैं। इन सभी व्याख्याकारों के लिए जन-क्रिया की कोई स्वायत्तता नहीं है — व्यवस्था के व्याकरण में जनता औसत व्यक्तियों अथवा नागरिकों की भीड़ है जो केवल अपनी प्रतिक्रिया दे सकती है, कोई पहल नहीं कर सकती।  

II

पूंजीवादी संकटों को महज आर्थिक प्रबंधन की कमजोरियों और गलत नीतियों के नतीजे के तौर पर देखना तो अवश्य ही गलत है, परंतु इन संकटों की वस्तुनिष्ठता को सामाजिक व्यवहार और संघर्षों के दायरे से परे समझना शायद उससे भी बड़ी गलती है। कम से कम मार्क्सवादियों का यह वैचारिक-कार्यक्रमात्मक दायित्व है कि वे जन-संघर्षों में इस तरह की द्वैतवादी अपरिष्कृतता की आलोचना करें ताकि ये संघर्ष व्यवस्था-बद्ध वर्चस्वकारी माँगवादी राजनीति के आगे अग्रसर हो अपने ही अंदर मौजूद सामूहिक तत्वों के आधार पर नए समाज के प्रारूप पेश कर सकें। 

राजनीतिक अर्थशास्त्र की मार्क्सवादी आलोचना पूंजीवाद की संरचना, राजनीतिक अर्थशास्त्रीय अवधारणाओं और उपस्थित बाह्यरूपों के तह में सामाजिक संबंधों के प्रक्रियात्मक सत्य और उनके आंतरिक अंतर्विरोधों को उजागर करती है। उसके अनुसार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संकटों को वर्गीय संबंधों — पूंजी और श्रम के अंतर्द्वंद्व — द्वारा समझने की जरूरत है। ऐसा न करने से हम मेहनतकश जनता को महज आर्थिक और राजनीतिक नीतियों के भुक्तभोगी की तरह देखते रहेंगे और उनके नायकत्व के चरित्र से अनभिज्ञ हम भी उसके अलगाव के जरिया बन अधिनायकों और राजसत्ता के पूजक बने रहेंगे। यह बात सही है कि मानव-जन अपना इतिहास मनचाहे ढंग से नहीं बनाते और वे उसे अपनी मनचाही परिस्थितियों में भी नहीं बनाते, पर तब भी वे उसे स्वयं बनाते हैं।

श्रीलंका के जनता अरगलय का तात्कालिक संदर्भ एक प्रकार का आर्थिक संकट है जिसके कारण को बहुत आसानी से स्थानीय अव्यवस्थाओं पर मढ़ा जा सकता है। वैसे भी संकटों के सारे स्वरूपों को अर्थशास्त्री आमतौर पर तकनीकी चरों और अचरों के असंतुलन  के रूप में पेश करते हैं। कुछ अर्थशास्त्रियों के अनुसार चूंकि ये संतुलन पूंजीवादी प्रक्रियाओं में स्वभावतः मौजूद होता है, असंतुलन बाह्य कारकों के हस्तक्षेप का नतीजा है। इन अर्थशास्त्रियों के अनुसार राजकीय व्यवस्था का मुख्य काम अपने और अन्य “बाह्य” कारकों के हस्तक्षेप को न्यूनतम करना है। अन्य अर्थशास्त्रियों के लिए पूंजीवादी प्रक्रियाएँ अपने आप में असंतुलित हैं इसलिए राज्य व्यवस्था का हस्तक्षेप जरूरी है। मामला दोनों के लिए प्रबंधन का है। दोनों ही पूंजीवादी प्रक्रियाओं को स्वतःस्फूर्त मानते हैं — बस अंतर उनके नैसर्गिक संतुलनता के सवाल पर है। 

दोनों पक्षों के लिए सरकार और राजनीतिक शक्तियों की स्वायत्त सत्ता है जो मन चाहे ढंग से आर्थिक प्रबंधन कर सकती है। ये दृष्टिकोण पूंजी, आर्थिक प्रक्रियायों और यहाँ तक कि बाजार की भी जिंसीकृत समझ रखते हैं — इनको सामाजिक संबंधों के रूप में नहीं देखते। इसी कारण से वे समझ नहीं पाते कि किस प्रकार राजसत्ता, सरकार, राजनीति और आर्थिक-वैधानिक नीतियाँ इन संबंधों के गतिकी में जड़ित हैं — उनकी सापेक्ष स्वायत्तता की प्रतीति इस गतिकी के अन्तर्विरोधात्मक चरित्र का नतीजा है। इस अन्तर्विरोधात्मकता के जड़ में पूंजी-श्रम संबंध का द्वंद्ववाद है। यही अंतर्विरोध समयासमय संकट को जन्म देता है जो विभिन्न रूप ले सकता है, परंतु इतना तो साफ है कि पूंजी अथवा उसके तंत्र पूंजीवाद का संकट अंततः पूंजी-श्रम के संबंध का संकट है।

मार्क्सवाद ने पूंजीवादी संकट के विभिन्न अभिव्यक्तियों को पूंजीवादी संचय के गूढ़तम प्रक्रियाओं से जोड़ कर विभिन्न संकट सिद्धांतों की पेशकश की है। ज्यादातर मार्क्सवादी “अर्थशास्त्री” (पेशेवर और शौकिया दोनों) भी इन सिद्धांतों को महज पूंजी और पूँजीपतियों के विकास के सिद्धांत के रूप में देखते हैं जिसका वर्ग-संघर्ष से सीधा कोई वास्ता नहीं है। यदि उसमें प्रतिस्पर्धा की बात आती भी है तो उसे पूंजी की विभिन्न इकाइयों के बीच रिश्ते का पर्याय समझा जाता है। सामान्य तौर पर संकट को उत्पादन और संचरण की एकता में विच्छेद के रूप में देखा जाता है — बहस महज उत्पादन या संचरण के केन्द्रीयता को लेकर होती है। इस विच्छेद में निस्संदेह तथाकथित “उत्पादन शक्तियों” की निर्णायक भूमिका समझी जाती है, परंतु इन शक्तियों की गणना में जो सबसे महत्वपूर्ण तत्व है, यानी मानवीय श्रम, उसे ही निष्कासित कर इन्हें टेक्नोलॉजी का पर्याय मान लिया जाता है। इस तरह राजनीतिक अर्थशास्त्र की मार्क्सवादी आलोचना की विशिष्टता गायब हो जाती है और उसकी अवधारणाएं जड़ता का शिकार हो जाती हैं। निष्कर्षतः मार्क्सवादियों के बीच भी पूंजीवादी संकट के तमाम सिद्धांत निवेश चरित्र और यांत्रिक ब्रेकडाउन के सिद्धांत बन जाते हैं। (बेल 1977; बेल और क्लीवर 1982) इस प्रकार पूंजीवादी संकट के मार्क्सवादी सिद्धांतों के अन्तर्सम्बन्ध और अखंडता  का संप्रत्ययात्मक (conceptual) आधार ओझल हो जाता है और ये सिद्धांत अलग-अलग, यहाँ तक कि विरोधास्पद प्रतीत होते हैं। इन सब के केंद्र में श्रम और वर्ग संघर्ष के सवाल जो इन तमाम सिद्धान्तों को बांधते थे, उनके ओझल हो जाने से पूंजीवादी संकट की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ विकेन्द्रित होकर अपनी-अपनी कहानियाँ गढ़ती हैं। 

इस तरह जो कारण है वह महज कार्य में तब्दील हो जाता है, वह कुंठित प्रतिक्रियात्मकता का द्योतक हो जाता है, और कई टुकड़ों में संगठित हो राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मोहरा बन कर रह जाता है। अर्थशास्त्रीय मार्क्सवादियों से तो यही उम्मीद की जाती है परंतु राजनीतिक मार्क्सवादी भी पूंजी की जिंसीकृत ही नहीं व्यक्तिकृत समझ रखते हैं और उसे सामाजिक संबंध और निर्वैयक्तिक सत्ता के रूप में नहीं देख पाते। तथाकथित मार्क्सवादी राजनीतिज्ञों के अनुसार पूंजी कोई वस्तु है जिस पर पूँजीपतियों का आधिपत्य है और अगर मजदूर उस पर कब्जा कर लें तो सब ठीक हो जाएगा।

जबकि मार्क्स के लिए पूंजी वह सामाजिक संबंध है जिसके तहत पूंजीपति पूंजीपति होते हैं, और मजदूर मजदूर होते हैं। पूंजीवादी संकट के विभिन्न स्वरूप इस संबंध के आंतरिक संकट की अभिव्यक्तियाँ हैं। वर्ग-संघर्ष केवल फैक्ट्री या फैक्ट्रियों के अंदर अथवा मजदूरों-पूंजीपतियों के बीच के सीधे टकराव से ही नहीं शुरू होता। वह तो आदिम संचय द्वारा श्रम को दोहरी आजादी मिलने से लेकर श्रम बाजार की धक्कम-धुक्की से होता हुआ वर्कशॉपों, फैक्ट्रियों, जमीनों, या कहें उत्पादन/श्रम संबंधों के तमाम स्वरूपों को समेटता हुआ, उपभोग की सीमाओं में घुस श्रम-शक्ति और बेशी आबादी के पुनरुत्पादन के सवाल से जूझता है। या कहें आज पूरा समाज ही सामाजिक फैक्ट्री के रूप में वर्ग संघर्ष का रणक्षेत्र है। इन तमाम सामाजिक-आर्थिक क्षेत्रों में वर्ग-संघर्ष मौजूद है, पूंजी की समस्याएँ इन सारे क्षेत्रों में श्रम को नियंत्रित करने की हैं, और इसी में असफलताएँ संकट के विभिन्न स्वरूपों को पैदा करती हैं।

III

अंतर्राष्ट्रीय कर्ज के संकट को लेकर अर्थशास्त्रीय अटकलें कर्ज की तह में छुपे सामाजिक-राजनीतिक तत्वों को सामने नहीं आने देतीं। 1982 के मेक्सिको संकट से लेकर आज तक कई प्रकार के कर्ज संकट हमारे सामने आए हैं। ये कर्ज मुख्यतः सरकारी और बहुपक्षीय अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों द्वारा दिए जाते हैं, परंतु हाल के वर्षों में निजी संस्थानों का हिस्सा बढ़ता जा रहा है। ये कर्ज साधारणतः आधारिक संरचना और बाजार के विकास के नाम पर  लिया जाता है, परंतु ये मासूम लगने वाले कारक सामाजिक-भौगोलिक दिक्काल का कायापलट कर स्थानीय सामाजिकता को पूरी तरह से झकझोर देते हैं। इनका काम उन सामाजिक संबंधों और क्रियाओं को इस प्रकार पुनर्संयोजित करना है ताकि नई स्थितियों के विकास में वे बाधक न हों और उनके अधीन रह वे उत्पादक बन सकें। मार्क्सवादी भाषा में यही आदिम संचय की प्रक्रिया है जो संसाधन को आबादी के नियंत्रण से और आबादी के श्रम को पुराने सामाजिक संबंधों से आजाद करती है, ताकि वे पूंजीवादी संचय और बाजार के विकास के आधार बन सकें। 

इसके अलावे कर्ज की वे शर्तें हैं जिन्हे संरचनात्मक अनुकूलन कार्यक्रम अथवा संरचनात्मक सुधार कहते हैं और जिनके तहत स्थानीय अर्थव्यवस्था, संस्थाओं और सामाजिक संबंधों को वैश्विक पूंजी संचय की जरूरतों के अनुकूल विकसित करने की कोशिश होती है। निजीकरण, श्रम बाजार का युक्तिकरण, मौद्रिकरण का विस्तार, मितव्ययिता इत्यादि ऐसे औजार हैं जो स्थानीय श्रमिकों की आबादी को लाचार बना उन्हें इन जरूरतों के अनुसार अनुशासित करने की कोशिश करते हैं। पूंजी के स्थानीय प्रशासक उधार ली गई धनराशि का उपयोग मुख्यतः एक तरफ अगर स्थानीय औद्योगिकीकरण के साथ-साथ इसकी सभी परिचर लागतों को वित्तपोषित करने के लिए करते हैं जिसमें ठोस निवेश के लिए बुनियादी ढांचे पर खर्च शामिल है, तो दूसरी तरफ स्थानीय संघर्षों के जवाब में, विशेष रूप से, मजदूर वर्ग पर सैन्य/पुलिसिया नियंत्रण स्थापित करने के लिए करते हैं। (क्लीवर 1989; बेल और क्लीवर 1982)

यदि हम अंतर्राष्ट्रीय कर्ज के अर्थशास्त्रीय दलीलों और उसके शर्तों के औपचारिक व्याकरण को बिना इन व्यावहारिक पक्षों को ध्यान में रख पढ़ेंगे तो पूंजीवाद द्वारा फैलाए वैचारिक मायाजाल में फँस हम वर्ग-संघर्ष के बहुरूपिए पक्ष से अनभिज्ञ ही रहेंगे। सर्वहारा के खिलाफ पूंजी के विशिष्ट हमले को हम सर्वहाराकरण के खिलाफ सर्वहारा होती आबादी के संघर्ष के विभिन्न स्तरों को समझे बिना कभी नहीं ग्रहण कर सकते। कर्ज का संकट इसी वर्ग संघर्ष का नतीजा है — जिसे पूंजी के हित में जीतने के लिए सरकारों को और कर्ज लेना पड़ता है। 

यह बहुस्तरीय वर्ग संघर्ष सामाजिकता के विभिन्न दायरे की विशिष्ट भाषा को लिए होते हैं, उन्हें एक स्वरूप में बांधना नामुमकिन ही नहीं प्रतिक्रियावादी भी है, क्योंकि वह मजदूर वर्ग की अपनी अभिव्यक्तियों का दमन है जो कि अंततः पूंजी को ही सुरक्षित करता है। कहीं पर यह संघर्ष अगर औद्योगिक संघर्षो के रूप में मिलते हैं तो कहीं राष्ट्रीयताओं और अस्मिताओं की भाषा में ये मौजूद रहते हैं। मार्क्स की “क्रांतिकारी सामान्यीकरण” की अवधारणा इन संघर्षो की स्व-अभिव्यक्तियों में पूंजी विरोधी क्रांतिकारी सूत्र को पहचानना है।

IV

श्रीलंका की कर्ज की जरूरत को और आज के उसके कर्ज संकट को उसके पीछे काम कर रही सामाजिक प्रक्रियाओं और संघर्षों को पहचाने बगैर समझा नहीं जा सकता। इस पुस्तिका में हमारे साथियों ने इस संदर्भ को समझने के लिए जरूरी तथ्यों को बखूबी पेश किया है। इसलिए मैं बस दो तथ्यों को यहाँ गिनूंगा। पहला कि श्रीलंका की राजसत्ता लातिन-अमरिका में पिनोचेत की दमनकारी सरकार के बाद दूसरी थी जिसने वाशिंगटन कंसेंसस के नवोदारवादी मुहिम को जगह दी। दूसरा, आज से पहले श्रीलंका सोलह बार आईएमएफ के आर्थिक स्थायीकरण कार्यक्रमों को कार्यान्वित कर चुका है। उसके बाद भी वैश्विक और स्थानीय पूंजीवादी सत्ताएँ श्रीलंकाई जनता और संसाधनों को अपने गिरफ्त में नहीं कर पाई हैं। गृह युद्ध में जीत और सिंहली राष्ट्रवाद के  सशक्तिकरण ने श्रीलंकाई राजसत्ता को जो वैधानिकता प्रदान की थी वह पूरी तरह से श्रीलंका की जनता ने मटियामेट कर दिया। वर्ग संघर्ष की भाषा वह कुंजी है जो हमें श्रीलंका में कर्ज की राजनीति, गृह युद्ध, अस्मिताओं/राष्ट्रीयताओं के खूनी संघर्ष और आज के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संकट को एक दूसरे से बांध के समझने में मदद करती है।

अंत में कुछ घरेलू बातें।

कुछेक संगठनों को छोड़कर हिंदुस्तानी वामपंथियों में श्रीलंका की घटनाओं को लेकर आम अलगाव बहुत ही निराशाजनक है, जबकि हिंदुस्तानी राजसत्ता और शासक वर्ग ने लगातार अपने हित को साधने में और विश्व-पूंजीवाद के क्षेत्रीय नायकत्व के नाते हस्तक्षेप करने में कोई कसर नही छोड़ा। हालांकि दक्षिण एशिया में नेपाल के लोकतंत्र आंदोलन के बाद श्रींलंका का जनता अरगलय पहला ऐसा जन उभार है  जिसने शासन-व्यवस्था और क्षेत्रीय संतुलन को संकट में डाल दिया, मगर दोनों आंदोलनों में अंतर काफी साफ है। जहां एक तरफ नेपाली आंदोलन का लक्ष्य, उसका राजनीतिक स्वरूप और नेतृत्व साफ दिखता था, तो दूसरी तरफ श्रीलंका के जनता अरगलय में न कोई निश्चित लक्ष्य है, न कोई निश्चित राजनीतिक स्वरूप है और ना ही कोई निश्चित नेतृत्व है।  निश्चित्तता प्रतिक्रियाओं के दायरे को भी निश्चित करती है — आंदोलन के विरोधियों और समर्थकों दोनों की प्रतिक्रियाओं को व्याकृत करती है। इसी कारण से भारत की विभिन्न राजनीतिक शक्तियाँ अपनी-अपनी राजनीति के अनुसार नेपाल की राजनीति के साथ जुड़ती रहीं है, उस पर टिप्पणी देती रहीं और असर भी डालती रही हैं। परंतु इस निश्चितता का आडम्बर उसके पीछे की अनिश्चित संभावनाओं की अपारता को नापने नहीं देता जबकि इसी अनिश्चितता में क्रांतिकारी परिवर्तन की गुंजाइश होती है। निश्चितता के दायरे में  राजनीति केवल निश्चित संभावनाओं का इंतज़ार है, उसमें आशा की कोई गुंजाइश नहीं होती — जो होना है उसकी आशा नहीं की जाती, उसका इंतजार होता है।

श्रीलंका को लेकर हिंदुस्तानी वामपंथ की उदासीनता और निष्क्रियता के पीछे एक कारण तो अवश्य ही प्रत्यक्ष रूप से श्रीलंका के आंदोलन में  “राजनीति की कमी” और अनिश्चितता थी। परंतु यह पर्याप्त या मुख्य कारण नहीं है। इसका सबसे प्रमुख कारण भारतीय वामपंथ का निम्न-पूंजीवादी राष्ट्रवादी विचलन है जो उसे भारतीय राजसत्ता और क्षेत्रीय पूंजीवादी प्रक्रियाओं में भारत की वर्चस्वकारी भूमिका की सटीक अंतर्राष्ट्रीयवादी आलोचना करने से रोकता है। जो धाराएँ आज भी भारत में “पूंजीवादी-जनवादी” कर्तव्यों को क्रांति द्वारा पूरा करने की बात करती हैं उनके लिए भारतीय पूंजीवाद और उसकी राजसत्ता का विश्व साम्राज्यवादी नेटवर्क के अंतर्गत एक वर्चस्वकारी शक्ति होने की बात कैसे स्वीकार होगी? वे छुटपुट धाराएँ भी जो भारत में समाजवादी क्रांति का सपना देखती हैं, वे भी पेड़ गिनने में लगी रहती हैं, जंगल की संश्लिष्ट समझ विकसित नहीं कर पातीं। (वे बहुत मायने में भारतीय राजनीतिक अर्थतंत्र की विश्लेषणात्मक स्तर पर सटीक और विस्तृत आलोचना पेश करती हैं, परंतु पूंजीवादी संरचना की संश्लिष्टता अथवा समग्रता को ग्रहण करने में चूक जाती हैं)। इसीलिए, भारतीय पूंजीवाद और राजसत्ता की (उप)साम्राज्यवादी रणनीतियाँ, पड़ोसी और अन्य देशों में भारत के दाँव-पेंच, जिनका निश्चित आर्थिक चरित्र है — ये सब इनके कूपमंडूक चिंतन प्रक्रिया से बाहर हो जाते हैं। और यही कूपमंडूकता हमें हमारे घर के दरवाजे पर हो रहे संघर्षो से सीख और प्रेरणा लेने से रोकती है।

पता नहीं लेनिन (1920) की निम्नलिखित बात का इस भूमिका में कही बातों से पाठकों को कोई सीधा रिश्ता दिखता है या नहीं, परंतु मेरी समझ में वामपंथी रूपवाद जिसको तोड़ने में हिन्दुस्तानी वामपंथियों को बहुत समय लग रहा है, और जो उन्हें नए संघर्षों को उन संघर्षों के अपने रूप में अपनाने से रोकता है, उसको यह उद्धरण चुनौती देता है:       

“सबसे अधिक प्रगतिशील वर्ग की अच्छी से अच्छी पार्टियाँ और अधिक से अधिक वर्ग -सजग हिरावल जिस बात की कल्पना कर सकते हैं, इतिहास आम तौर पर, और क्रांतियों का इतिहास खास तौर पर, उससे कहीं अधिक सामग्री-समृद्ध,अधिक विविध, अधिक अनेकरूपीय, अधिक सजीव और प्रतिभा-सम्पन्न होता है। यह बात समझ में आनी चाहिए, क्योंकि अच्छे से अच्छे हिरावल भी केवल हजारों आदमियों की वर्ग-चेतना, निश्चय, उत्साह और कल्पना को ही व्यक्त कर सकते है, जब कि क्रांतियाँ वर्गों के तीव्रतम संघर्ष से प्रेरित करोड़ों आदमियों की वर्ग-चेतना, निश्चय, उत्साह और कल्पना से ओतप्रोत सभी मानव क्षमताओं के विशेष उभार और उठान की घड़ी में होती हैं। इससे दो महत्वपूर्ण अमली नतीजे निकलते हैं: पहला, यह कि क्रांतिकारी वर्ग को अपना काम पूरा करने के लिए, बिना किसी अपवाद के सामाजिक गतिविधि के सभी रूपों में, सभी पहलुओं में पारंगत होना चाहिए (इस विषय में जो कुछ वह राजसत्ता पर अधिकार करने के पहले पूरा नहीं कर पाता, उसे सत्ता पर अधिकार करने के बाद — कभी-कभी बड़े जोखिम उठाते हुए और बड़े खतरों के साथ — पूरा करना पड़ता है); दूसरा, यह कि क्रांतिकारी वर्ग को बहुत ही जल्दी के साथ और बड़े अप्रत्याशित ढंग से एक रूप को छोड़कर दूसरा रूप अपनाने के लिए सदा तैयार रहना चाहिए।”

और वैसे भी, बाबा वाक्यं प्रमाणम्!!!

संदर्भ सूची:

हैरी क्लीवर (1989), “Close the IMF, Abolish Debt and End Development: a Class Analysis of the International Debt Crisis,” Capital & Class (39), Winter 1989

पीटर बेल (1977), “Marxist Theory, Class Struggle and the Crisis of Capitalism” in Jesse Schwartz (ed.), The Subtle Anatomy of Capitalism. Santa Monica: Goodyear

पीटर बेल और हैरी क्लीवर (1982),” Marx’s Theory of Crisis as a Theory of Class Struggle,” Research in Political Economy (Vol. 5) 

व्लादिमीर लेनिन (1920),  वामपंथी कम्युनिज्म – एक बचकाना मर्ज

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