Capitalism, law and surplus population – in the context of the Mundka incident


Industrial accidents are a necessary condition of the capitalist economy, that is, their possibility is an integral part of capitalist life. Their occurrence can be avoided to some extent by legal-administrative reforms and vigilance. There are limits to these reforms, however. The Mundka incident, on the one hand, exemplifies corruption and non-compliance of the law (which attracts the most attention of the well-wishers), and on the other, it is primarily a manifestation of the organic brutality of capitalist industrial life. This brutality reflects the dispensability of individuated workers in an environment of continuous surplusing.

राजनीति में “व्यावहारिक-आलोचनात्मक” दृष्टिकोण की जरूरत


IMHO नागपुर के साथियों की इजाजत से पोस्ट कर रहे हैं उनके द्वारा IMHO शिकागो कंवेंशन 2022 के लिए तैयार की गई प्रस्तुति

 १. “दार्शनिकों ने विभिन्न तरीकों से दुनिया की केवल व्याख्या ही की है, लेकिन सवाल दुनिया को बदलने का है।“

तथाकथित वामपंथियों के बीच फायरबाख पर मार्क्स के ग्यारहवें थीसिस का खूब प्रचलन रहा है। परंतु इस गूढ़ सैद्धांतिक थीसिस को उन्होंने पूर्णतः सिद्धांत-विरोधी मतलब देकर अपनी व्यावहारिक अवसरवादिता के समर्थन में कुतर्क करने का साधन बना दिया है, जबकि यह थीसिस मूलतः व्यावहारिक-आलोचनात्मक अथवा क्रांतिकारी क्रियाशीलता को सूत्र-बद्ध करता है। यह थीसिस सिद्धांत और व्यवहार, समझ और गतिविधि के द्वन्द्वात्मक सामंजस्य की ओर इंगित करता है जिसके बगैर पूंजीवाद-विरोधी क्रांतिकारी गतिविधियों की कल्पना असंभव है। इस सामंजस्यता की कमी आज के वामपंथी आंदोलन की सबसे बड़ी कमजोरी है जिसकी वजह से हम पूंजीवादी रिश्तों के नए नए स्वरूपों में पैदा होने के महज साधन हो गए हैं। पूंजी को लेकर व्यावहारिक-आलोचनात्मक दृष्टिकोण न होने के कारण वामपंथी गतिविधियां महज पूंजीवादी विकल्पों के बाजार के ग्राहक हो गई हैं।

२. पूंजी की सत्ता ने आज बहुत ही विकराल रूप ले लिया है और परिस्थितियाँ भयानक हो गई हैं। वर्चस्वकारी शक्तियां वैश्विक और राष्ट्रीय स्तरों दोनों पर प्रतिस्पर्धा करती हुईं पूरी दुनिया को आज बारूद और विनाश की बलिवेदी तक पहुंचाने में लगी हुई हैं। व्यक्तिकरण, प्रतिस्पर्धा और अलगाव आज सामाजिकता के मौलिक मानवतावादी तत्वों को ही नष्ट करने पर उतारू हैं। यही कारण है कि मार्क्स के मौलिक व्यावहारिक-आलोचनात्मक नजरिए को एक बार फिर स्थापित कर हमारे दैनिक संघर्षों में अंतर्निहित पूंजी-विरोधी तत्वों को बारम्बार उभारते हुए साम्यवादी सामाजिकता की ओर अग्रसर होना हमारी तात्कालिक आवश्यकता हो गई है।

३. रूस-यूक्रेन युद्ध पूंजीवाद के इसी घिनौने स्वरूप का ही निष्कर्ष है। अधिवेशन के मसौदे में वाजिब ही इस युद्ध पर व्यापक और अच्छी चर्चा की गई है। हमारी समझ में इस युद्ध का उद्देश्य मूलतः सैन्य-औद्योगिक परिसर को वैश्विक आर्थिक पुनः प्रवर्तन के रणनीति के केंद्र में लाने की कोशिश है। इसमें अमरीका और रूस प्रतिद्वंद्वी के साथ-साथ सहयोगी भी है। इसके लिए विश्व पूंजीवाद के दो प्रमुख आर्थिक पावर-हाउस – चीन और जर्मनी, जो इस रणनीति के प्रति हमेशा ही उदासीन थे, की सम्मति की आवश्यकता है। रूस-यूक्रेन युद्ध बहुत हद तक ऐसा करने में कामयाब हो गया है। इसी प्रकार अमरीका अपनी वैश्विक नेतृत्व को सुरक्षित भी रख सकता है। भारत में भी इस युद्ध ने सैन्यवादी सर्वसम्मति को विकसित करने में मदद किया है। इस सिलसिले में रोजा लक्ज़ेम्बर्ग का एक कथन उद्धरणीय है — 

“जो चीज सेना की आपूर्ति को, उदाहरण के लिए, सांस्कृतिक उद्देश्यों (स्कूलों, सड़कों, आदि) पर राज्य के व्यय की तुलना में, अधिक लाभदायक बनाती है, वह है सेना का निरंतर तकनीकी नवाचार और इसके खर्चों में लगातार वृद्धि।”

हम आशा करते हैं कि युद्ध के मामले पर सम्मेलन में और व्यापक चर्चा होगी।       

४. दक्षिण एशियाई देशों में आज पूंजीवादी व्यवस्था और राजसत्ता ने मानव-विरोधी, विनाशक और तानाशाह स्वरूप अख्तियार कर लिया है। अगर एक तरफ अफगानिस्तान में अमरीका-संरक्षित भ्रष्ट जनतंत्र को हटाकर तालिबान का शासन फिर से बहाल हुआ है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान में इमरान खान सरकार को हटाकर पारंपरिक दलों का गठजोड़ लौटा है जिसके पीछे अवश्यंभावी अंतर्राष्ट्रीय गठजोड़ों की राजनीति है। भारत में अति-राष्ट्रवादी सर्वसम्मति (जिसमे वामपंथ भी शामिल है) भारतीय राजसत्ता पर काबिज धुरदक्षिणपंथ नेतृत्व को वैश्विक साम्राज्यवाद के गठजोड़ में खुल के जगह बनाने में मदद कर रहा है, जो कि भारतीय उपमहाद्वीप में अपने उप-साम्राज्यवाद को पक्का करने के हिसाब से चीन के खिलाफ लगातार छोटे-मोटे दुस्साहसी कारनामों को अंजाम दे रहा है। वह अपने आप को दक्षिण एशिया में इसराएली शासन का प्रतिरूप बनाने की कोशिश कर रहा है। इस प्रक्रिया में भारतीय समाज में इस्लाम-विरोधी साम्प्रदायिकरण एक अहम हथियार है। हाँ, श्रीलंका के हाल के घटनाक्रम इस परिस्थिति में भय और उम्मीद दोनों जगा रहे हैं। भय क्योंकि वहाँ पूंजीवादी संकट ने लोगों के जीवन को पूर्णरूपेण अस्त-व्यस्त कर दिया है, मगर लोगों का संप्रदायों और राष्ट्रीयताओं के आपसी प्रतिस्पर्धाओं से आगे निकल कर व्यापक उभार उम्मीद जगाता है।         

५. यह बात सही है कि दक्षिण एशिया में अधिकांश देशों में जनतान्त्रिक राजनीतिक व्यवस्था कायम है। परंतु इनका अनुभव पूंजीवादी जनतंत्र के जड़-स्वरूप को उद्घाटित करता है। एक तरफ वह जनतंत्र को महज कर्मकांड और अनुष्ठान में बदल देता है, तो दूसरी तरफ विकल्पों की आलोचनात्मक क्षमता को कुंद कर उन्हें व्यवस्थापरक और महज रूपात्मक बना देता है। तानाशाही और बहुसंख्यकवाद इस जनतंत्र के अंतर्गत बिना परेशानी के पनप पाते हैं। यही दक्षिण एशिया में तमाम जनतान्त्रिक राजसत्ताओं का अनुभव बताता है। पूंजीवाद के अंतर्गत जनतंत्र राजसत्ता को वैधानिकता प्रदान करने का जरिया है, उसकी अपनी कोई स्वायत्त दैनिकता नहीं होती। 

६. यह अधिवेशन एक महत्वपूर्ण दौर में हो रहा है, जब पूंजी का संकट गहरा रहा है मगर पूंजीवाद विरोधी शक्तियों की शिथिलता इस संकट को अवसर बनाने में असफल साबित हो रही है। शायद इसी प्रकार के दौर को महान इतालवी मार्क्सवादी क्रांतिकारी अंतोनियो ग्राम्शी ने इस प्रकार सूत्रबद्ध किया था –- “संकट ठीक इस तथ्य में निहित है कि पुराना मर रहा है और नया पैदा नहीं हो सकता; इस अंतराल में कई प्रकार के रुग्ण लक्षण प्रकट होते हैं।“ रुग्ण लक्षण हर जगह विदित हैं। दक्षिण एशिया में खास तौर पर मोदी शासन और फैलती फासीकरण की प्रक्रियाएँ इसी रुग्णता की ओर इंगित कर रही हैं। मगर रुग्णता का असर आंदोलन पर भी पड़ा है –- व्यवस्था हमें हमेशा कगार पर रख अपने आंतरिक और अवसरीय विकल्पों के कोलाहल में डुबो रही है। 

७. भारत में वामपंथी आंदोलन की अक्षमता की वजह उसकी प्रतिक्रियात्मक राजनीति रही है, जिसने उसके घटकों को तात्कालिकता के दायरे में बांध दिया है। वे अस्तित्व बचाने अथवा रक्षात्मक रणनीतियों से आगे नहीं निकल पा रहे हैं, और मुख्यधारा के बुर्जुआ पार्टियों के पिछलग्गू बनते जा रहे हैं। उनके तमाम जनसंगठन आज इसी तात्कालिकवाद के शिकार हैं। इस सिलसिले में, अधिवेशन के मसौदे में भारत में 28-29 मार्च को हुई दो दिवसीय ट्रेड यूनियन हड़ताल को सफल बताना हमारी समझ में अतिशयोक्ति ही नहीं, वह साथी-लेखकों की भारत की परिस्थितियों के बारे में अनभिज्ञता को दर्शाता है। ये हड़तालें आज महज अनुष्ठान बन गई हैं, जिनका मुख्य मकसद सरकारी क्षेत्र के संस्थाओं के स्थायी कर्मचारियों (जिनकी तादाद घटती जा रही है) के अधिकारों को निजीकरण और निगमीकरण की प्रक्रिया के दौरान संरक्षित रखना। वैसे भी इन संगठनों का सरोकार भारत के श्रमिक वर्ग के 5 प्रतिशत हिस्से से अधिक नहीं है। और इस संगठित हिस्से का सबसे बड़ा अंश आज दक्षिणपंथ के ट्रेडयूनियन, भारतीय मजदूर संघ के साथ है। एक और बड़ा राष्ट्रीय यूनियन है जो कांग्रेस पार्टी से सम्बद्ध है। इससे भी महत्वपूर्ण है कि भारत में ट्रेड यूनियन का फॉर्मैट कानून द्वारा तय होता है और नव-उदारवादी दौर में वे पूरी तरह मैनिज्मन्ट और मजदूरों के बीच बिचौलिए की तरह काम करते हैं। मजदूरों के दैनिक संघर्षों के तेवर से इन यूनियनों का कोई लेना देना नहीं है। इसीलिए हमारा मानना है कि भारत में मजदूर आंदोलन और मजदूर वर्ग के वेग और तेवर को समझने के लिए हम अपने आप को ट्रेड-यूनियनों की औपचारिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रख सकते। दक्षिण एशिया में हाल के दिनों में जितने भी लड़ाकू और श्रमिक विभाजनों को तोड़ने वाले संघर्ष रहे हैं –- चाहे बांग्लादेश में गार्मन्ट उद्योगों में “वाइल्ड कैट” हड़तालें हों, भारत में मारुति-सुजुकी मजदूरों का संघर्ष अथवा अप्रैल 2016 में बैंगलोर में महिला श्रमिकों का विद्रोह हों, या हाल में गिग-वर्कस के बीच हलचल, ये सभी इन औपचारिक यूनियनों के परिधि से बाहर रही हैं। ऐसा नहीं है कि इन संघर्षों का कोई सांगठनिक स्वरूप नहीं है, मगर वे श्रमिकों के दैनिक सरोकार में पनपती सामूहिकता का गतिमान स्वरूप हैं, उन्हे कानून द्वारा नियोजित अथवा पूर्व-गठित संगठानिक फार्मूलों में नहीं फिट किया जा सकता। जब तक भारत के वामपंथी अपने अनुभवों और बदलते औद्योगिक संबंधों के प्रति “व्यावहारिक-आलोचनात्मक” दृष्टिकोण नहीं अपनाएंगे वे मजदूर-वर्ग के नए संगठानिक स्वरूपों और स्व-गतिविधियों को नहीं पहचान पाएंगे, और मजदूर-वर्ग का हर जन उभार उन्हें आकस्मिक और स्वतःस्फूर्त प्रतीत होगा।   

८. अंत में, कुछ बातें “दुनिया बदलने” के सवाल पर। बहुत दिनों से विकल्पों की बातचीत राजनीतिक सत्ता में परिवर्तन तक सिमट कर रह गई है। फलां पार्टी और फलां नेतृत्व के सत्ता से हटने अथवा उसमें  जमने को ही विकल्प मान लिया गया है। सामाजिक व्यवस्था —  सामाजिक प्रणाली और संबंध —  के सवाल के जगह पर राजकीय नीतियों की ही बात होती है। 90 के दशक में नव-उदारवाद के खिलाफ जो “एक और दुनिया संभव है” का नारा बुलंद हुआ था वह अंततः विकास के प्रतिस्पर्धात्मक मॉडेलों की बातचीत तक सीमित रह गया। पूंजीवादी समाज और राजसत्ता के आंतरिक लक्षणों की आलोचना के बगैर कोई नीति आधारित राजनीति पूंजी की सत्ता को चुनौती देने के जगह पर महज उसके संकट के निवारण का साधन ही हो सकती है। मार्क्स ने जब साम्यवाद को “वास्तविक आंदोलन” कहा था तो उनका तात्पर्य “व्यावहारिक-आलोचनात्मक कार्यशीलता” से था जिसके तहत पूंजीवादी यथास्थिति का निषेध होता है। इसी निषेध में समस्तरीय सामूहिक सामाजिकता के प्रारूप का जन्म और विकास होता है और वही नए सामाजिक संबंध और प्रणाली की नींव है। बीसवीं सदी में क्रांतियों की जीत और हार का चक्र साम्यवाद के “वास्तविक” आंदोलनकारी चरित्र के पुनर्स्थापन की आवश्यकता पर बल दे रहा है। ये क्रांतियाँ श्रमिक-सत्ता की सामूहिक क्रियात्मकता की ओर इंगित जरूर करती हैं, परंतु शीघ्र ही श्रम की क्रिया से सत्ता का अलगाव होता है और सोवियत राजसत्ता का जन्म होता है, जहां सोवियत — क्रांतिकारी क्रियाओं का संगठन — महज विशेषण बन कर रह जाता है। अपनी बात को हम मार्क्स के इस उद्धरण से खत्म करते हैं:

“साम्यवाद हमारे लिए कोई अवस्था नहीं है जिसे स्थापित किया जाना है, न वह हमारे लिए आदर्श है जिसके अनुसार यथार्थ को अपने को ढालना होगा। हम वास्तविक आंदोलन को साम्यवाद का नाम देते हैं जो मौजूद अवस्था को मिटाता है।”          

क्यूबा: खाई में या खटाई में?


मोर्चा, अक्टूबर 2021

1. क्यूबा के कवि सिन्तियो वितियेर ने दशकों पहले क्यूबा क्रांति के लक्ष्य को चिह्नित किया था — “nuestro desafío es construir un parlamento en una trinchera” (खाई में संसद बनाना हमारी चुनौती है)। खाई में संसद – इसके दो अर्थ होते हैं।  एक है कि संसद खाई में फंस गई, और दूसरा है कि खाई में धँसे लोगों ने अपनी संसद बनाई। क्यूबा में जब भी कुछ ऐसा होता है जो क्यूबा की राजसत्ता को चुनौती देता नजर आता है, तो क्यूबा के बाहर दो तरह की प्रतिक्रिया जन्म लेती है। क्यूबाई शासन के हितैषी इसमें बाहरी शक्तियों के षड्यन्त्र को देखते हैं और दूसरी ओर क्यूबाई  क्रांति के विरोधी इसमें अवसर देखते हैं।  दोनों ही खाई को खटाई ही समझते हैं, और मानते हैं कि क्यूबा को बाहरी साम्राज्यवादी शक्तियां खाई में ढकेल रही हैं । बस इतना ही अंतर है कि एक दुखी होता है तो दूसरा खुश होता है। यही माहौल जुलाई के महीने में देखने को मिला, जब महामारी के दौर में आज क्यूबा क्या विश्व के हर कोने मे जनता सामाजिक और आर्थिक दोनों ही दिक्कतों को झेल रही है। 

2. पिछले डेढ़ साल से कोरोना महामारी ने विश्व के सभी देशों में सामान्य जीवन अस्तव्यस्त कर रखा है। तमाम देशों की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं तो इस महामारी के समक्ष विफल हुई ही हैं, परंतु उससे भी अधिक सामान्य आर्थिक गतिविधियों और संबंधों पर इस महामारी का दूरगामी, गहरा और घातक असर पड़ा है। मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति और सेवाओं का  क्रियान्वयन व्यापक स्तर पर अवरुद्ध हुआ है। जिन देशों में कल्याणकारी जनस्वास्थ्य व्यवस्थाएं मौजूद थीं वे अपने आप को जल्दी संभाल पाईं, जैसे कि चीन जहां से इस बीमारी की शुरुआत हुई, और यूरोप के कुछ देश जहां स्वास्थ्य के क्षेत्र में बाजार की घुसपैठ अपेक्षाकृत कम  है। परंतु जिन देशों में स्वास्थ्य सेवाएं मूलतः बाजार आधारित रही हैं, वहाँ महामारी की विकटता अत्यंत आक्रामक दिखी — उदाहरणार्थ, संयुक्त राज्य अमरीका (सं.रा.अ.), भारत इत्यादि। तब भी जहां तक सामान्य जीवन पर दबाव बढ़ने की बात है, कमोबेश सारे देशों में इसके नतीजतन अलग-अलग स्तर के असंतोष का जन्म हुआ है। संयुक्त राज्य अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प की हार और बाइडन की जीत में महामारी का कुप्रबंधन भी एक प्रमुख कारण था। 

3. पिछले साल जब सं.रा.अ. में ट्रम्प प्रशासन कोरोना के संकट से आंख मिचौनी खेल रहा था, और यूरोप और बाकी दुनिया में भी तबाही मची हुई थी, उसी दौरान बगल में  छोटा सा पड़ोसी देश क्यूबा अपनी प्रभावशाली और व्यवस्थित जनस्वास्थ्य सेवाओं के जरिए महामारी के फैलाव को तकरीबन पूरी तरह से काबू मे रखे हुए था। यह हमें याद रखना चाहिए कि मेडिकल अन्तर्राष्ट्रीयवाद की बात क्यूबा के संदर्भ में ही ज्यादातर की जाती है, और स्वास्थ्य सेवाओं का निर्यात क्यूबा के अर्थतन्त्र का एक अहम हिस्सा है। अपनी स्वास्थ्य सेवाओं के  जनोन्मुख चरित्र और उनकी मजबूती के कारण 2020 में, जब बाकी विश्व महामारी के प्रकोप से त्रस्त था, क्यूबा में कोरोना से संक्रमितों की और मृतकों की संख्याएँ अल्पतम थीं।  परंतु 2021 आते ही क्यूबा में महामारी का असर दिखने लगता है। इस साल जून से संक्रमितों की संख्या में घातीय वृद्धि हुई है। ऐसी स्थिति में प्रशासकीय व्यवस्था से अलगाव और असंतोष स्वाभाविक है। यही तथ्य  जुलाई महीने में क्यूबा में हुए विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख तात्कालिक संदर्भ था। 

4. क्यूबा के हरेक संकट में अमरीका और उसके द्वारा संरक्षित पूंजीवादी आर्थिक और राजनीतिक हित अपने लिए अवसर देखते हैं। यही कारण है कि विश्व की  बड़ी तमाम मीडिया संस्थाएं और उनके दलाल जुलाई की घटनाओं को बढ़ाचढ़ा कर पेश कर रहे थे। उनका आकलन था कि क्यूबा की  राजनीति से फिदेल कास्त्रो और अन्य प्रारंभिक क्रांतिकारियों के हट जाने के बाद वहाँ के नेतृत्व के लिए इस तरह के संकट से निकलना मुश्किल होगा। अमरीकी तंत्र खुले तौर पर क्यूबा में सत्ता परिवर्तन के लिए लगातार माहौल गरम रखने की कोशिश करता रहा है। जब भाड़े वाले आतंकवादियों को शस्त्रों के साथ उतारने में कामयाब न रहा तो  कई सालों से वह आर्थिक बंदिशों द्वारा असंतोष और बगावत पैदा करने की कोशिश में लगा रहा है। इन प्रतिबंधों का असर संकट के दौर में और भी साफ दिखता है। आज जब क्यूबा ने अपने वैज्ञानिकों के मेहनत के बलबूते पर कोरोनावाइरस के खिलाफ कई बेहतरीन वैक्सीन तैयार कर लिए हैं, जो बच्चों के लिए भी कारगर हैं, तब अचानक वैक्सीन देने के लिए आवश्यक सिरिंज की कमी हो गई है। जुलाई के प्रदर्शनों में निहित असंतोष को प्रतिबंधों के तथ्य और उनके तात्कालिक असर से काट कर नहीं देखा जा सकता। 

5. ओबामा प्रशासन के वक्त इन बंदिशों में ढील दी गई थी क्योंकि यह माना जा रहा था कि इनसे बाजार का विकास होगा और नतीजे के तौर पर पूंजी-पक्षीय सामाजिक और राजनीतिक बदलाव की संभावना बढ़ेगी। उदारवादी पूंजीवादी तबके में 2000 के दशक से ही यह समझ बनती दिखाई देती है कि लातिन-अमरीका पर आर्थिक बंदिशों और राजनीतिक हस्तक्षेपों का उल्टा असर हो रहा है और क्षेत्रीय वामपंथ मजबूत होता जा रहा है। उनका मानना है कि वांछित बदलाव के लिए मिलिट्री व खुलमखुला राजनीतिक दखलंदाजी के बजाए बाजार ज्यादा कारगर साबित हो सकता है। 

6. पिछले तीन दशकों का अनुभव ऐसा ही बताता है। इस दौरान में विश्व ने कई रंगीन (प्रति)क्रांतियों को देखा है, जिसने पुराने समाजवादी और राजकीयवादी शासनों को ढहा दिया — वे वित्त-पूंजी संचालित पूंजीवादी भूमंडलीकरण के सामने नहीं टिक पाए। उन शासनों ने एक समय राष्ट्रीय आर्थिक विकास के वैकल्पिक मॉडल के रूप में अपनी पहचान बनाई थी। परंतु 1960 के दशक से कल्याणकारी पूंजीवाद के बढ़ते संकट के परिपेक्ष्य में वित्तीय पूंजी के मौन अंतःसरण ने उनके औचित्य को ही नकार दिया। अपने आप को बचाने की  होड़ में अपने अंतिम दिनों में महज सत्ताई आतंक पर वे निर्भर होते चले गए — और गठित सत्ता (constituted power) से घटक सत्ता (constituent power) अलग होती चली गई। यही 1989 से 1992 के बीच मे तथाकथित समाजवादी देशों के अन्तःस्फोटन का चरित्र था। आगे चल कर अन्य राजकीयवादी शासनों का भी यही हश्र हुआ। 

7. इन व्यवस्थाओं में जिन्होंने समय के अनुसार वित्तीय नेटवर्क में अपनी जगह बना ली, वे विश्व पूंजीवाद के लिए बाजार बनने के अलावे सस्ता अनुशासित श्रम और अन्य संसाधन मुहैया करने के साधन हो गए। उन्होंने अपने अस्तित्व को बचाने हेतु पूंजीवादी व्यवस्थाओं के साथ विकासवादी प्रतिस्पर्धा में घोर उत्पादनवाद को अपना लिया (“संचय की खातिर संचय”, “उत्पादन की खातिर उत्पादन” — मार्क्स) और अंत मे पूंजी के अंदरूनी तर्क के अंश बन गए। निष्कर्षतः, शीत युद्ध और हथियारों की प्रतिस्पर्धाई होड़ ने अपना काम कर दिखाया। ये व्यवस्थाएं कई मायने में अन्तःस्फोट के शिकार हो गए, साम्राज्यवादी शक्तियों को इन्हें आक्रमण द्वारा हटाने की जरूरत नहीं पड़ी। चीन तो पहले ही विश्व पूंजीवाद के विकास का सबसे महत्वपूर्ण इंजन बन चुका था। वियतनाम औऱ उत्तरी कोरिया में अमरीका की हार को हम सब याद करते हैं, परंतु उन जीतों के बावजूद आज वित्त-पूंजी ने वियतनाम के अर्थतन्त्र को पूर्णतः अपने शिकंजे में ले लिया है, और प्योंगयांग अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम के कारण और नव-ध्रुवीकरण की संभावनाओं के कारण जिंदा है। 

8. इस सहस्राब्दी के आते ही नए तरह का जन-प्रतिरोध पैदा होता दिखता है, और विशेषकर लातिन अमरीका में नव जनतान्त्रिक और समाजवादी लक्ष्यों को राजकीय स्वरूप देने की प्रक्रिया शुरू होती है। प्रथम दशक में वेनेजुएला, बोलीविया, अर्जेन्टीना और अन्य देशों में राजनीतिक बदलाव डॉलर के एकाधिकार को सीधी चुनौती देते हैं। उसके खिलाफ अमरीकी बंदिशें विफल होती नजर आती हैं। उलटे लातिन-अमरीका में पहली बार एक मजबूत साम्राज्यवाद-विरोधी अंतर्राष्ट्रीय तालमेल पैदा होता दिखाई देता है, जिसमें क्यूबा की राजनीतिक-वैचारिक साख साफ तौर पर बढ़ती दिखती है, और अमरीकी बंदिशों के बावजूद, उसके अर्थतन्त्र को व्यापक सहारा मिलता है। यही वजह है कि ओबामा प्रशासन को अमरीकी राजनीतिक आर्थिक डिप्लोमेसी में बदलाव लाना पड़ा, जिसके तहत वह लातिन अमरीका में फूट डालो और राज करो को ही बढ़ाते हुए दोहरी नीति अपनाता है। एक तरफ दक्षिणी अमरीकी देशों में वामपंथी शासनों के खिलाफ स्थानीय विपक्षों को खुले तौर पर वित्तीय और राजनीतिक संरक्षण देता है और दूसरी तरफ क्यूबा के साथ दोस्ताना हाथ बढ़ाते हुए आर्थिक बंदिशों में कई स्तरों पर ढील देता  है। आशा वही रही है कि क्यूबा में भी बाजार का तर्क सामाजिक और संपत्ति रिश्तों को बदलने में मदद करेगा, और अंततः राजनीतिक परिवर्तन को अंजाम देगा। 

9. 2010 के दशक में एक बार फिर लातिन अमरीका में दक्षिणपंथी और वैश्विक वित्तीय नेटवर्क के सहयोगी पार्टियों का वर्चस्व कायम होता दिखता है। इस अचानक परिवर्तन का मुख्य कारण भी यही नेटवर्क है जिसने विश्व के तमाम राज्यों को जकड़ रखा है, और राजकीयवाद के दायरे में इसके चंगुल से बचना मुश्किल है। इस बदलाव ने एक बार फिर क्यूबा की क्रांति को आत्म-रक्षात्मक रुख दे दिया था। ओबामा प्रशासन ने इस मौके का इस्तेमाल करते हुए पूंजीवादी बाजार के अंतर्गत आने को प्रेरित करता रहा। आर्थिक बंदिशों में ढील ने अवश्य ही कुछ हद तक ऐसा ही किया, और कई स्तरों पर बाजार का विस्तार हुआ है।  क्यूबा को इसी के द्वारा सांस लेने के लिए राहत भी मिली। दशकों से आवश्यक वस्तुओं के आयात-निर्यात पर सं.रा.अ. के बंदिशों का असर क्यूबा के उत्पादन और उपभोग के क्षेत्रों को प्रभावित करता रहा है। अवश्य ही इन बंदिशों का क्यूबा की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव भी पड़ा है, आर्थिक और राजनीतिक स्वावलंबन अत्यंत मजबूत हुआ है। तब भी ये प्रतिबंध आर्थिक विस्तार को संकुचित और उसकी गति को मद्धम करते रहे हैं, क्योंकि उस विस्तार और उसके सुदृढीकरण के लिए आवश्यक सामग्रियों की कमी को निरंतर झेलना पड़ता है। ओबामा प्रशासन द्वारा बंदिशों में ढील बड़ी राहत थी, परंतु उस राहत का पर्याप्त फायदा उठाने के लिए पूंजीवादी बाजार और वित्तीय पूंजी के संरचनात्मक दबाव से समझौता करना पड़ता है, और जिसके नतीजे हैं —  क्यूबा के राजनीतिक अर्थशास्त्र में पूंजीवादी संपत्ति और उत्पादन संबंधों को अहम जगह मिलती जा रही है, समन्वय और सहयोग पर आधारित सामाजिक संबंधों के खिलाफ मुनाफाखोरी और प्रतिस्पर्धात्मक मूल्यों का विकास हो रहा है, और प्रतिक्रांतिकारी हितों की राजनीतिक एकजुटता कायम होने की संभावना पैदा होती दिखाई दे रही है। इन्हीं नतीजों का संकेत जुलाई के प्रदर्शनों में दिखता है।

10. 2016 के बाद से ट्रम्प और अब बाइडेन प्रशासनों ने ओबामा की उदारवादी क्यूबा नीति को छोड़ पुरानी आक्रामक नीति को फिर से बहाल किया है। इस नीति में बदलाव एक बार फिर से बंदिशों में जकड़ कर क्यूबा के अंदर प्रतिक्रियावादी विपक्ष को सशक्त करने की कोशिश को दिखाता है — क्योंकि सं.रा.आ. के सत्ताधारी वर्ग को क्यूबा शासन की लोकप्रियता में कहीं कमी आती नहीं दिखती है। जुलाई के प्रदर्शनों में इस नीति का कुछ हद तक खुला क्रियान्वयन दिखता नजर आया। 

11. यह अवश्य है कि बाहरी दोस्तों और दुश्मनों दोनों को विपक्ष में केवल प्रतिक्रान्तिकारी लोग दिखते हैं जिन्हें मियामी फंड करता है, जबकि राजसत्ता के आलोचकों में सर्वाधिक क्रांति-समर्थक विपक्ष है जो आर्थिक सुधारों की आलोचना करता है जिनकी वजह से पूंजीवादी तबके सशक्त हो रहे हैं। यह क्यूबाई क्रांति की एक विशेषता की ओर इंगित करता है कि उसने क्रांति को स्थायित्व (स्टबिलिटी) के समानार्थी कभी  नहीं देखा। इस वजह से क्यूबा में यथास्थितिवाद के खिलाफ लगातार संघर्ष मौजूद रहा है। स्थायित्व के खूंटा-गाड़ संस्कृति के खिलाफ क्यूबा की क्रांति में अनित्यता के सिद्धांत का क्रांतिकारी समन्वय है। पूंजीवादी विश्व मे क्रांति की अपूर्णता और अविच्छिन्नता की अनिवार्यता को मानते ही हुए सामाजिक क्रांति की वर्चस्वता को लगातार पुनरुत्पादित किया जा सकता है। शायद आज भी क्यूबा के क्रांतिकारी “खाई में संसद” चलाने के दायित्व को गंभीरता से लेते हैं। और यही वजह है कि क्यूबा में आज भी क्रांति जिंदा है — हाँ, उसकी गति ग्राफ के उतार-चढ़ाव में बहुत हद तक बदलती अंतरराष्ट्रीय स्थिति निर्णायक भूमिका निभाती है। 

राजनीतिक विकल्प: चुनावी या आंदोलनकारी (Political Alternatives: Electoral or Movemental)


On the Significance of the Polemical in Marxism


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A polemic for revolutionaries is a militant dialogic practice to reveal the contradictions of a position, hammering it down to break open its hardened crust in order to rescue life from the stifle of the canon. It is akin to the Socratic dialectic or a militant वादकथा in the Indian tradition, where you demonstrate the limits of a given position – you don’t deny its truth, you begin from it, while going beyond it through the process of dialectical sublation.

However, standard polemics are mere means of defending a canonised position against every particular context. They fetishise forms as in the old tradition of liturgical polemics. Such polemics oscillate between captions criticism or वितंडावाद and जल्पकथा seeking to vanquish the opponent.This polemical exercise is totally opposite of the conception of immanent critique so essential to Marxism. It dualises the text and the context, and then trims the latter to fit the former. This is what can be called lilliputianism —tickling and tempting the giant, while attempting to bind him with the fragile threads of mental schemas.

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The purpose of a revolutionary polemic is not just defending a position against another, but to clarify and sharpen one’s own by assimilating the partial but essential truth of the other, while rejecting its form. The polemical form is a means of unfolding one’s own position — towards “self-revelation”. That is why emerging from the polemical furnace the position actually doesn’t remain the same. A proof is Marx’s treatment of Feuerbach, Stirner, Bauers & c. in The German Ideology or of Proudhon in The Poverty of Philosophy or even The Holy Family. This polemical phase of Marx’s biography had the sole purpose of clarification (which included self-clarification, as Marx later mentions in the preface to his The Contribution to the Critique of Political Economy).

This polemical form that we see dominating in many of Marx’s early writings mutated into an important formal and literary element of his critique of economic categories, of his practice of immanent critique. This is evident in his published and unpublished economic writings. It never lost its vigour, the proof is Capital itself, where it helps in building the rigour. In fact, Marx is at his polemical best in all these writings —eg., his fragments on Bastiat and Carey in Grundrisse.

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On Anti-Dühring

Engels’s Anti-Dühring is a landmark in Marxist discourse and practice. It is arguably the most important exercise in the polemical clarification of ideas within the tradition of the working class movement and Marxism. The German Ideology, which could compete, remained in the notebooks. “We abandoned the manuscript to the gnawing criticism of the mice all the more willingly since we had achieved our main purpose – self-clarification.” Anti-Dühring, on the other hand, was the movement’s self-clarification.

For a century at least, Anti-Dühring continued to be the model of Marxist polemics for both revisionist and revolutionist Marxists. In fact, it became a foundational textbook for learning Marxism throughout the globe. It is a polemical text (as clear from the name itself) with the purpose of systematic self-clarification. Nobody reads this text to know the blunders of Dühring, but everybody comes to it for the most accessible treatment of various tenets of Marxism.

But then a textbook always has its limitations and drawbacks. This is true about every good polemical text too —it has a pedagogical significance, students must outgrow it. But like any textbook, such texts become the texts of institutional orthodoxy, not a mere initial stepping stone — not just a transitory moment in theoretical development. The polemical form is autonomised, it becomes an end in itself, not a means of self-clarification. This has been the fate of many of Engels’ works, especially Anti-Dühring, in the hands of Marxist believers.

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The recent phenomena of academic industrialisation and corporatisation of Marxism through the depoliticised liberal formal academia, on the one hand, and of the supra-political institutionalisation of public intellectual Marxism, on the other, by the publishing industries have marginalised the polemical aspect of Marx and Engels’ works (especially Engels’) to insignificance. It has been reduced to a mere literary form or style appropriate for twitter, Facebook and other social media channels.

However, the political-pedagogical nature of the polemical and its unique relevance in the development of Marxism and working class politics in general can scarcely be denied. It is definitely a form, but which is organic to the essence of Marxism. It is very different from the schematic lilliputianism of sectist politics that seeks to dominate and annihilate. It emerges as a method to demonstrate limits of ideas, positioning them to various levels of abstraction, while approximating the concrete in thought through the dialectic of the polemical dialogue.

We cannot take our poetry from the past but only from the future


We have often used this statement by Marx to attack others:

“Hegel remarks somewhere that all great world-historic facts and personages appear, so to speak, twice. He forgot to add: the first time as tragedy, the second time as farce. Caussidière for Danton, Louis Blanc for Robespierre, the Montagne of 1848 to 1851 for the Montagne of 1793 to 1795, the nephew for the uncle.

It is time to use it to critique ourselves, as we too have our Lenins, Trotskys, Stalins, Maos, Ches….

Actually, the whole first chapter of The Eighteenth Brumaire of Louis Bonaparte is a necessary reading to understand and critique the left and also its obsession not so much with history but with historical facts.

Marx’ critique of revolutionary language in that chapter is quite powerful. (We should perhaps also keep in mind that when Marx was writing this text the French Revolution had happened around 60 years ago. But for us the Russian Revolution happened more than 100 years ago, the Chinese Revolution 70 years ago and…)

Another famous quote from the text is “Men make their own history, but they do not make it as they please; they do not make it under self-selected circumstances, but under circumstances existing already, given and transmitted from the past.”

This is generally posed as a principle of historical materialism, to counter idealism and voluntarism. But Marx uttered this to critique ideology —the process of the fetishisation of the past —names, slogans and costumes etc.

What immediately follows the above statements is quite revealing. It shows how and why such fetishisation happens and ideologies are formed:

“The tradition of all dead generations weighs like a nightmare on the brains of the living. And just as they seem to be occupied with revolutionizing themselves and things, creating something that did not exist before, precisely in such epochs of revolutionary crisis they anxiously conjure up the spirits of the past to their service, borrowing from them names, battle slogans, and costumes in order to present this new scene in world history in time-honored disguise and borrowed language.”

He adds,

“Thus Luther put on the mask of the Apostle Paul, the Revolution of 1789-1814 draped itself alternately in the guise of the Roman Republic and the Roman Empire, and the Revolution of 1848 knew nothing better to do than to parody, now 1789, now the revolutionary tradition of 1793-95.”

We can easily replace these figures and facts with ourselves and the historical names, costumes etc with which we seek to connect to.

In fact, Marx compares this tendency with that of “the beginner who has learned a new language”. He “always translates it back into his mother tongue.” But “he assimilates the spirit of the new language and expresses himself freely in it only when he moves in it without recalling the old and when he forgets his native tongue.”

So in which stage of learning are we presently?

Marx differentiates between those who were indulging in “conjuring up of the dead of world history” during his own time and the old French revolutionaries. The latter “performed the task of their time – that of unchaining and establishing modern bourgeois society – in Roman costumes and with Roman phrases.” Once the tasks were completed, the “resurrected Romanism” also disappeared.

According to Marx, the bourgeois revolutionaries needed the old language of “heroism, sacrifice, terror, civil war, and national wars” to bring the bourgeois society into being, as it was in itself unheroic. “And in the austere classical traditions of the Roman Republic the bourgeois gladiators found the ideals and the art forms, the self-deceptions, that they needed to conceal from themselves the bourgeois-limited content of their struggles and to keep their passion on the high plane of great historic tragedy.”

But what is our purpose in conjuring the past?

Marx further says:

“Thus the awakening of the dead in those revolutions served the purpose of glorifying the new struggles, not of parodying the old; of magnifying the given task in the imagination, not recoiling from its solution in reality; of finding once more the spirit of revolution, not making its ghost walk again.”

But during Marx’s time, as in our times too, “only the ghost of the old revolution circulated”. The old names, facts etc become means to disguise, and hide trivialities and “repulsive features”. Only “caricatures” could be produced now with these. Why is this so? Because,

“The social revolution of the nineteenth century cannot take its poetry from the past but only from the future. It cannot begin with itself before it has stripped away all superstition about the past. The former revolutions required recollections of past world history in order to smother their own content. The revolution of the nineteenth century must let the dead bury their dead in order to arrive at its own content. There the phrase went beyond the content – here the content goes beyond the phrase.”

So, what lessons can we draw from all this? For this purpose, let us improvise on the last quote.

Today, “the social revolution… cannot take its poetry from the past but only from the future. It cannot begin with itself before it has stripped away all superstition about the past.” Let us not use “recollections of past world history in order to smother” the content of today’s revolution.

Today, “the revolution… must let the dead bury their dead in order to arrive at its own content.” We must not allow our phrases to overpower and hide the content, since the content today will tear every veil of phraseology.

Didn’t Lenin too tell us not to behave like comedians who “chase words, without thinking about how devilishly complicated and subtle life is, producing entirely new forms, which we only partly ‘catch on’ to”? We must go beyond words and phrases, beyond our literary preferences of names and facts.

Brecht on “the Concept of Class”


8 Jan 42

the concept of class too, perhaps because it has come down to us as it was framed in the last century, is used much too mechanically today. there is nothing to be derived from a purely statistical concept of a german working class nowadays; yet such a concept is deep-seated. trade-unions and political parties are accustomed to count members. the political concept is devalued too, since it presupposes organisations and ‘democratic forms of state’, a ‘free interplay of forces’ which can be steered by the ruling class. the closure of the labour market in the interests of the war economy has damaged the term ‘class’ as an economic concept. what remains is the class itself. it, happily, is not just a concept.

the fact that wars cannot be waged without the proletariat (as the productive force) does not mean that a war which is disagreeable to the proletariat cannot be waged. a revolutionary situation only comes into being when eg it takes the individual initiative of the proletariat to fight a war that the proletariat favours, or when a lost war can only be liquidated by the proletariat. etc etc.

In this entry from his Journals 1934-1955, Brecht captures the complexity of the class question. The “coming down” of this concept as “framed” in a particular phase in history leads to its devaluation in another phase in history. The statistical, political and economic conceptions were all devalued in the phase of the war economy, but what remained was the class itself, which “happily, is not just a concept.” In this note, he implicitly advances the need for the movement of concept to capture the reality of class.

In the second para, he brings out the reality of the proletariat of which Marx and Engels talked about in their Communist Manifesto – of the dialectic of class formation. Marx and Engels achieved this by critiquing the political economic logic of competition and cooperation as foundational to the formation of classes and class struggle in capitalism. They showed how the negation of classification is immanent in the process of classification. This dialectic recurs in Brecht’s writings at numerous occasions. As an example, we can cite one of his most used and abused poem, General, den Tank, or even his War Primer. In fact, that is why montage is central to his creative writings which captures the dynamics of internal relations that constitute the real, thus reclaiming “the genuine reality [that] has slipped into the functional”. The problem of the proletariat as the “productive force”, as a reification that constitutes capital, as being complicit in wars does not do away with the proletarian initiative. In fact, it is this initiative or art that interrupts the normal exposing what has been functionalised, thus generating “a revolutionary situation.”

This note can be posed as an answer to the dominance of the analytical tradition within the progressive (including the Marxist) circle in our times, which can be broadly divided into two complementary sections. On the one hand, there are those who immediately deploy the analytical concepts trying to straitjacket the concrete to suit those concepts, while on the other, there are those who in reaction stoop down to radical empiricism proclaiming the death of the grand narrative (including class), worshipping relativism. The poverty of both these sections is their tendency to reduce concepts to mere descriptive categories. It is in this regard that we can combine them under the identity of (post) structuralism.

In the above note, what Brecht achieves philosophically is an articulation of the distinction, yet necessary and problematic relationship between the real and the conceptual – “the class itself” and “the concept of class”.

The Taming of the Shrew: India’s Left in the 2019 Elections


“…the people
Had forfeited the confidence of the government
And could win it back only
By redoubled efforts. Would it not be easier
In that case for the government
To dissolve the people
And elect another?”

– Bertolt Brecht

“Procrustes, or the Stretcher …had an iron bedstead, on which he used to tie all travellers who fell into his hands. If they were shorter than the bed, he stretched their limbs to make them fit it; if they were longer than the bed, he lopped off a portion. Theseus served him as he had served others.”
– Bulfinch’s Mythology

1. Elections are procrustean rituals in an institutionalised democracy to contain and channel the social (over)flow and productivise it to manufacture a government and its legitimacy. By recursive re-discretisation of the social flow into manageable units, the citizenry is recomposed. In these elections, it is not the public that elects the government but the state that reassembles the public to produce the government. This reconstituted public gets the government that it deserves.

2. In the elections of 2019, against the right wing politics of communal polarisation, the left liberals in India have been seeking to pose a different sort of polarisation. Either you are on this side or that side. It doesn’t matter even if some who are on this side, earlier they were on the other and next time again they may fall there, whenever the juggling of elections happens and post-electoral alliances are made. For them, the poles are poles, stuck to the ground.

3. Hence, there is more to the 2019 elections for our nationalist left liberals. As they themselves say, it is a historic moment. And it is indeed something historic that liberal manichaeism seeks to achieve. If BJP is, what they say, a fascist party, then the liberals are imagining something unique in these elections – of defeating fascists in the elections. The fascist regimes, classically, might have come through elections, but have never been eliminated in them.

4. Now, the only strategy that seems to achieve this is by ensuring that votes are not divided (for which a Manichean binary is necessary). Marx’s dictum that all such phrases of not splitting votes and that the reactionaries might win because of the split are meant to dupe the proletariat seems outdated for the doomsday New Left. They want to defeat neoliberal authoritarianism through the procrusteanism of liberal democracy, while the right seeks to synchronise them.

5. However, by posing and making these elections as a two party contest, our marginalised left liberals are binding themselves to the dangerous game of attracting the median voter. In a bipolar contest the result is a more and more identity of opposites. And when much of the opposition is already centred on non-oppositional disagreements rather than based on any principled opposition, the difference is internal. You are but an image of your opponent.

6. They identify the hindutva brigade as a fascist pole, against which they want to see everyone else together. However, this ideal has never been realised, perhaps fortunately for the benefit of the left liberals themselves. The divided regional forces whether in NDA or outside are the only respite against homogenised authoritarianism in the country. From within liberal democracy, the intensification of regionalist localism, along with institutionalised parliamentarianism are the only safeguards left against the hindutva brigade. This is what left liberals don’t realise when they indulge in their anti-fascist rhetoric. Anyway, with this rhetoric they don’t impress anyone but themselves. The major regional forces whenever they take up this rhetoric seriously, they use it merely as a bargaining chip against centrism.

7. The right wing forces have been the main agencies to recompose the relationship between state and civil society across the globe – of combining authoritarianism with liberal democracy. Only by a complete profanation of institutions that emerged in earlier regimes of accumulation that capital can reproduce the state in the neoliberal conjuncture. The barriers must be broken time and again to refinancialise the social factory – the neat divisions between different socio-economic spheres, between productive and reproductive regimes are obsolete and costly. These barriers that managed the surplus/ superfluous population through much-acclaimed welfarism are not required now – they must integrate to form a continuous reserve army. The desacralisation of liberal social-administrative spheres is part of this process. In recent years the right wing attack that directly concerned the left liberals has been in academia. The academia is increasingly made market friendly, not allowing any section of population to take perpetual “study leave”. It is not the quality that matters but quantity – production for production’s sake. Ultimately all of us produce data, and are data ourselves.

8. The left in the name of defending the “gains” is caught up in a contradictory position of defending the status quo. The right-wing forces, on the other, by attacking those gains show far more clear understanding of the contradictions that they expose. They defend the status quo by eliminating those contradictions and expose the brutal structure in its naked form. But this naked coercion would need a new regime of legitimation, because a long-term overexposure of its coercive apparatus can be a doom for the whole system. One of the gains of the right wing onslaught is to regiment the progressive forces and make them complicit in preserving the status quo, by bringing legitimation back to the structure. The cover-up of gains and incremental progress provides the structure a long life. ‘Defending the gains’ doesn’t always need to be a defence of the socio-administrative structure that provisioned those gains. They can be a ground to recognise, expand and generate more cracks in the structure, and create more crises for its reproduction. And in this negation develops a new grammar of social relations. But for left liberals there is no alternative (TINA) – Liberal democracy or Fascism!

9. In an interview to New Left Review in 1975, Communist thinker and leader K Damodaran lamented the failure of Indian left to differentiate between state and government, and hence, their inability to understand their relationship too. There are some who confuse between state and government to pose the impossibility of immediate political actions and there are others who find this confusion very productive, when haloed as the relative autonomy of the state and the political, to justify indulgence in bourgeois polity.

10. In fact, this confusion is one of the means through which the state avoids an overexposure. It is how it camouflages itself in the everydayness of governmentality. The state’s mood fluctuations, given a constant reshuffling in the relationship between the political and the economic, emerge as multiple political fetish-forms, as political forces, and even regimes. You can worship the state in whichever form you like – if nothing suits you, you pronounce it, you will get what you need – a new form! The spirit of state is fathomless and boundless – all political forms, their enthronement, dethronement or re-enthronement combine to constitute “the rhythm of the spirit”. The magic of capitalist state works on only one principle, which Prince Tancredi Falconeri pronounced –

“Se vogliamo che tutto rimanga com’è bisogna che tutto cambi” (“If we want things to stay as they are, things will have to change.”) – Giuseppe Tomasi di Lampedusa, The Leopard (Il Gattopardo)

“If you can’t change the world, change yourself.”


“While Butler, needy wretch, was yet alive,
No generous patron would a dinner give;
See him, when starved to death, and turned to dust,
Presented with a monumental bust.
The poet’s fate is here in emblem shown,
He asked for bread, and he received a stone.”

Ultimate!!! Marxism is really going big and funny – academic and publishing monopolies, and now this!!! We danced every time a mainstream publication or newspaper or liberals called Marx’s this or that theory relevant. In fact, this has been the job of Marxist academia and publishing businesses, of convincing the mainstream of the prescriptive, descriptive and analytical relevance of Dr Marx. In the name of rigour, the great sanitised figure of Marx the theoretician is built, who cannot be charged of Leninism (well, Leninology too is there to do similar with Lenin) and of the “crimes” of the Georgian and other Orientals. The Melancholic figure of Prof Marx, instead of Bacchanalian inclinations of Herr Marx. Marx’s father tried hard to achieve this by forcing him to transfer from Bonn to Berlin, the “workhouse”, but he eventually failed and died. But now it is different, it does not matter if his spirit rebels, the high priests of academic and publishing Marxisms can easily exorcise “the spectre of Marx”.

If this was not sufficient, there are already some new moles in the market who are prepared to take on capitalists with AltMarxist cryptocurrency, Marxcoin, our own money. Of course, “money cannot overthrow capitalism”, but with money we can win capitalism. Who cares about Marx’s attacks on “artful tinkering with money”? These have been sufficiently academicised, or reduced to policy and economic issues. The spirited science of Marxist polemics is gone. Who cares about Marx’s form and content dialectic?

Time to rewrite the Eleventh Thesis: “If you can’t change the world, change yourself.” Or perhaps in the context of 100 years of the October Revolution (and what we have been doing after 1989), we can further innovate, “We have been interpreting ourselves in various ways, the point is to change ourselves.”

Notes on Materialism in Earliest Marx


1. Marx’s “Reflections of a Young Man on the Choice of a Profession” that he wrote for school-leaving Examinations in August 1835 (when he was 17 years old) is quite revealing. We find some definite traces of his social materialism in this otherwise idealist text.

2. Nature and deity in these Reflections are forces of necessity. They determine the sphere of activity for animals, which animals cannot transcend. But for humans they provide “a general aim” towards which they must seek their own roads and means.

3. But this open-endedness of human activity is a source of both fulfilment and frustration. It is here experience, knowledge and conscious learning become crucial.

4. However, the “deity” or force of necessity does not leave human totally helpless – it “speaks softly but with certainty.” She must know how to recognise it, without self-deceiving.

5. This recognition of necessity can easily be lost in immediate and momentary inspirations, imaginations, emotions, phantoms acting on our impetuous instincts – thus the voice of the deity is drowned and we suffer.

6. In the choice of profession one needs to hear the true calling (the voice of the deity, the necessity). Once you give yourself to the demon of ambition, you lose sight of the “deity” and start relying on “chance and illusion”. You still remain an object of necessity, but obviously not as a master navigating through the narrow escapes provided by necessity to your destination. Instead you walk without a guide and without any knowledge of the pathways, hitting the walls of necessity. And the result is failure and “self-contempt”. Now not just our physical and intellectual constitution, but also already established social relations act as the given structure of necessity. It is here that even the Earliest Marx stands united with the core of early and late Marx’s materialism:

“our relations in society have to some extent already begun to be established before we are in a position to determine them.”