घटना


“नहीं, ऐसे काम नहीं चलेगा –
ज़िन्दगी को अखबार बनाकर पढ़ते रहना!
कोई-न-कोई तो बता ही देगा वह रास्ता
जिस पर घटनाएँ मिलती हैं”
भारतभूषण अग्रवाल

घटनाएँ होती थीं मगर अब नहीं
अब तो स्क्रीन पर फैलती सिकुड़ती
ज्यामितिक रेखाएँ हैं
और उनके पीछे अदृश्य फार्मूलें

जितनी भी खूबसूरत या
भयंकर खबरें हैं
उनके तह में यही फार्मूलें हैं
और घटती बढ़ती चर राशियाँ
यही घटनाएँ हैं
और घटनाओं की अभिव्यक्तियाँ

और परत हटाएँ
तो उनके पीछे सर्किटों का अजीब सर्कस है
जो आदमी सुलझा नहीं सकते
मगर लगातार उलझते जाते हैं

और उनके पीछे अनगिनत लोग हैं
ज़िंदा और मुर्दा अपने खोह में समाए हुए
कब्र में दफ़नाए हुए
सभी से ओझल अपने आप से ओझल
उन्हें पता है कि वे खुद क्या करते हैं
मगर अनभिज्ञ हैं
इनसे क्या करते हैं

घटनाएँ कहाँ हैं
सामने होती हुईं
या उनके होने में खोती हुईं

क्या खबर?


कोई खबर नहीं है वतन से
कि हमको आदत पड़ी है
कि हम सोते रहें और खबर मिल जाए

कि कल तक तो कोई चिंता नहीं थी
खबर भी नहीं थी
जरूरत नहीं थी

सिर पर बहुत बोझ आन पड़ा था
मुश्किल में खुद ही कल तक पड़ा था
आज अब मौका मिला है

खबर खोजते हैं
जिनके सहारे
अपनी खबर हम खुद को सुनाएँ

उत्साह


यानिस रित्सोस

जिस तरह चीज़े धीरे-धीरे खाली हो गयी हैं,
उसके पास करने को कुछ नहीं है। वह अकेला बैठता है,
अपने हाथों को देखता, नाख़ून – अजनबी लगते हैं –
बारबार अपनी ठुड्डी छूता है, कोई और ठुड्डी
लगती है, बिलकुल ही अजनबी,
इतनी नितांत और स्वभावतः अजनबी कि उसे खुद
इसके नएपन में मजा आने लगा है।

बीमारी सच बोलने की


वे हैं तो सब कुछ मुमकिन है
क्योंकि इन सब के बाद भी वे हैं
और तुम सोचते हो उनको नंगा
और अपने आपको बालक

जो कि तुम बिलकुल हो अबोध
अपने ख्यालों की दुनिया की
सच्चाई को ही सच्चाई मानते
और पनचक्की पर वार करते हो

ये बीमारी सच बोलने की
बेवकूफी है कि तुम्हें कौन सुनेगा
जो सुनते हैं वे जानते हैं
वे तुम्हीं हो अपने आपको सुनते

मगर यह सच उनका नहीं है
जिन्हें तुम सुनाना चाहते हो
बताना चाहते हो सच्चा सच
आंकड़ों में ढूंढ़ते हो जिन्हें

वे अपना सच अपनी रोज़
की थकान में गुज़ार देते हैं
तुम्हारे आँकड़े उस कशमकश
के नतीजों को मापते हैं

मशीनों से पसीनों की जूझ
व उनके गंध तक नहीं पहुँचते
जहाँ खून और तेल के मिलाप से
अजीब सा नशा फैल जाता है

होली ही होली है


गिरा है खून उस तरफ
इस तरफ रंगीनी है
घरों में मातम है
दिलों में संगीनी है
वहाँ की खून की होली
इन्हें रंगोली है

समय का पहिया है
आज ये है
तो कल वो है
आज भीड़ इनकी
तो कल उनकी
टोली है

हर रोज़ कहीं दिवाली है
जो नहीं तो फिर
होली है

२७/०९/१९

परिवर्तन: यानिस रित्सोस


यानिस रित्सोस (1909-1990) यूनान के महान क्रांतिकारी कवि थे।

जिसको तुम शांतिप्रियता या अनुशासन, दयालुता या उदासीनता कहते हो,
जिसको तुम दाँत दबाए बंद मुँह बताते हो,
जो मुँह की प्यारी चुप्पी दिखती है, दबे दाँतों को छुपाती,
वह उपयोगी हथौड़े के नीचे धातु की केवल धैर्यपूर्ण सहनशीलता है,
भयानक हथौड़े के नीचे – तुम्हारी चेतना है
कि तुम निराकारता से आकार की ओर बढ़ रहे हो।

आज़ादी


तेज हवाएँ पत्ते झाड़ते हैं बंधनों को
जो बाँधते हैं उन्हें तने हुए वृक्षों से
काठो-र सुरक्षा तोड़ कर क्षणिक
उड़ान भरने की असुरक्षित आज़ादी

यह क्या है उत्सव है या शहादत है
या कोई अचानक उठती बगावत है
विप्लव का आगाज़ है नवीनता का
प्रसव बेशक यह व्यवस्था की बर्बादी