A Note on Premchand and the Proletarian Context


“अब तो शहरों में मजदूरों की मांग है, रुपया रोज खाने को मिलता है, रहने को पक्का घर अलग। अब हम जनिंदारों का धौंस क्यों सहें, क्यों भर पेट खाने को तरसें? —  प्रेमाश्रम (Premashram)

While Premchand’s stories have numerous references to proletarian life, they generally portray a realist sad picture of a rickshaw-puller, of workers and the cesspool of urban life. However, a careful reading of Premashram shows how the presence of wage labour gave peasants of Awadh a context to act transcending the fatalism of rural life. 

The greatness of a fiction writer depends on her awareness of those aspects of reality which are essential to produce its fictionalised model and, of course, on her ability to connect them sensitively to generate such a model, which is then incubated to develop a full-scale narrative. It is not any “scientific knowledge” of the reality, but its sensitive awareness, which helps her uncover and/or discover those irrational and rational socio-psychological aspects, which non-fiction cannot even imagine to reach. 

It is important to remember that reality is not simply the real, i.e., what is, but what is not too, the unreal, the imaginary that stays with us as possibilities — again not just as actual possibilities, but also as remote and abstract possibilities, constituting the horizons of our imagination. Fictions work at the level of those horizons.

Premchand’s Premashram demonstrates his awareness of the rural reality of Awadh and of the constitutive conflicts.  He is able to capture the passive revolution that was changing the rural setting, and emergent class consciousness and solidarity among the rural poor grounded in their everyday class experience and conflicts.

The novel is able to provide us an insight into the antinomies of Indian nationalism too — we have characters representing patriarchal humanism of the rentier class, incipient calculative rural bourgeois landlord interests, enlightened bourgeois utopians, diverse levels of indigenous bureaucratic class, proletarianising peasantry, all feeding into the constitution of this nationalism.

The global context of  socialist movements, the Russian revolution and productive-technological evolution too become important elements in the novel as a constant background and through their discursive contributions. Many critics have of course mentioned this. 

But an element of the contemporary reality which in my view is very crucial to grasp the novel and Premchand’s astuteness has generally been ignored or has not been identified. It is the fact of rural-urban migration and wage labour which in this novel at least exists not as a sign of distress, but as an opportunity and freedom for the rural poor. Migration and wage labour are escape routes that allow the rural poor enough confidence especially among the youth to engage in open conflict with rural oppressors. 

It is not to say that Premchand considers wage labour to be an opportunity for a better life (in many of his stories he has shown the plight of migrants and wage labour). However, he is definitely aware, at least in Premashram, that the rural poor’s militancy is derived to a large extent from the proletarian context.

भेड़िया, भेड़िया: नव-उदारवादी राजतंत्र और उदारवादी वामपंथ


1

“भेड़िया आया, भेड़िया आया” वाली कहानी याद कीजिए। वह एक बच्चे की कहानी है जो ‘भेड़िया आया, भेड़िया आया” का झूठमूठ शोर मचाकर गाँववासियों को इतना तंग करता है कि जब सचमुच भेड़िये आते हैं तो उसको बचाने कोई नहीं आता। पर वह बच्चा गाँववालों से शायद ज्यादा समझदार था। उसे भेड़िए के आने की संभावना का पता था, वो तो बाकियों की तैयारी की परीक्षा ले रहा था, और बता रहा था कि कुछ करो कि भेड़िए के आने की संभावना ही न रहे। आज देखिए, हर जगह ड्रिल होते हैं, युद्ध की तैयारी, आग से बचने की तैयारी, भूकंप के वक्त आप क्या करेंगे उसके लिए तैयारी — इन सब के लिए ड्रिल होते हैं। शायद वह बच्चा अपने समय से आगे था, और यही उसका दोष था।

हम लोगों की स्थिति कुछ गाँववालों की तरह हो गयी है। असल मे हमारी कहानी उनसे भी ज्यादा हास्यास्पद है और दुखांत भी। भेड़िए के आने का डर तो पूंजीवाद में लगातार रहता है, हमें उसके लिए हमेशा सतर्क रहना चाहिए और तैयारी करनी चाहिए — इस तैयारी में भेड़िए के अवतरित होने की संभावना का भी नाश शामिल है। परंतु जो बच्चे पहले “भेड़िया, भेड़िया” चिल्लाते थे, उन्हें बचकाना बोलकर इतना शर्मसार किया जाता था कि उन्होंने भेड़िया देखना ही बंद कर दिया और प्रौढ़ हो गए। या फिर छिपे भेड़ियों ने उन्हें निगल लिया।

हमने आज के लिए अपने आप को कभी तैयार ही नही किया। आज जब भेड़िये छुट्टा घूम रहे हैं और सड़कों पर उन्ही का राज है तो अब हम हैं जो “भेड़िया, भेड़िया” चिल्लाने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहे हैं। भेड़िए भी शातिर हो गए हैं — वे चोगा पहन कर घूमते हैं, ताकि हम चिल्लाएँ नहीं। कभी कभी तो ऐसा हो जाता है कि हम जब “भेड़िया, भेड़िया” चिल्लाने लगते हैं तो कई भेड़िए भी हमारे साथ चिल्लाने लगते हैं — अक्सर देखा गया है कि हमारे बच्चे भी ये सब देखकर “भेड़िया भेड़िया” की जगह मोगली की तरह हू-हूआने लगे हैं।

2

शायद हालात इतने बुरे नहीं हैं। देखिए हम आप कितना व्यवस्था को गलिया रहे हैं, कुछ हुआ तो नहीं। जहाँ बुरी है स्थिति वहाँ इतना आप कर सकते हैं? ज्यादा दूर जाने की ज़रूरत नहीं है, पूछिए कश्मीरियों से। हममें से कुछ नामदारों को अब ईनामदार बना रही है व्यवस्था, इससे ज्यादा क्या हो रहा है? हमारे लिए नया नेतृत्व और नई राजनीतिक भाषाएँ तैयार हो रही हैं।

अब प्रशांत भूषण के मामले में ही देखिए, उनके पक्ष में तो अटॉर्नी जनरल भी खड़े हैं यानी सत्ता पक्ष भी खड़ा है। अगर आप ध्यान दें तो सत्ता पक्ष बारंबार न्यायालय की अभिजात्य स्वायत्तता पर प्रश्नचिह्न उठाता है। हमारी सारी दलीलें जो आज हम दे रहे हैं उसका इस्तेमाल सत्तापक्ष न्यायपालिका की अभिजात्य स्वायत्तता के खिलाफ मतैक्य विकसित करने में कर रहा है।

हम न्यायपालिका की अभिजात्यता यानी अपने आप को आलोचना से ऊपर मानने की उसकी प्रवृत्ति के खिलाफ बोल रहे हैं, पर हम उसकी पूर्ण स्वायत्तता को बचाना चाहते हैं। हमारा मानना है कि न्यायपालिका सत्तापक्ष के हित में काम कर रही है, और उसके आलोचकों को हतोत्साहित कर रही है। जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए।

दूसरी तरफ, सत्तापक्ष भी न्यायपालिका की अभिजात्यता पर प्रश्न चिह्न उठाता है ताकि न्यायपालिका अपने आपको शासन की तात्कालिक और गतिमान आवश्यकताओं के दायरे में सीमित रखे। इसीलिए न्यायाधीशों की बहाली का अधिकार सत्तापक्ष अपने हाथ मे रखना चाहता है। हम जो माहौल तैयार कर रहे हैं उसका इस्तेमाल सत्तापक्ष न्यायपालिका की स्वायत्तता को सापेक्ष अथवा सीमित करने में करेगा।

न्यायिक अभिजात्यता न्यायिक स्वायत्तता का नतीजा है। पर यह स्वायत्तता पूंजीवादी राजसत्ता की संरचना से पैदा होती है। वर्ग विभाजित समाज की वह देन है जिसके तहत सामाजिक अनुबंध और शांति बनाए रखने के लिए स्वायत्त संस्थाओं की ज़रूरत होती है। परंतु आज नव-उदारवाद के दौर में पूंजीवादी राजसत्ताओं को इस तरह के अनुबंध और शांति बनाए रखने के लिए लगातार विधि-विधान में बदलाव की ज़रूरत पड़ रही है, जिसमें सांस्थानिक स्वायत्तता पूर्ण क्या सापेक्ष भी बनाए रखने में दिक्कत हो रही है।

यह राजसत्ता के निरंतर संकट का दौर है — ऐसा नहीं है कि वह शांति और स्वायत्तता बनाए नहीं रखना चाहती, परंतु उसके लिए स्थायित्व चाहिए। भूमंडलीय पूंजीवादी विकास की धारा राष्ट्रीय स्तर पर स्थायित्व बरकरार रहने नहीं दे रही है। जब सहमति नहीं तो राजसत्ता का आदिमाधार प्रपीड़न काम आता है। और हमारे देश में यही हो रहा है। सत्ताएँ ऐसी सरकारें ला रही हैं जो संकटग्रस्त माहौल में जागती उत्कंठाओं को लामबंध कर उनकी व्यवस्था-विरोधी प्रवृत्ति को कुंद कर व्यवस्थापरक बना दे। आज हमारे साथ भी ऐसा ही हो रहा है — हम व्यवस्था के भूत के संरक्षक हो गए हैं।

सत्ता पक्ष हमारी विडंबना को जानता है — नहीं बोलने में भी नुक़सान है, बोलने में भी नुक़सान है। क्योंकि बोलने के दायरे में ही आज विपक्षवादी राजनीति सिमट गई है — समस्या वहां है। यथास्थिति के तहत समाधान खोजने की यह विडंबना है। हमारी पूरी राजनीति मतचर्चा में सिमट जाती है, संरचनात्मक प्रश्नों पर व्यवहार की गुंजाइश नहीं रहती।

व्यवस्था विपक्ष अथवा वामपंथ को खत्म नहीं कर रही, उन्हें उपयोगी बना रही है। खत्म होने का डर हमें व्यवस्थापरक रूप में उपयोगी बनाता है क्योंकि उस डर के अलग-अलग दर के मुताबिक हम सामाजिक उत्कंठाओं के विभिन्न स्तरों को तात्कालिक अभिव्यक्ति देकर तुष्ट कर देते हैं। अलग-अलग ब्रांड के पक्ष और विपक्ष का व्यस्थापरक उपयोग यही है। नरम से गरम तक, सभी को इस प्रक्रिया में रोज़गार मिलता है — कोई खाली हाथ नहीं रहता। राजनीति का नव-उदारीकरण है ये।

हाँ, ये ज़रूर है कि अब अगर व्यवस्था सचमुच मारने पर उतरेगी तो हम इतने नंगे हो चुके हैं कि कोई खोह नही मिलेगा छुपने को — और ये सब हमारी तथाकथित “सक्रियता” से हुआ है। ये है व्यवस्था का कमाल, जिसका हम भंडाफोड़ करने चले थे।

3

कहाँ पर क्या, कितना बोलना है, अभिव्यक्ति की संरचना बिल्कुल घालमेल हो गई है — आलाप, विलाप, संलाप सब कर्कश एकालाप हो गए हैं। तात्कालिक अभिव्यक्ति और प्रसारण की सुविधा ने हमारे अंदर हमारी राजनीतिक सामाजिक उपस्थिति का स्फीत भाव (inflated sense) पैदा कर दिया है — जिसका पैमाना फ्रेंड लिस्ट, इमोजी और अंगूठे की गिनती से तय होता है।

प्रसिद्ध मीडिया दार्शनिक मार्शल मैक्लुहान ने संदेश पर मीडिया की संरचना के असर को समझ कर ही दो तरह से मीडिया को परिभाषित किया था — “मीडिया इज़ मेसेज” (मीडिया संदेश है) और “मीडिया इज़ मसाज” (मीडिया मालिश है)। यही परिभाषाएँ सोशल मीडिया के लिए भी सटीक हैं। जिस तरह की प्रतिक्रियात्मकता और भाषा की एकरूपता सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर दिखती है, और जिस तरह से वे हमारे अंदर उपस्थिति की स्फीत भावना जागृत करती है उसके लिए यह बिल्कुल ही सही है — सोशल मीडिया सामाजिक मालिश है। इसके हमाम में हम सब नंगे हैं और एक दूसरे की मालिश में लगे हैं। ध्यान रहे, मालिश में केवल सहलाना नहीं होता, चोट भी लगती है।

हालांकि प्रतिक्रिया प्राकृतिक नियम है, और प्राकृतिक स्थायित्व के लिए यह ज़रूरी है, समाज और राजनीति में तात्कालिक (इमीडिएट) प्रतिक्रिया यथास्थिति बनाए रखने का साधन मात्र है — व्यवस्थापरक अथवा वर्चस्वीय राजनीतिक क्रिया की वह पूरक है। वह विपक्षीय राजनीति की सीमा दिखाती है।

शायद मार्क्स क्रांतिकारियों को “ओल्ड मोल” (प्राचीन छछूंदर) इसीलिए कहते थे — जो व्यवस्था के अंतर्विरोधों को तीव्र करता हुआ, उसकी नींव को ही खोखला कर देता है, वह सतही तात्कालिकता की क्षणभंगुरता में बहता नहीं है। उसके स्पेक्टेकल की चकाचौंध में अपने आप को बेनकाब नहीं करता है। और यह काम “तात्कालिक” प्रतिनिधत्ववादियों की “खुली” राजनीति से बिल्कुल भिन्न है। इनकी राजनीति तात्कालिकता में शोषितों की व्यवस्था-विरोधी ऊर्जा को तीन-तेरह करने का साधन मात्र बन जाती है। इस अर्थ में प्रतिक्रयात्मक राजनीति को प्रतिक्रियावादी बनने में देर नही लगती और इसी रूप में वह व्यवस्थापरक क्रिया की पूरक है, वह उसी में जड़ित रहती है।

4

आंतोनियो ग्राम्शी के मुताबिक बुद्धिजीवी दो प्रकार के होते हैं। उनके अनुसार जैविक बुद्धिजीवियों और पारंपरिक बुद्धिजीवियों में अंतर होता है। जैविक बुद्धिजीवी किसी न किसी सामाजिक वर्ग से सीधे और मूलतः सचेतन तौर पर जुड़े होते हैं। पारंपरिक बुद्धिजीवी, वर्गीय समाज के उत्पाद होते हुए भी अपने आप को वर्गो और उनके आपसी संघर्षों से परे और ऊपर मानते हैं।

हम “सार्वजनिक बुद्धिजीवियों” को ग्राम्शी के इस पारिभाषिक विभेद में कहां रखेंगे?

मुझे लगता है कि भारत और विश्व मे बुद्धिजीवियों के लिए जो आज संकट पैदा हुआ है वह उनकी स्वच्छंदता के विरोधाभासी गुण से पैदा हुआ संकट है। यह संकट बुद्धिजीवियो की वाचाल सार्वजनिकता और वर्गोपरि भ्रम का है। सार्वजनिक बुद्धि की यह स्वच्छंदता पूंजीवाद में राजसत्ता के वर्गीय आधार से उसकी भ्रामक सापेक्ष स्वायत्तता की देन है। सार्वजनिक बुद्धि का स्वच्छंद बाज़ार पूंजीवाद की आरंभिक राजनीतिक आत्मा — “स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा” — को वैचारिक स्तर पर संजोता है, जिससे कि पूंजी का वैचारिक वर्चस्व बना रहे और उसके असली अर्थ को पैजामा पहनाया जा सके।

पूंजीवाद की नवउदारवादी अवस्था मे पत्रकारिता और प्रकाशन के उद्योग की मदद से सार्वजनिक बुद्धि की स्वच्छन्दता का गहन बाजार पनपता है। परंतु नतीजा यह है कि इस अवस्था के संकट में सब से पहले इन्हीं सार्वजनिक बुद्धिजीवियों पर गाज़ गिरती है — उन्हें अपना वर्गीय आधार तय करना होता है। उनकी सार्वजनिकता और वाचालता उन्हें तानाशाही सत्ता के लिए आसान निशाना बना देती हैं। सत्ता उनकी इस दुर्दशा का इस्तेमाल प्रतिरोध के स्वरों को दबाने के लिए और व्यवस्था की शक्तियों को बटोर कर उसे सुदृढ़ करने के लिए करती है। सार्वजनिक बुद्धिजीवी जवाबी वर्चस्वकारी वर्गीय जैविकता को उभरने से रोकते हैं। बड़े नामों के बचाव में जो वामपंथ और उदारवाद का गठजोड़ पैदा होता है वो “सबाल्टर्न” शक्तियों की रणनीतिक निरंतरता और सुगढ़ता के लिए दिक्कतें पैदा करता है।

बोलते हुए तुम सुना भी करो!


अंधकार समय में क्रांतिकारी परिवर्तनगामी व्यवहार के स्वरूपों पर जर्मन कवि और नाटककार बेर्टोल्ट ब्रेष्ट की समझ आज भी हमारे लिए सटीक है। उनकी एक लघु कविता ये भी है:

ज्यादा न बोलो कि तुम सही हो, गुरू जी।
विद्यार्थियों को भी जानने दो उसे।
सच्चाई इतनी पेलने की ज़रूरत नहीं है:
ये उसके लिए अच्छा नहीं।
बोलते हुए तुम सुना भी करो!

फासीवाद का कम्युनिटी ट्रांसमिशन


सर्वहाराकरण की तेज होती प्रक्रिया के कारण उभरतीं दमित उत्कंठाओं को फासीवाद इस रूप में अभिव्यक्ति देकर संघटित करता है कि वे उन सामाजिक-आर्थिक और संपत्ति संबंधों के लिए खतरा न बन पाएँ जो उस प्रक्रिया और उसकी उत्कंठाओं को जन्म देते हैं । फासीवाद उन उत्कंठाओं को उनके तात्कालिक प्रतिक्रियात्मक स्तर और रूप में ही व्यक्त करने का साधन प्रदान करता है, ताकि राजनीतिकता और आर्थिकता के पार्थक्य से जो राजसत्ता पैदा होती है उसक़े पुनरुत्पादन में आम रोष के कारण रोध पैदा न हो सके। नवउदारवादी अर्थतन्त्रीय अवस्था – पूंजी के वित्तीयकरण, उत्पादन के सूचनाकरण और श्रम के अनौपचारीकरण – ने फासीवाद के इस गुण को अलग स्तर पर पहुँचा दिया है, उसको तीव्रता और व्यापकता दे दी है। अब फासीकरण (fascisation) के साधन के लिए खुली राजनीतिक तानाशाही केवल एक आपातकालिक विकल्प है। फासीवाद आज सामाजिक प्रक्रिया का रूप धारण कर पूंजीवाद की वर्तमान अवस्था की दैनिक सामाजिकता और प्रतिनिधत्ववादी औपचारिक जनतंत्र की आंतरिकता में समाहित हो गई है। और इस प्रक्रिया के चलन और संचालन के लिए अब फासीवादियों की ज़रूरत नहीं है। कोरोना के वक्त की भाषा में बोलें तो फासीवाद का आज कम्युनिटी ट्रांसमिशन हो गया है।

सन्नाटा


सन्नाटा कहाँ था
बस सन्नाटे की आहट थी
और सन्नाटा हो गया

यादों में धुआँ और आग


यह धुआँ है 
कभी आग लगी थी जंगलों में
पेड़ पशु कई ज़िंदगियाँ भस्म हुईं थीं

सरपट दौड़ते जानवरों में
एक वह भी था
जिसने पीछे मुड़ कर देखा

लपट आसमान को छूते
अपने जीभ से लपकते
जो कुछ भी सामने आया

चिंगारियाँ दूत बन विनाश के सन्देशवाहक
विस्तार देते उसके प्रचंड रूप को 
कोई भेद नहीं उसकी नज़रों में 

न छोटा न बड़ा
अपने स्पर्श से सबकुछ
एक जैसा 

समानांत सबका
असीम शक्ति
महसूस करता

बस एक ही था 
जिसने पीछे मुड़ कर देखा 
सब कुछ देखा 

वही था 
जो भागते भीड़ से अलग था
उसने पीछे मुड़ कर देखा

आग की भीषणता को
जागते देखा
फैलते देखा

छुप कर  देखा
सामने आकर देखा   
शांत होते बुझते देखा

याद है
आग से पहले का जीवन 
आग में लहराते हुए

उसके मित्रगण परिजन
और परजन  
सभी याद हैं

भागते सब एक से
कुचलते एक दूसरे को
सब याद हैं

इसी आग ने तो 
उसको आदमी बनाया
जिसने मुड़कर देखा 

अपनी याद में 
उसको जिन्न की तरह 
संजोए रखता है 

उस आग की याद 
आज तक हमारे साथ है 
हमारे अवचेतन में  

कितनी बार उस आग को
सेंकते राख हो गए
कितने ही लोग

गांव के गांव
शहर के शहर
फूंक दिए उन हाथों को 

जिन्होंने ने उसे लगाया था
फिर भी याद है
बोरसी रसोईघर और बीड़ियों में

भस्म होने का आनंद है यह
रोज़ में खोने का
कैसा आनंद है यह

मगर याद सब कुछ है  
किसी कोने में 
आज भी धू धू करता 

जुलाई 23, 2019

आज के इंकलाबी


आज के इंकलाबी
पके आम चुनते
रात के तूफ़ानी संघर्ष में थक गए
स्वतःस्फूर्त सब्ज़ आम की आलोचना
उनकी अनुभवहीनता बताते
जो लटक गए
उन्हें चुनते इंकलाबी

20 फरवरी, 2020

घटना


“नहीं, ऐसे काम नहीं चलेगा –
ज़िन्दगी को अखबार बनाकर पढ़ते रहना!
कोई-न-कोई तो बता ही देगा वह रास्ता
जिस पर घटनाएँ मिलती हैं”
भारतभूषण अग्रवाल

घटनाएँ होती थीं मगर अब नहीं
अब तो स्क्रीन पर फैलती सिकुड़ती
ज्यामितिक रेखाएँ हैं
और उनके पीछे अदृश्य फार्मूलें

जितनी भी खूबसूरत या
भयंकर खबरें हैं
उनके तह में यही फार्मूलें हैं
और घटती बढ़ती चर राशियाँ
यही घटनाएँ हैं
और घटनाओं की अभिव्यक्तियाँ

और परत हटाएँ
तो उनके पीछे सर्किटों का अजीब सर्कस है
जो आदमी सुलझा नहीं सकते
मगर लगातार उलझते जाते हैं

और उनके पीछे अनगिनत लोग हैं
ज़िंदा और मुर्दा अपने खोह में समाए हुए
कब्र में दफ़नाए हुए
सभी से ओझल अपने आप से ओझल
उन्हें पता है कि वे खुद क्या करते हैं
मगर अनभिज्ञ हैं
इनसे क्या करते हैं

घटनाएँ कहाँ हैं
सामने होती हुईं
या उनके होने में खोती हुईं

क्या खबर?


कोई खबर नहीं है वतन से
कि हमको आदत पड़ी है
कि हम सोते रहें और खबर मिल जाए

कि कल तक तो कोई चिंता नहीं थी
खबर भी नहीं थी
जरूरत नहीं थी

सिर पर बहुत बोझ आन पड़ा था
मुश्किल में खुद ही कल तक पड़ा था
आज अब मौका मिला है

खबर खोजते हैं
जिनके सहारे
अपनी खबर हम खुद को सुनाएँ

उत्साह


यानिस रित्सोस

जिस तरह चीज़े धीरे-धीरे खाली हो गयी हैं,
उसके पास करने को कुछ नहीं है। वह अकेला बैठता है,
अपने हाथों को देखता, नाख़ून – अजनबी लगते हैं –
बारबार अपनी ठुड्डी छूता है, कोई और ठुड्डी
लगती है, बिलकुल ही अजनबी,
इतनी नितांत और स्वभावतः अजनबी कि उसे खुद
इसके नएपन में मजा आने लगा है।