होली ही होली है


गिरा है खून उस तरफ
इस तरफ रंगीनी है
घरों में मातम है
दिलों में संगीनी है
वहाँ की खून की होली
इन्हें रंगोली है

समय का पहिया है
आज ये है
तो कल वो है
आज भीड़ इनकी
तो कल उनकी
टोली है

हर रोज़ कहीं दिवाली है
जो नहीं तो फिर
होली है

२७/०९/१९

परिवर्तन: यानिस रित्सोस


यानिस रित्सोस (1909-1990) यूनान के महान क्रांतिकारी कवि थे।

जिसको तुम शांतिप्रियता या अनुशासन, दयालुता या उदासीनता कहते हो,
जिसको तुम दाँत दबाए बंद मुँह बताते हो,
जो मुँह की प्यारी चुप्पी दिखती है, दबे दाँतों को छुपाती,
वह उपयोगी हथौड़े के नीचे धातु की केवल धैर्यपूर्ण सहनशीलता है,
भयानक हथौड़े के नीचे – तुम्हारी चेतना है
कि तुम निराकारता से आकार की ओर बढ़ रहे हो।

आज़ादी


तेज हवाएँ पत्ते झाड़ते हैं बंधनों को
जो बाँधते हैं उन्हें तने हुए वृक्षों से
काठो-र सुरक्षा तोड़ कर क्षणिक
उड़ान भरने की असुरक्षित आज़ादी

यह क्या है उत्सव है या शहादत है
या कोई अचानक उठती बगावत है
विप्लव का आगाज़ है नवीनता का
प्रसव बेशक यह व्यवस्था की बर्बादी

कविताओं में कंकड़


कविताओं में वे भी हैं जो कहे से इतर हैं
यानी अनकही चीजें जिन्हें आप कहते नहीं
मगर उनके नहीं कहने में ही वे आ जाती हैं

हम जो कहते हैं वे तो बस बिंदु हैं
जिन्हें ध्यान रखकर दिशाओं का आकलन करते हैं

या फिर रेखाएं हैं जिनसे हम
सच्चाई की ज़मीन पाटते हैं
उसे कहने लायक बनाते हैं

या फिर ढांचे हैं जिनमें हम सच्चाई को बांधते हैं
और बताते हैं कि यही सच्चाई है और कुछ भी नहीं

मगर नहीं वे मामूली कंकड़ हैं
जिन्हें हम फेंक दें और इंतजार करें
आम के गिरने का किसी पक्षी के उड़ने का
ठहरे हुए पानी में सिहरन का
बहते हुए पानी में बहने का
पत्तों के झुरमुट से चाँद के निकलने का

सच्चाई नहीं
सच्चाई के बदलने का

भगत सिंह का दर्शन


तुम नास्तिक थे क्योंकि तुम्हें विश्वास नहीं था
किसी सत्ता पर और उस पर तो बिलकुल ही नहीं
जो महज़ विश्वास है सत्ता के परम होने का

भक्ति तुम्हारी शक्ति नहीं थी न तुम आसक्त थे
राष्ट्र पर न किसी व्यक्ति या महज़ आदर्श पर
टिका था तुम्हारा सपना नित्यता के भ्रम को

उड़ा देना काल को अकाल समझने वालों को
जगा देना बता देना कि समय वह धार है
जो केवल बहती-बहाती नहीं काटती भी है

२८/०९/२०१९

ब्रेष्ट, समाधि लेख 1919 (Brecht’s “Epitaph 1919”)


सुर्ख गुलाब भी अब तो गायब हुआ
कहाँ है गिरा वह दिखता नहीं
गरीबों को उसने जीना सिखाया
अमीरों ने उसको तभी तो मिटाया
(1929)

वैकल्पिक अनुवाद:

सुर्ख रोज़ा भी अब तो गायब हुई
कहाँ है गिरी वह दिखती नहीं
गरीबों को उसने जीना सिखाया
अमीरों ने उसको तभी तो मिटाया

तो प्यार क्या शाश्वत है


इस कविता को पहले की कविता “हमारा प्यार” के साथ पढ़ा जा सकता है। परंतु पाठक के लिए कोई बंधन नहीं है, बस प्यार ही है। जैसे पढ़ना चाहें आप पढें…

शाश्वत तो कुछ भी नही
वो तो परमब्रह्म है
जो है मगर है भी नही

घर्षण है
वहीं आकर्षण है
प्यार उसका रूप है
जैसे छाँव है धूप है
आज है कल है
एक है अनेक है
जैसे गीत में टेक है

टकराव में ही ज्वाल है
प्यार का ताल है

जाड़े की रात में
साथ होना है
कस के
पकड़ के सोना है

अवलंबन है
सहावलंबन है
प्यार है जीवन है
प्यार ही तो जीवन है
मथ कर जीवन को
पाया संजीवन है
प्यार ही संजीवन है

(२१/९/१९)

भोर के सिपाही


उस भोर के तुम सिपाही थे
जब आसमान पर बीती रात का
खून सूख रहा था
और नया सूरज कहीं नहीं था
तुमने उस नए सूरज को गढ़ना चाहा
यही तुम्हारा अपराध है
जो भी कुछ था झोंक दिया
भीषण आग थी लपटें उठीं ऊँची
मगर सूरज तो उगेगा ही
अपने समय से हँसेगा
हमारे सपनों पर और हम
भीड़ स्तब्ध तुम्हें दोष देंगे
क्योंकि सूरज कभी गलत नहीं होता

देश बदले


सब कुछ बदलना है
कि कुछ भी न बदले
वे जहाँ थे वहीं हैं
बस देखना बदले

खाली पेट जश्न मनाएँ
प्यास हो मल्हार गाएँ
नंग-धड़ंग झंडा उठाएँ
देख कैसे देश बदले

जोश ही अब जोश हो
नीचे मदहोश हो
ऊपर ही होश हो
देख ऐसे देश बदले

हमारा प्यार


व्यावहारिकताओं ने इतने वर्षों में
हमारे रिश्ते पर
धूल के कितने परत डाल दिए हैं

हमारे प्यार तक पहुँचने को
आज खुदाई की ज़रूरत पड़ेगी

वे नहीं समझेंगे
और हम भी कहाँ समझते हैं
कि सोने पर धूल के परत जम जाएँ
और वो काला दिखे
मगर जौहरी जानता है
कि परतों के नीचे सोना छिपा है
हमारा प्यार आज भी ज़िंदा है गहरा है
उसका भूत वर्तमान भविष्य सब सुनहरा है

***
प्यार खत्म नहीं होता
वो स्रोत है जीवंतताओं का
तरलताओं का
उसका सूखना
सृष्टि की एकता का टूटना है
अंतरिक्ष में तैरते
अचानक संपर्क का छूटना है

(१६/०९/२०१९)