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नई शिक्षा नीति नहीं, बल्कि शैक्षणिक औद्योगिक नीति


नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को शिक्षा नीति न कह कर शैक्षणिक औद्योगिक नीति कहना उचित रहेगा।

1984-85 में भारतीय राजसत्ता ने बताया कि पूंजीवाद में शिक्षा (मानव) संसाधन के विकास का एक जरिया है। उसका काम अलग-अलग स्तरों के श्रम संसाधनों की तैयारी करना है। इसी कारण से राजीव गांधी ने मंत्रालय का नाम बदल दिया था ।

2020 में राजसत्ता आपको समझा रही है कि इस तैयारी को करने के लिए शिक्षा का व्यवस्थित औद्योगिकीकरण करना होगा। इसी कारण से अब वह फिर से मंत्रालय को शिक्षा मंत्रालय नाम दे रही है ताकि कोई दुविधा न रहे। मगर हम अब भी भ्रम पाले हुए हैं कि शिक्षा चिंतक बनाती है।

ऐतिहासिक तौर पर भी हम देखें तो पूंजीवाद ने शिक्षण व्यवस्था को इसी रूप में अपने आविर्भाव के पश्चात ढाला था जिससे कि एक तरफ श्रम बाजार के लिए अलग अलग स्तरों के श्रमिकों का रिज़र्व तैयार हो सके; और, दूसरी तरफ उपयोगी ज्ञान का उत्पादन हो सके, जो कि श्रम की उत्पादकता बढ़ाने हेतु तकनीकों (वैज्ञानिक-तकनीक और प्रबंधनात्मक-तकनीक) और मशीनों के निर्माण में मदद करे।

इसके साथ साथ शिक्षा का उपयोग सामाजिक-राजनीतिक प्रबंधन-तकनीक और प्रतिस्पर्धात्मक इडियोलॉजियाँ (विचारधाराएं) पैदा करने में होता है। विज्ञान के साथ-साथ मानविकी, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान आदि विषय हमारे लिए बँटे हैं, परन्तु पूंजी अपने अनुसार उन सब को बांध कर उपयोगी बनाता है।

शिक्षा के प्रथम कार्य को मार्क्सवादी परिभाषा में श्रम-शक्ति के पुनरुत्पादन का अंग माना गया है। अभी तक इस पुनरुत्पादन प्रक्रिया का अधिकांश हिस्सा बाज़ार से बाहर पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर रखा जाता था। शिक्षा के कई स्तरों को सरकारें अपने हाथ मे रखती थीं और इसी कारण सामान्य पूंजीवादी संचयन प्रक्रिया से वे बाहर या स्वायत्त दिखते थे। मगर तब भी श्रम बाज़ार से शिक्षा का गहरा रिश्ता था। और शायद यह कहना गलत नहीं होगा कि केवल प्रबंधन ही पब्लिक या सरकारी था, और इसकी मूल वजह थी कि पुनरुत्पादन के इतने बड़े कर्त्तव्य को बाजारू अराजकता पर नहीं छोड़ा जा सकता था।

परंतु एक ओर वित्तीयकृत पूंजी लगातार अस्सी के दशक से पूंजीवादी विस्तार के लिए पुनरुत्पादन की परिधि (रिप्रोडक्शन स्फीयर) को पूरे रूप से खोलने पर ज़ोर लगाई हुई थी, तो दूसरी तरफ तकनीकी विकास (खास तौर से सूचना प्रौद्योगिकी) ने इस परिधि के खुले पूंजीवादी प्रबंधन के लिए अस्त्र-शस्त्र तैयार कर दिया था। इसी कारण कोरोना महामारी के अवसर पर स्वास्थ्य और शिक्षा (दोनों ही पुनरुत्पादक परिधि से जुड़े हैं) आज पूंजी संचयन की प्रक्रिया में केंद्रीय उद्योगों के बतौर विकसित होते साफ साफ नज़र आ रहे हैं।

निजीकरण की प्रक्रिया, आईटी और वित्तीय सेक्टर का खुले तौर पर शिक्षा के अंदर प्रवेश यह काफी दिनों से चल ही रह था। नई शिक्षा नीति 2020 इस प्रक्रिया की जन्मदाता नहीं, बल्कि निष्कर्ष हैं। नीतियां और कानून किसी चीज़ की शुरुआत नहीं करतीं वह हमेशा ही निष्कर्ष होती हैं। ज्यादा से ज्यादा वह चल रही भौतिक प्रक्रियाओं को व्यवस्थित कर उन पर सरकारी मुहर लगाती हैं।

समाधान – बेर्टोल्ट ब्रेष्ट (बर्तोल्त ब्रेख्त)


17 जून के विद्रोह के बाद
लेखक संघ के सचिव ने
स्टालिनाले में पर्चे बंटवाए
यह बताते हुए कि जनता ने
अपने प्रति सरकार का भरोसा खो दिया है
और अब केवल दोहरी कोशिशों से ही वे
उसको फिर से जीत सकती है। ऐसी स्थिति में
क्या सरकार के लिए ज्यादा आसान नहीं होगा
कि वे जनता को ही भंग कर दे
और दूसरी चुन ले?

नोट: जर्मनी के कम्युनिस्ट नाटककार, कवि और दार्शनिक ब्रेष्ट ने यह कविता पूर्वी जर्मनी के स्टालिनाले में हुए 17 जून 1953 के मजदूर विद्रोह के बाद लिखी थी।

ये दीवार आईना है


ये दीवार आईना है
तुम्हें कुछ भी नहीं दिखता
क्योंकि तुम कुछ भी नहीं हो

तुम्हें दीवार दिखती है
क्योंकि तुम दीवार हो
अपने और अपनों के बीच

तुम्हें दीवार पर नाखूनों से जड़ा चित्र दिखता है
क्योंकि उस चित्र में तुम हो
तुम्हें अपना मतलब वहीं खोजना है
क्योंकि वही तो आईना है

और पता करना है कि चित्रकार कौन है

सन्नाटा


सन्नाटा कहाँ था
बस सन्नाटे की आहट थी
और सन्नाटा हो गया