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Polemics, Critique and Analysis

Archive for February 2013

Maruti-Suzuki Workers’ Struggle – Limits and Possibilities

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*मारूति-सुजूकी मजदूरों का आंदोलन – सीमाएं और संभावनाएं*

मारूति के बर्खास्त और कैद मजदूरों के संघर्ष की क्षमता और निरंतरता उनके पिछले सालों में शौप्फ्लोर पर हुए मैनेजमेंट के साथ दैनिक टकराव का नतीजा है. उनका तेवर बस एक औद्योगिक-राजनैतिक सत्य से पैदा होता है, जो मजदूर अपने दैनिक जीवन में जल्दी ही समझ जाता है कि “एक की हानि, सबकी हानि है”. पर इस सत्य का आधार अगर हम छोड़ देते हैं – यानि हम मौलिक वर्गीय संबंधों (पूंजी-श्रम के संबंधों) के धरातल से अगर इस सत्य को अलग कर दें तो यह महज़ नारे के कुछ नहीं रह जाता. मारूति आंदोलन के समर्थकों ने अपने तथाकथित राजनीति के झांसे में मजदूरों को तकरीबन ले लिया है – उनकी सुनवाई की राजनीति ने इस आंदोलन को अपने ज़मीन से लगभग अलग कर दिया है – मजदूरों के दैनिक वर्गीय अनुभवों से आन्दोलन को बहुत हद तक हटा दिया है. रोहतक, बम्बई, कर्नाटक, दिल्ली जा जा कर सरकार, मीडिया और ‘नागरिकों’ को अपनी बेगुनाही का विश्वास दिलाने के वैधानिक उदारवादी चक्र में उनको डाल दिया है.

अगर हम राजनैतिक असर की ही बात करें तो मारूति के मजदूरों की शौप्फ्लोर पर औद्योगिक हरकतों से जो असर पड़ा था उससे पूरी व्यवस्था असमंजस में पड़ गयी थी. एक तरफ अगर सरकार और पूंजीपतियों के गठजोड़ ने मजदूरों पर दमन कर उन्हें पीछे धकेला, तो दूसरी तरफ तथाकथित मजदूर हितैषी संगठनों को पहली बार कई वर्षों के अंतराल में लड़ाकू मजदूरों पर हावी होकर उड़ने का अवसर मिल गया. इन संगठनों की पूरी राजनीति मजदूरों के बेचारेपन पर टिकी है. इसी वजह से १८ जुलाई की परिघटना को पूर्ण रूप से साजिश बताना और उसे वर्ग द्वंद्व का यानि मजदूरों के पूंजी और उसके एजेंटों के खिलाफ लड़ाई का नतीजा नहीं मानना उनके राजनीति के लिए आवश्यक है. मजदूरों की नैसर्गिक और सामूहिक आक्रामकता की रक्षा और उसके सामाजिक-औद्योगिक स्तर पर फैलाव में मदद करना, उसमे व्यवस्था परिवर्तन की संभावना देखना उनके राजनैतिक दायरे के बाहर है – क्योंकि ये कार्य सांगठनिक महन्त्शाही को पूरी तरह से चुनौती देते हैं – इससे आप मजदूरों के शिक्षक से ज्यादा उनके स्व-गतिविधियों में सहकर्मी की भूमिका में ही ‘सीमित’ हो जाते हैं. तब ढोरों की तरह आप उनको हाँक कर किसी केंद्रीय स्थल पर जमा करने, भाषण पिलाने और मीडिया में फोटो छपवाने की इच्छा नहीं रख सकते. जितना आप उन्हें सिखाएंगे, उससे ज्यादा आपको उनसे और उनके अनुभवों से सीखना होगा.

यह सोचने वाली बात है कि तथाकथित राजनैतिक उड़ान के नाम पर मारूति के निकाले गए मजदूरों के समर्थन में सामजिक-औद्योगिक एक्शन कम, दरबारी गुहार लगाने की कार्रवाई पर ही ज्यादा जोर दिया जा रहा है. १८ जुलाई २०१२ के बाद मारूति में अभी कार्यरत मजदूरों और अन्य मजदूरों के साथ सम्बन्ध बनाने का टास्क ज्ञापनों की राजनीति में कहीं खो गया है. ९ दिसम्बर २०१२ को ऑटो कन्वेंशन की परिकल्पना यह दर्शाता है कि मजदूर अपने स्तर पर इस तरह के सम्बन्ध की अपेक्षा रख रहे थे, परन्तु नेताओं और हिरावलवादी संगठनों ने उनके इस प्रयास को सांगठनिक प्रतिस्पर्धा में तब्दील कर दिया. फिर ५ फरवरी २०१३ के लिए मारूति के बर्खास्त मजदूरों ने देशव्यापी धरना प्रदर्शन करने का आह्वान किया, जिसमे फिर से फैलाव में ही बचाव का सिद्धांत ही प्रमुख प्रेरणा थी. परन्तु इस कार्यक्रम के प्रबंधन के लिए स्थापित संगठनों का ही नेटवर्क सामने था, जिसने देश भर के मजदूरों के बीच कैम्पेन के जगह पर पूरे कार्यक्रम को सांकेतिक तमाशे में बदल दिया – मजदूरों के बेचारेपन और सरलता की बात मीडिया और ‘नागरिकों’ तक पहुंचाई गयी ताकि वे समझ पाएँ कि मारूति मजदूर आक्रामक तो हो ही नहीं सकते. कहीं भी यह कोशिश नज़र नहीं आई इस बात को समझने और समझाने की कि हिंसा वर्ग-सम्बन्ध और औद्योगिक व्यवस्था का मूलाधार है (जिसको शास्त्रीय भाषा में आदिम संचय कहते हैं), और सर्वहारा-आक्रामकता वर्गीय टकराव तीव्र होने का द्योतक भी हो सकता है.

(परिवर्तन की दिशा, वर्ष १ अंक २, १५ फरवरी २०१३, नागपुर)

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Written by Pratyush Chandra

February 17, 2013 at 9:06 am

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