भोर के सिपाही


उस भोर के तुम सिपाही थे
जब आसमान पर बीती रात का
खून सूख रहा था
और नया सूरज कहीं नहीं था
तुमने उस नए सूरज को गढ़ना चाहा
यही तुम्हारा अपराध है
जो भी कुछ था झोंक दिया
भीषण आग थी लपटें उठीं ऊँची
मगर सूरज तो उगेगा ही
अपने समय से हँसेगा
हमारे सपनों पर और हम
भीड़ स्तब्ध तुम्हें दोष देंगे
क्योंकि सूरज कभी गलत नहीं होता