मुमकिन


खोए हुए हैं रास्ते हम किनारे पर खड़े हैं
इंतज़ार है कि राहगीर गुज़रेगा कोई तो
उम्मीद में बैठे हैं कि चमकेगा सितारा
आएगा फलक पर नज़र निशान कोई तो

हम हर वक्त अपने अंत के साथ खड़े हैं
जैसे धरती फटे अभी हम समा जाएँ
मौत साये की तरह हमारे साथ खड़ी है
असीम छाँव है कभी भी समा जाएँ

रात गुज़रे ओढ़ चादर हमारी शय्या
क़फ़न बन जाए तो क्या मुश्किल
जिस में खोए हैं रात भर वो दुनिया
अपनी ही हो जाए तो क्या मुश्किल

हमने कितनों को गुज़रते हुए देखा है
हम भी इस रास्ते गुज़रें ये है मुमकिन
सबके पाँव छपे हैं निशान बाकी है
हम भी उन तक पहुंच जाएँ है मुमकिन

तुम्हारी बाँहें


तुम जहाँ भी देखते हो पकड़ लेते हो
अपनी बाँहों में जकड़ लेते हो
नज़र चुराएँ तो कैसे तुम्हारी नज़रों से
हर तरफ फैलते तुम्हारे पहरों से

ब्रेष्ट, समाधि लेख 1919 (Brecht’s “Epitaph 1919”)


सुर्ख गुलाब भी अब तो गायब हुआ
कहाँ है गिरा वह दिखता नहीं
गरीबों को उसने जीना सिखाया
अमीरों ने उसको तभी तो मिटाया
(1929)

वैकल्पिक अनुवाद:

सुर्ख रोज़ा भी अब तो गायब हुई
कहाँ है गिरी वह दिखती नहीं
गरीबों को उसने जीना सिखाया
अमीरों ने उसको तभी तो मिटाया

तो प्यार क्या शाश्वत है


इस कविता को पहले की कविता “हमारा प्यार” के साथ पढ़ा जा सकता है। परंतु पाठक के लिए कोई बंधन नहीं है, बस प्यार ही है। जैसे पढ़ना चाहें आप पढें…

शाश्वत तो कुछ भी नही
वो तो परमब्रह्म है
जो है मगर है भी नही

घर्षण है
वहीं आकर्षण है
प्यार उसका रूप है
जैसे छाँव है धूप है
आज है कल है
एक है अनेक है
जैसे गीत में टेक है

टकराव में ही ज्वाल है
प्यार का ताल है

जाड़े की रात में
साथ होना है
कस के
पकड़ के सोना है

अवलंबन है
सहावलंबन है
प्यार है जीवन है
प्यार ही तो जीवन है
मथ कर जीवन को
पाया संजीवन है
प्यार ही संजीवन है

(२१/९/१९)

भोर के सिपाही


उस भोर के तुम सिपाही थे
जब आसमान पर बीती रात का
खून सूख रहा था
और नया सूरज कहीं नहीं था
तुमने उस नए सूरज को गढ़ना चाहा
यही तुम्हारा अपराध है
जो भी कुछ था झोंक दिया
भीषण आग थी लपटें उठीं ऊँची
मगर सूरज तो उगेगा ही
अपने समय से हँसेगा
हमारे सपनों पर और हम
भीड़ स्तब्ध तुम्हें दोष देंगे
क्योंकि सूरज कभी गलत नहीं होता

संकट


इन्हें ज़िंदा रक्त लेकिन
इंसान मुर्दा चाहिए
आपको जो काट लें
इनकी तरह हो जाएंगे

इस तरह इनकी तरह अब
देस निर्मित हो रहा है
गर सभी इनकी तरह हों
क्या भला ये खाएंगे

देश बदले


सब कुछ बदलना है
कि कुछ भी न बदले
वे जहाँ थे वहीं हैं
बस देखना बदले

खाली पेट जश्न मनाएँ
प्यास हो मल्हार गाएँ
नंग-धड़ंग झंडा उठाएँ
देख कैसे देश बदले

जोश ही अब जोश हो
नीचे मदहोश हो
ऊपर ही होश हो
देख ऐसे देश बदले

हमारा प्यार


व्यावहारिकताओं ने इतने वर्षों में
हमारे रिश्ते पर
धूल के कितने परत डाल दिए हैं

हमारे प्यार तक पहुँचने को
आज खुदाई की ज़रूरत पड़ेगी

वे नहीं समझेंगे
और हम भी कहाँ समझते हैं
कि सोने पर धूल के परत जम जाएँ
और वो काला दिखे
मगर जौहरी जानता है
कि परतों के नीचे सोना छिपा है
हमारा प्यार आज भी ज़िंदा है गहरा है
उसका भूत वर्तमान भविष्य सब सुनहरा है

***
प्यार खत्म नहीं होता
वो स्रोत है जीवंतताओं का
तरलताओं का
उसका सूखना
सृष्टि की एकता का टूटना है
अंतरिक्ष में तैरते
अचानक संपर्क का छूटना है

(१६/०९/२०१९)