“तुम्हें डर है” के आगे


गोरख पाण्डेय की एक बेहतरीन छोटी कविता “तुम्हे डर है” में कुछ लाइनें जोड़ने की गुस्ताखी कर रहा हूँ

हज़ार साल पुराना है उनका गुस्सा
हज़ार साल पुरानी है उनकी नफ़रत
मैं तो सिर्फ़
उनके बिखरे हुए शब्दों को
लय और तुक के साथ लौटा रहा हूँ
मगर तुम्हें डर है कि
आग भड़का रहा हूँ – गोरख पाण्डे

जबकि तुम उनके गुस्से और उनके नफ़रत को
उनसे छीन कर उनकी गोलियाँ बना
दाग देते हो उन्हीं पर
फिर उनके खून और पसीने में लथपथ
उनके जिस्मों को चाटते हो
ईनाम की तरह

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