Beyond Capital

Polemics, Critique and Analysis

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“If you can’t change the world, change yourself.”

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“While Butler, needy wretch, was yet alive,
No generous patron would a dinner give;
See him, when starved to death, and turned to dust,
Presented with a monumental bust.
The poet’s fate is here in emblem shown,
He asked for bread, and he received a stone.”

Ultimate!!! Marxism is really going big and funny – academic and publishing monopolies, and now this!!! We danced every time a mainstream publication or newspaper or liberals called Marx’s this or that theory relevant. In fact, this has been the job of Marxist academia and publishing businesses, of convincing the mainstream of the prescriptive, descriptive and analytical relevance of Dr Marx. In the name of rigour, the great sanitised figure of Marx the theoretician is built, who cannot be charged of Leninism (well, Leninology too is there to do similar with Lenin) and of the “crimes” of the Georgian and other Orientals. The Melancholic figure of Prof Marx, instead of Bacchanalian inclinations of Herr Marx. Marx’s father tried hard to achieve this by forcing him to transfer from Bonn to Berlin, the “workhouse”, but he eventually failed and died. But now it is different, it does not matter if his spirit rebels, the high priests of academic and publishing Marxisms can easily exorcise “the spectre of Marx”.

If this was not sufficient, there are already some new moles in the market who are prepared to take on capitalists with AltMarxist cryptocurrency, Marxcoin, our own money. Of course, “money cannot overthrow capitalism”, but with money we can win capitalism. Who cares about Marx’s attacks on “artful tinkering with money”? These have been sufficiently academicised, or reduced to policy and economic issues. The spirited science of Marxist polemics is gone. Who cares about Marx’s form and content dialectic?

Time to rewrite the Eleventh Thesis: “If you can’t change the world, change yourself.” Or perhaps in the context of 100 years of the October Revolution (and what we have been doing after 1989), we can further innovate, “We have been interpreting ourselves in various ways, the point is to change ourselves.”

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Written by Pratyush Chandra

December 12, 2017 at 1:51 am

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Notes on Materialism in Earliest Marx

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1. Marx’s “Reflections of a Young Man on the Choice of a Profession” that he wrote for school-leaving Examinations in August 1835 (when he was 17 years old) is quite revealing. We find some definite traces of his social materialism in this otherwise idealist text.

2. Nature and deity in these Reflections are forces of necessity. They determine the sphere of activity for animals, which animals cannot transcend. But for humans they provide “a general aim” towards which they must seek their own roads and means.

3. But this open-endedness of human activity is a source of both fulfilment and frustration. It is here experience, knowledge and conscious learning become crucial.

4. However, the “deity” or force of necessity does not leave human totally helpless – it “speaks softly but with certainty.” She must know how to recognise it, without self-deceiving.

5. This recognition of necessity can easily be lost in immediate and momentary inspirations, imaginations, emotions, phantoms acting on our impetuous instincts – thus the voice of the deity is drowned and we suffer.

6. In the choice of profession one needs to hear the true calling (the voice of the deity, the necessity). Once you give yourself to the demon of ambition, you lose sight of the “deity” and start relying on “chance and illusion”. You still remain an object of necessity, but obviously not as a master navigating through the narrow escapes provided by necessity to your destination. Instead you walk without a guide and without any knowledge of the pathways, hitting the walls of necessity. And the result is failure and “self-contempt”. Now not just our physical and intellectual constitution, but also already established social relations act as the given structure of necessity. It is here that even the Earliest Marx stands united with the core of early and late Marx’s materialism:

“our relations in society have to some extent already begun to be established before we are in a position to determine them.”

Written by Pratyush Chandra

December 8, 2017 at 4:28 am

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Introducing Marx’s “Wage Labour and Capital”

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This text in Hindi has been written to introduce the Oriya translation of Marx’s “Wage Labour and Capital”. It mainly emphasises on the political reading of the text and of Marx’s other “economic” writings.

परिचय: श्रम और पूंजी के बीच सम्बन्ध – अर्थशास्त्र और राजनीति
(Introduction: The Labour-Capital Relationship – Economics and Politics)

मार्क्स की एक बात जिसे सबसे गलत ढंग से समझा गया है वह है उनका आर्थिक मूलाधार का सिद्धांत – कि तमाम मानवीय गतिविधियों का मूलाधार आर्थिक है. विरोधियों ने इस बात को पकड़ कर यह साबित करने की कोशिश की कि मार्क्स पूरे मानवीय सामाजिकता को आर्थिक संरचना का ऊपरी ढांचा मात्र मानते हैं. अतएव उनकी नज़र में मानवीय सोच और व्यवहार पूरी तरह से अर्थ-तंत्र द्वारा निर्धारित एवं परिभाषित हैं, उनकी अपनी कोई आन्तरिकता नहीं है, उनके विकास का अपना नियम नहीं है, उनकी स्वतःस्फूर्तता और अभिव्यक्ति पूर्णतः आर्थिक सन्दर्भ का नतीजा है.

दूसरी तरफ, मार्क्सवादियों ने मार्क्स के बचाव में कई तरह की व्याख्याएं दीं जिनका निचोड़ बस इतना है कि मार्क्स की समझ में आर्थिक मूलाधार होते हुए भी वह सब कुछ नहीं है. ग्रंथों पर ग्रन्थ लिखे गए मार्क्स के समझ की समृद्धि दिखाने के लिए – यह दर्शाने के लिए कि उनकी संस्कृति, साहित्य, राजनीति आदि की समझ कितनी समृद्ध थी. अवश्य ही इन सब से मार्क्सवाद और पैना हुआ तथा उसका अथाह विकास जो हम आज देख रहे हैं संभव हो सका.

परन्तु एक ज़रूरी चिंता जो इन तमाम बौद्धिकताओं के नीचे कहीं दब सी गयी – वह थी मार्क्स के चिंतन प्रक्रिया में आखिरकार आर्थिक मूलाधार का अर्थ क्या था. अधिकांश मार्क्सवादी पंडितों ने भी आर्थिक को अर्थ-शास्त्रीय चश्मे से ही देखा, जबकि मार्क्स का पूरा “सैद्धांतिक व्यवहार” अर्थ-शास्त्र की आलोचना पर टिका था. उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि कैसे अर्थ-शास्त्रीय नियोजन मानवीय समाज की अस्तित्वपरकता को, उन मौलिक संघर्षों को, जिनके आधार पर पूरी सामाजिक आर्थिक संरचनाएं बनती और बिगड़ती हैं, ढांपता है. मार्क्स ने अपनी आलोचनाओं द्वारा उन शास्त्रीय और व्यवस्थापरक पर्दों को हटाकर पूंजीवादी सामाजिक-आर्थिक संरचना में गतिमान मानवीय श्रम – उसकी रचनात्मकता – पर आधिपत्य के लिए होते दैनिक संघर्षों के धरातल और नियमों को समझने की कोशिश की. उन्होंने पूंजीवादी व्यवस्था के तहत, उत्पादन के साधनों के ऊपर निजी और अपवर्जनात्मक अधिकारों से पैदा हुए मानवीय श्रम और उसकी रचनात्मकता के बीच अलगाव को समझा. उन्होंने दिखाया कि पूंजी वह सामाजिक सम्बन्ध है जिसके तहत जीवित श्रम को संचित श्रम की मूल्य रक्षा और वृद्धि के साधन मात्र में तब्दील कर दिया जाता है. पूरी सामाजिक संरचना – आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था – इसी सम्बन्ध को कायम रखने में मदद करती है.

मार्क्स की इस समझदारी ने अवश्य ही कई परिष्कृत सिद्धांतों को जन्म दिया, पर ये सिद्धांत कोई सैद्धांतिक अटखेलियों के लिए नहीं थे, बल्कि वे मार्क्स के राजनैतिक पहल का नतीजा थे. उनके लिए यथार्थ हमेशा सम्बन्धात्मक और गतिमान होता है, जिसमे अंतर्विरोधों की नियामक भूमिका होती है. यही वजह है पूंजी और श्रम के बीच के अंतर्विरोधात्मक परन्तु गतिशील सम्बन्ध की विशेषताओं के अध्ययन को वह आवश्यक समझते थे. जहां अर्थशास्त्री पूंजी-श्रम के सम्बन्ध को महज तकनीकी और प्रबंधकीय समझते हैं, वहां मार्क्स इस सम्बन्ध में अंतर्विरोधात्मकता को दिखाकर उसके राजनैतिक स्वरूप को उजागर करते हैं.

उन्नीसवीं सदी पूंजीवादी-औद्योगिक विकास के वैश्विक फैलाव और उसके बढ़ते अंतर्विरोधों का दौर था. कई तरह के सामाजिक विद्रोह पैदा हो रहे थे – अधिकांश तबकों का सर्वहाराकरण हो रहा था और मजदूर वर्ग सुसंगत शक्ति के रूप में ऐतिहासिक पटल पर पहली बार उभर रहा था. मार्क्स का दार्शनिक और राजनैतिक विकास इसी दौर में, यूरोप के क्रान्तिकारी मजदूरों के सरोकारों के बीच हुआ. इसी ने उनके वैचारिक चिंताओं को जन्म दिया.

“मजदूरी श्रम और पूंजी” मार्क्स के इसी राजनैतिक और सैद्धांतिक परिश्रम का आरंभिक नतीजा थी. उन्होंने पुस्तिका के आरम्भ में ही यह साफ़ कर दिया है कि किसी भी आन्दोलन का, “चाहे उसका लक्ष्य वर्ग-संघर्ष से कितना ही दूर क्यों न मालूम होता हो,” प्रगतिशील निष्कर्ष इस पर निर्धारित है कि उसमे मजदूर वर्ग की हिस्सेदारी किस प्रकार की है – वह कितनी निर्णायक है. मार्क्स की आर्थिक विवेचना इसी वर्ग-संघर्ष के मौलिक धरातल को समझने का, वर्गों के आपसी संरचनात्मक एवं विरोधात्मक सम्बंधों में परिवर्तनकारी संभावनाएं देखने का प्रयास है. यह विवेचना अर्थ-तंत्र की निष्पक्ष जाँच नहीं है, बल्कि ऐसी निष्पक्षता का दावा करते सामाजिक और आर्थिक “वैज्ञानिकों” का माखौल उड़ाती है. मार्क्स दिखाते हैं किस प्रकार आर्थिक तत्वों के तकनीकी पक्ष दिखाने के नाम पर इन पंडितों ने ज्यादा से ज्यादा सतही प्रक्रियाओं को ही दिखाया है – उन्होंने उनमे छिपे मानव सम्बंधों और संघर्षों को पूरी तरह से नज़रंदाज़ ही नहीं किया, वरन तकनीकी शब्दावलियों और विश्लेषणों के परत पर परत चढ़ाकर उनकी सच्चाई को ढांप दिया.

मार्क्स अपने विश्लेषणों द्वारा इन्ही संबंधों और संघर्षों की जांच करते हैं और उनकी मौलिकता को उजागर करते हैं. वह दिखाते हैं किस प्रकार से इन संबंधों और संघर्षों के तहत एक तरफ पूंजी मानवीय श्रम का अधिकाधिक जीन्सीकरण करने को उतारू (या कहें मजबूर) है, क्योंकि इस प्रक्रिया के फैलाव और गहनता में ही उसका जीवन है. इस प्रक्रिया के तहत श्रमिक श्रम-शक्ति देने वाला महज एक मशीन बन जाता है – श्रमिक के श्रम और उसकी रचनात्मकता को ही निचोड़ कर पूंजी को सतत नया जीवन मिलता है. परन्तु मार्क्स के लिए यह प्रक्रिया निश्चित नहीं है – वह संघर्ष है क्योंकि श्रमिक अपने मशीनीकरण, अर्थात श्रम-शक्ति से श्रम खींचने की प्रक्रिया, का लगातार चेतन-अवचेतन तौर पर विरोध करता है.

यह संघर्ष केवल उत्पादन प्रक्रिया में ही नहीं होता, बल्कि पूरे सामाजिक स्तर पर होता है. आखिरकार श्रमिक को श्रम बाजार में भी तो लाना होगा – जिसके लिए उसे मजबूर करना होगा. श्रमजीवियों का मजदूरीकरण अथवा सर्वहाराकरण ज़रूरी है. उसको भूमि और अन्य साधनों के बंधनों से मुक्त करना ज़रूरी है, तभी वह अपनी श्रम-शक्ति का व्यापार करने को मुक्त होगा. श्रम की यही “दोहरी मुक्ति” पूंजीवादी समाज व्यवस्था की नीव है. यही मुक्ति मजदूर-दासता की शुरुआत है. इस व्यवस्था के कायम रहने के लिए इस दोहरी मुक्ति को बनाए रखना आवश्यक है. श्रमिक के पास इतना हो कि वह अगले दिन काम के लिए तैयार हो पाए, और बस इतना ही हो कि वो काम के लिए तैयार रहने के लिए मजबूर हो. अतः उत्पादन प्रक्रिया की तैयारी में ही संघर्ष के तत्व मौजूद हैं, जो अपने दूसरे तेवर के साथ उस प्रक्रिया के अंतर्गत दिखाई देते है.

मुक्ति ही दासता है, सहमति ही जोर-जबरदस्ती है – पूंजीवाद की विशिष्टता उसके अंतर-द्वंद्व हैं, उसका दोहरापन है – पर यह द्वंद्व अथवा दोहरापन असल में पूंजी और श्रम के बीच हो रहे संघर्ष की सामरिक भाषा है. पूंजी के लिए मुक्ति, श्रम के लिए दासता है. मार्क्स इसी संघर्ष को पूंजीवादी समाज का आर्थिक मूलाधार मानते हैं – दूसरे शब्द में कहें, यही उनका आर्थिक मूलाधार का ‘राजनैतिक’ सिद्धांत है.

“मजदूरी-श्रम और पूंजी” एक ऐसी अनूठी पुस्तिका है जो कि मार्क्स की एक अधूरी कृति होते हुए भी पूंजीवादी विकास के भिन्न अवस्थाओं में नीहित श्रम-पूंजी संघर्ष की केन्द्रीयता को पहचानने में मदद करती है. भारत में अब कोई ऐसा कोना नहीं बचा जो पूंजीवाद से अछूता हो, और हम एहसास कर सकते हैं तमाम व्यक्तिगत और सामाजिक संघर्षों में पूंजीवादी अंतर्विरोधों को. मगर उन्हें पहचानने और इन संघर्षों के बीच सम्बन्ध स्थापित करने के लिए मार्क्स द्वारा विकसित सैद्धांतिक हथियारों की आज भी ज़रुरत है. “मजदूरी श्रम और पूंजी” भी कुछ ऐसे महत्वपूर्ण हथियार प्रदान करती है.

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नोट: हिंदी में इस पुस्तिका का अनुवाद “उजरती श्रम और पूंजी” के नाम से किया गया है.

Written by Pratyush Chandra

August 6, 2013 at 12:35 am

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