The Banking Crisis


Your sweat measured
Barrelled at the banks of the market
To be thrown in the deluge
In the hope of a golden axe golden tears

But the giving spirit
Suffers Midas’ gluttony
Stands immobile
Amidst waves
Lashing the isle of liberty.

बीमारी सच बोलने की


वे हैं तो सब कुछ मुमकिन है
क्योंकि इन सब के बाद भी वे हैं
और तुम सोचते हो उनको नंगा
और अपने आपको बालक

जो कि तुम बिलकुल हो अबोध
अपने ख्यालों की दुनिया की
सच्चाई को ही सच्चाई मानते
और पनचक्की पर वार करते हो

ये बीमारी सच बोलने की
बेवकूफी है कि तुम्हें कौन सुनेगा
जो सुनते हैं वे जानते हैं
वे तुम्हीं हो अपने आपको सुनते

मगर यह सच उनका नहीं है
जिन्हें तुम सुनाना चाहते हो
बताना चाहते हो सच्चा सच
आंकड़ों में ढूंढ़ते हो जिन्हें

वे अपना सच अपनी रोज़
की थकान में गुज़ार देते हैं
तुम्हारे आँकड़े उस कशमकश
के नतीजों को मापते हैं

मशीनों से पसीनों की जूझ
व उनके गंध तक नहीं पहुँचते
जहाँ खून और तेल के मिलाप से
अजीब सा नशा फैल जाता है

होली ही होली है


गिरा है खून उस तरफ
इस तरफ रंगीनी है
घरों में मातम है
दिलों में संगीनी है
वहाँ की खून की होली
इन्हें रंगोली है

समय का पहिया है
आज ये है
तो कल वो है
आज भीड़ इनकी
तो कल उनकी
टोली है

हर रोज़ कहीं दिवाली है
जो नहीं तो फिर
होली है

२७/०९/१९

परिवर्तन: यानिस रित्सोस


यानिस रित्सोस (1909-1990) यूनान के महान क्रांतिकारी कवि थे।

जिसको तुम शांतिप्रियता या अनुशासन, दयालुता या उदासीनता कहते हो,
जिसको तुम दाँत दबाए बंद मुँह बताते हो,
जो मुँह की प्यारी चुप्पी दिखती है, दबे दाँतों को छुपाती,
वह उपयोगी हथौड़े के नीचे धातु की केवल धैर्यपूर्ण सहनशीलता है,
भयानक हथौड़े के नीचे – तुम्हारी चेतना है
कि तुम निराकारता से आकार की ओर बढ़ रहे हो।

आज़ादी


तेज हवाएँ पत्ते झाड़ते हैं बंधनों को
जो बाँधते हैं उन्हें तने हुए वृक्षों से
काठो-र सुरक्षा तोड़ कर क्षणिक
उड़ान भरने की असुरक्षित आज़ादी

यह क्या है उत्सव है या शहादत है
या कोई अचानक उठती बगावत है
विप्लव का आगाज़ है नवीनता का
प्रसव बेशक यह व्यवस्था की बर्बादी

मिड्ल क्लास ब्लूज़ (मध्यम वर्ग का तराना)


जर्मन कवि हांस मागनुस एंजेंसबेर्गर की कविता “Middle Class Blues” का अनुवाद

हम शिकायत नहीं कर सकते।
हम काम से नहीं निकाले गए हैं।
हम तृप्त हैं।
हम खाते हैं।

घास उगती है,
सामाजिक उत्पाद,
नाख़ून,
अतीत।

सडकें खाली हैं।
सौदे हो चुके हैं।
सायरन शांत हैं।
ये सब अतीत हो जाएंगे।

मृतकों ने अपना वसीयतनामा बना लिया।
बारिश मुसलाधार हो चली।
युद्ध की घोषणा अभी नहीं हुई।
इसकी कोई जल्दी नहीं है।

हम घास खाते हैं।
हम सामाजिक उत्पाद खाते हैं।
हम नाख़ून खाते हैं।
हम अतीत खाते हैं।

हमें छुपाने को कुछ भी नहीं है।
हमें कोई कमी नहीं है ।
हमें कहने को कुछ नहीं है।
हमारे पास है।

घड़ी तैयार है।
बिल चुकता हो चुके हैं।
बर्तन धुल चुके हैं ।
अंतिम बस रवाना हो रही है।

वो खाली है।

हम शिकायत नहीं कर सकते।

हमें किस चीज़ का इंतजार है?

कविताओं में कंकड़


कविताओं में वे भी हैं जो कहे से इतर हैं
यानी अनकही चीजें जिन्हें आप कहते नहीं
मगर उनके नहीं कहने में ही वे आ जाती हैं

हम जो कहते हैं वे तो बस बिंदु हैं
जिन्हें ध्यान रखकर दिशाओं का आकलन करते हैं

या फिर रेखाएं हैं जिनसे हम
सच्चाई की ज़मीन पाटते हैं
उसे कहने लायक बनाते हैं

या फिर ढांचे हैं जिनमें हम सच्चाई को बांधते हैं
और बताते हैं कि यही सच्चाई है और कुछ भी नहीं

मगर नहीं वे मामूली कंकड़ हैं
जिन्हें हम फेंक दें और इंतजार करें
आम के गिरने का किसी पक्षी के उड़ने का
ठहरे हुए पानी में सिहरन का
बहते हुए पानी में बहने का
पत्तों के झुरमुट से चाँद के निकलने का

सच्चाई नहीं
सच्चाई के बदलने का

छायाओं की दुनिया


जर्मन कवि हंस मागनुस एंजेंसबेर्गर की कविता “Schattenreich” का अनुवाद

यहाँ अब भी मुझे एक जगह दिखती है,
एक खाली जगह,
यहाँ छाया में ।

यह छाया,
बिकाऊ नहीं है ।

समुन्दर भी
शायद छाया बनाता है,
समय भी ।

छायाओं की लड़ाइयाँ
खेल हैं:
कोई छाया
किसी दूसरे की रोशनी में नहीं रहती।

जो छाया में जीते हैं,
उन्हें मारना मुश्किल है।

कुछ क्षण के लिए
मैं अपनी छाया से बाहर निकलता हूँ,
कुछ क्षण के लिए।

जो रोशनी देखना चाहते हैं
उसको उसके रूप में
उन्हें आश्रय लेना होगा
छाया का।

छाया
सूर्य से भी तेज़:
आज़ादी की ठंडी छाया।

छाया में पूरी तरह
मेरी छाया गायब हो जाती है।

१०

छाया में
अभी भी जगह है।

हमें आप से सुनना है


कल Indian Express में एक वरिष्ठ पत्रकार का लेख पढ़ने के बाद

हमें आप से सुनना है
आप तो ऐसे नहीं
हम जानते हैं
इन्हें भी बता दीजिये
कि ये शांत हो जाएँ

आप इनका भला ही चाहते हैं
आपके बच्चे जिन्होंने बोलना सीखा है अभी
गालियाँ देते हैं इन्हें
अभी तो वे नादान हैं
हम जानते हैं
इन्हें भी बता दीजिये
कि ये संयम न खोएँ

ये जो बात बात पर उखड़ रहें हैं
आपके बच्चे
दिल से अच्छे हैं
आपके जैसे ही हैं
सौम्यता आएगी उनमें
शांत हो जायेंगे
ये तो हम जानते हैं
इन्हें भी बता दीजिये
कि ये भ्रांत न हों

इंतज़ार करें नए मालिकों का
उनके बड़े होने का
फिर आपकी ही तरह
न्याय देंगे
देश दुनिया देख लेंगे
संभाल लेंगे सभी कुछ
इन्हें भी
हम से ज्यादा यह किसे पता है
अब आप इन्हें भी बता ही दीजिये
कि ये शोर न करें

०७/१०/२०१९

एहतियात: यानिस रित्सोस


यानिस रित्सोस (1909-1990) यूनान के महान क्रांतिकारी कवि थे।

शायद तुम्हें अब भी अपनी आवाज़ को काबू में रखने की ज़रूरत है; –
कल, परसों, किसी समय,
जब भी झंडों के नीचे और लोग चिल्ला रहे होंगे,
तुम्हें भी चिल्लाना होगा,
मगर ध्यान रहे अपने टोप से अपनी आँखों को ढँक लेना,
अच्छी तरह,
ताकि उन्हें न दिखे कि तुम्हारी आँखें कहाँ देखती हैं,
तब भी जबकि तुम्हें मालूम है कि चिल्लाने वाले
कहीं देखते नहीं।

अंग्रेजी से अनुदित