ग्राफ


ये ग्राफ अब नीचे की तरफ मुँह बाये सरपट दौड़ रहा है
क्या क्या संकुचित होगा नष्ट होगा इतिहास से हम जानते हैं

मगर इतिहास ये नहीं तय करता कि हम क्या करेंगे
ये हमें ही बताना होगा कि इतिहास से हमने क्या सीखा

क्या हम वो गलतियाँ दोहराएँगे और इतिहास एक बार
फिर सेअपने रास्ते चलेगा इसी मोड़ पर पहुँचने के लिए

रेखाओं का खेल


लक्ष्मण बारबार रेखाएँ खींचता है मगर सीता
लांघ देती है उन रेखाओं को नए के अनुराग में
राम का रोष नई चढ़ाइयाँ चढ़ता है सीता के लिए
और सीता को बारबार अग्निपरीक्षा देनी होती है
साबित करनी होती है अपनी पवित्रता कि आज भी
है व्रता वो राम के स्वामित्व की कदमों की दासी

क्या गुदगुदी होती है पृथ्वी को जब जमीन पर
रेखाएँ बनाते हैं ये लोग और मिटाते हैं कुछ और
हँसी तो ज़रूर आती होगी इस खेल को देख कर
आसमान भी कहता होगा ये कौन सा खेल खेलते हैं
सदियों से कितनी बार रेखाएं बदलीं और खून से
सनी मिट्टी क्या मज़ा इस खेल में आता है इनको

सत्ता के घोड़े – एक कविता


ज्ञान मानचित्र की रेखाओं को नहीं मानता
न वे उसको बांध सकते हैं
इसीलिए तो वे ज्ञान की बात नहीं करते
यान की बात करते हैं

तुम सत्ता के घोड़े हो
तुम पर लद के नई ऊँचाइयाँ चढ़ेगी वो
मिलने जाएगी चंद्रमा की बुढ़िया से
जीतने जाएगी राहु को
कहीं ग्रहण न लगा दे उसके भविष्य को
आखिर भगवान को भी माननी पड़ी उसकी शक्ति
अलग करना पड़ा उसके सिर को उसके धड़ से
मस्तिष्क को शारीरिक बल से
कहीं उखाड़ न दे देवताओं का वैभव जड़ से

भगवान को भी मानना पड़ा अमरत्व उसका
जिसने छल लिया था छलिया को
उसको जिसने छल से परिश्रमी राक्षसों के
परिश्रम को पिला दिया देवों को
जो हमेशा हारते रहे मैदानों में
भागते रहे सत्ता के वीरानों में

तभी तो डरते हैं
राहु को केतु से मिलने नहीं देते
सत्ता इसी अलगाव को ही कहते हैं

सत्ता ने तुम्हें अदना बना दिया है
तुम्हारी उड़ान को लगाम पहना दिया है
अब तुम जहाँ भी जाओगे सत्ता तुम पर लदी होगी
मिमियाते तुम खड़े होगे
सारी गलतियाँ तुम्हारे सिर होगी
और जीत उसकी
उसकी थपथपाहट तुम्हारा पारिश्रमिक
उसका पुचकारना तुम्हारा ईनाम

देश देख रहा था उस दिन
और तुम सुन रहे थे उसके मन की बात
स्कूली बच्चों की तरह
तुम्हें सिखा रही थी सत्ता
बता रही थी मतलब तुम्हें तुम्हारा
और उसकी चढ़ाइयों का

और तुम इतराते
सत्ता को अपने करीब पाते

हम इतिहास के निरंतर निषेध


जनाजर का ज्वर अचानक
ज्वार बनकर फूटता
हर सदी इतिहास की
दीवार है जो टूटती

मैं गिरा हूँ मत उठाओ
मैं खुद उठूँगा और चला जाऊँगा
अपनी दयाभरी आँखों से मत देखो
वे रोकती हैं मुझे मैं होने से
मुझे अपनी तरह उठने और चलने से
ऐसा क्या है क्या तुम कभी गिरे नहीं
गिर कर उठे नहीं उठ कर चले नहीं
तमाशा मत बनाओ मेरे गिरने का
कि ऐसा ही मैं रह जाऊँ
सभी मुझे मेरे मैं से छीनते
हमेशा के लिए मैं दया का पात्र बन जाऊँ

मुझे अपनी लड़ाई खुद लड़ने दो
और तुम क्यों दोगे मैं लड़ूंगा
और लड़ता भी हूँ
तुम अपनी लड़ाई लड़ो
तभी यह हमारी लड़ाई होगी
तब नहीं जब तुम हमारे लिए लड़ते
शहीदों के लिस्ट में तुम्हारा नाम
दूसरों के लिए मर गए तुम कितने महान
और हम हमारी औकात ही क्या
अपनी रोज़ की लड़ाई के नीचे दब गए
उठ न पाए हम बेचारे
रह गए सड़क के किनारे

और तुम पथप्रदर्शक अधिनायक
हम जन तुम जननायक
हम भेड़ तुम गड़ेरिया
हम गायें तुम कन्हैया
लो हुए हम नाव अब तुम खेवैया
खेते खेते बन गए तुम जनक
तो हम हुए जनित तुम्हारे हल की नोंक से
सीता तुम राम
हम सुदामा तुम घनश्याम
हम द्रौपदी
हमारी लाज हो तुम
तुम आसमान में सूर्य
हम तुम्हारी असंख्य किरणें
हम माया हैं तुम्हारी छाया हैं
तुम्हारी विविधताओं के प्रदर्शन हेतु
परिपेक्ष हैं
स्थूल हैं
तुम्हारे चरणों की धूल हैं
फूल हैं

इतिहास में तुम्हारा ही नाम रहेगा
हम अगणित अदृश्य
चाहे कह दो इतिहास हमारा
जिसके नायक तुम्हीं हो
तुम्हीं रहोगे

परंतु तुम जड़ हममें जड़ित
सारी उपमाएँ हमसे फलित
इतिहास गाते रहो डुगडुगी बजाते रहो
इतिहास की गौरव गाथा तुम्हारे लिए है
इंसान का गौरव इसी में है
कि हम सारे गर्व को मिटाते रहे हैं
इतिहास हमें नही हमें आज चाहिए
हमें सुराज नहीं
हमें सु-अराज, स्वराज चाहिए
न राज्य न आसीन राजा
न दंड न कोई दांडिक
हम आदि अंकुर सतयुग से
इतिहास के निरंतर निषेध हैं

मन की बात


साहब बता रहे थे
अपने मन की बात
सब कुछ अच्छा ही बताया उन्होंने
कैसे वो पशुओं का दर्द समझते हैं
उनके लिए रोज़ अपने घर के आगे
गाछ के नीचे खाने पीने की सुविधा करते हैं

वो हरा भरा गाछ है
दिन में सैकड़ों पक्षियों की चहलकदमी रहती है
उनके अनूठे सुरसंगम का आनन्द लेने
कई जानवर भी आते हैं
छाँव का मज़ा लेने
कुत्ते बिल्लियों चूहे बिच्छु सांप छुछुंदर
और गिलहरियों के अलावे
कहाँ से शहर के मध्य रास्ता तय करती
आ रही हैं आजकल गायें
शायद साहब को आशीर्वाद देने के लिए

साहब ने बताया कैसे इन कार्यों से
ह्रदय ही नहीं होता स्वच्छ
धन भी गोरा नहीं तो सांवला हो ही जाता है
काला नहीं रहता
और व्यवहार कहता है
हमें बरबादियों से बचना है
क्या पता क्या कब किस काम आ जाए
चाहे वो पण्य हो या परंपरा

साहब हमेशा अच्छी बात ही बताते हैं
परीक्षा में पास होना भी सिखाते हैं
बताते हैं कि फेल करने से घबराना नहीं चाहिए
रास्ता निकल ही जायेगा
कुछ तो हो ही जायेगा
हमारी परंपरा ही है जुगाड़ की
हम कुछ भी बरबाद नहीं होने देते
ब्रह्माण्ड में सभी चीज़ें उपयोगी हैं
तभी तो गणेश हमारे सहयोगी हैं
कार्य शुरू करने का मतलब
हम श्री गणेश करते हैं
उन्हीं से शुभलाभ है
सब कुछ ठीक हो ही जायेगा
कुछ तो हो ही जायेगा

आज पूरे देश में गूँज है
इसी दर्शन की
इसी भावना ने साहब को बनाया है
इसी भावना ने साहब को चढ़ाया है
चोटी पर
अगर ये सच नहीं
तो कुछ और ही होगा
कुछ तो होगा
अगर मार्स नहीं तो चन्द्रमा होगी
कुछ तो होकर रहेगा
कुछ तो होते रहेगा

सत्ता की रात – कुछ कविताएँ


सत्ता की रात में

हे उदारपंथियों
पहचानो
ये तुम्हीं हो
तुम्हारा ही विकृत रूप है
नशे में धुत्त
तुमने कर दिखाया
जो तुम्हें पहले कर दिखाना था
सही दिमाग़ से
बिन पगलाये
तुम इसको कर सकते थे
मगर तुम्हें हिम्मत कहाँ थी
समय ही कहाँ था
मठाधीशों में तिकड़म भिड़ाने से
तो लो सत्ता की रात में
मदहोश हो
मठाधीशों में मठाधीशी जमाने के लिए
एक नया चिलम चढ़ा कर
किया है वही जो तुम्हें करना था
मगर विकृत रूप में

आत्ममुग्ध

1
सत्ता के पौध हैं
सत्ता के गलियारे में ही खिलेंगे
माली बदल जाए पर वे न बदलेंगे
वे यहीं उगते हैं
सत्ता है तो वे हैं
पर उन्हें मुगालता है कि वे हैं तो सत्ता है

2
किसी को खुशफहमी पालने से
कौन रोक सकता है भला
प्रजा सोचती है उसका तन्त्र है
वे नहीं जानती कि वह मात्र यंत्र है

3
चाँद कहता भागा अंधेरा है
रात कहती तू मेरा है
सूर्य कहता रोशनी मेरी
अंतरिक्ष बस मुसका रहा

4
आत्ममुग्ध हैं सभी
आत्ममुक्त कुछ नहीं

दो भाई

हाथ में हथियार है
कौम की ललकार है
दिल मे धिक्कार है
साँप की फुफकार है

हाथ में हाथ है
साथियों का साथ है
सत्ता से प्यार है
उम्मीद शानदार है

तू

क्या हुआ
इतना कुछ हो गया लेकिन तू न हिला
समय को बदलते तूने देखा है
जीवनियों को मूर्ति होते पिघलते देखा है
क्या हुआ तुझको सब पता है
फिर भी तेरी धमनियों में खून ठंडा क्यों रहा

सरकार है सरकार के आगे झुको: पाँच कविताएँ


महासभा

आज सूरज की तीव्रता,
आसमान के नीलेपन को ढांपते
बेमौसम कालिख कैसे पुत गई?
इतने गिद्ध और चील कहाँ से आ गए?
झोपड़ों, बहुमंजिलों और मैदानों पर मंडराते
मानो भक्षियों की विशाल महासभा हो रही है।
प्रतिनिधित्व के काँव काँव में
सड़कों और घरों की आवाजें दब गई हैं
जैसे मेजों पर रखे फाइलों के नीचे
जिंदा आदमी की ज़िन्दगी…

संसद में कविता

आज जब संसद में कविताओं की बारिश हो रही है
शब्द बेधड़क टपकते हैं
जैसे सिर पर ओले

हमें यह मान लेना चाहिये कि कविताओं के दिन लद गए
ये कविताएं नहीं नश्तर हैं
जो सीधे हमारी ओर बढ़ रहे
जहां आदमी और आदमियत
थक कर सड़ रहे

मगर इसके हर वार का जवाब हमारे पास है
हम उनके नश्तर का जवाब खाली कनस्तर से देंगे
जिनके शोर के आगे अच्छे अच्छे गामाओं को
हमने पिद्दी बनते देखा है
हमारी भूख के आगे कितने शेर को
गीदड़ बनते देखा है
भागते देखा है
अपने दुर्ग की ओर
फिर अन्दर से मुर्ग के शोर
अपना किला जगाने के लिए
बस्तियों में आग लगाने के लिए
भाइयों को लड़ाने के लिए
फिर पंचों में सरपंच बनने के लिए
कविताओं की बारिश हो रही है

नया आंदोलन

सुना है नया आंदोलन छिड़ेगा
स्वच्छता में तरलता लानी है
देवगण गाड़ियों से उतरेंगे
पेप्सी बिसलेरी रम स्कॉच के बोतलों में
अब बारिश का पानी है

बूंद बूंद बटोरेंगे
पानी राष्ट्र निर्माण के लिये बचाना है
बिसलेरी बहुत महंगा है
हम सस्ता पानी बेचेंगे
हम वैदिक पानी बेचेंगे
क्लोरीन, आर ओ की ज़रूरत नहीं
गोमूत्र काफी है
जैसे रक्त के लिए साफ़ी है

गोमूत्र हरेक के पास नहीं है तो क्या
एक बूंद उसका हर मूत्र को गोमूत्र बना देता है
तुम नहीं जानते एक मछली पूरे तालाब को गंदा करती है?
गजब है उसकी शक्ति
माता की शक्ति कैसी होगी
जो सारी गंदगी को मंदा करती है
गजब है उसकी शक्ति
गजब है अपनी भक्ति

वैंगार्ड

कौन कहता है कि तुम गलत हो मैं नहीं मानता
जब तक तुम दिखते थे सड़कों पर जागते और जगाते
हम सबने देखा किया तुम पर पूरा विश्वास
मसीह के समान तुम्हारी तेज़ी जो आज भी कम नहीं है
जब तुम मशीन में लद चुके हो इंतजार है हमें
कि यकायक थम जायेगा तुम्हारे दम से इसका चलना
तुममें हमने अपना अग्रज देखा तुम्हारा धैर्य
तुम्हारी चतुराई जो आज भी कम नहीं हैं
जब तुम बह गए या पिस गए मशीन ने ढाल लिया
अपने रूप में तुम्हें तुम गलत नहीं हो

सरकार है

बात बात पर निकल आते हैं खंजर
सचमुच किसी ज़ोरदार सरकार की ज़रूरत पड़ी है
जिसके हाथों में चुम्बक है
सारे खंजरों को हरेक हाथ से छीन ले
फिर करे मुद्रित जिसे चाहता करना
बाकियों को पड़ेगा मरना
सरकार है सरकार के आगे झुको
फिर करो मारने मरने का पर्व
अगर आखेट में भी मृत्यु हो
गम न कर सरकार है
मारने वाला जवां
मरने वाला आततायी या कोई हुतात्माई

प्रकाशन: जनज्वार