क्यूबा: खाई में या खटाई में?


मोर्चा, अक्टूबर 2021

1. क्यूबा के कवि सिन्तियो वितियेर ने दशकों पहले क्यूबा क्रांति के लक्ष्य को चिह्नित किया था — “nuestro desafío es construir un parlamento en una trinchera” (खाई में संसद बनाना हमारी चुनौती है)। खाई में संसद – इसके दो अर्थ होते हैं।  एक है कि संसद खाई में फंस गई, और दूसरा है कि खाई में धँसे लोगों ने अपनी संसद बनाई। क्यूबा में जब भी कुछ ऐसा होता है जो क्यूबा की राजसत्ता को चुनौती देता नजर आता है, तो क्यूबा के बाहर दो तरह की प्रतिक्रिया जन्म लेती है। क्यूबाई शासन के हितैषी इसमें बाहरी शक्तियों के षड्यन्त्र को देखते हैं और दूसरी ओर क्यूबाई  क्रांति के विरोधी इसमें अवसर देखते हैं।  दोनों ही खाई को खटाई ही समझते हैं, और मानते हैं कि क्यूबा को बाहरी साम्राज्यवादी शक्तियां खाई में ढकेल रही हैं । बस इतना ही अंतर है कि एक दुखी होता है तो दूसरा खुश होता है। यही माहौल जुलाई के महीने में देखने को मिला, जब महामारी के दौर में आज क्यूबा क्या विश्व के हर कोने मे जनता सामाजिक और आर्थिक दोनों ही दिक्कतों को झेल रही है। 

2. पिछले डेढ़ साल से कोरोना महामारी ने विश्व के सभी देशों में सामान्य जीवन अस्तव्यस्त कर रखा है। तमाम देशों की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं तो इस महामारी के समक्ष विफल हुई ही हैं, परंतु उससे भी अधिक सामान्य आर्थिक गतिविधियों और संबंधों पर इस महामारी का दूरगामी, गहरा और घातक असर पड़ा है। मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति और सेवाओं का  क्रियान्वयन व्यापक स्तर पर अवरुद्ध हुआ है। जिन देशों में कल्याणकारी जनस्वास्थ्य व्यवस्थाएं मौजूद थीं वे अपने आप को जल्दी संभाल पाईं, जैसे कि चीन जहां से इस बीमारी की शुरुआत हुई, और यूरोप के कुछ देश जहां स्वास्थ्य के क्षेत्र में बाजार की घुसपैठ अपेक्षाकृत कम  है। परंतु जिन देशों में स्वास्थ्य सेवाएं मूलतः बाजार आधारित रही हैं, वहाँ महामारी की विकटता अत्यंत आक्रामक दिखी — उदाहरणार्थ, संयुक्त राज्य अमरीका (सं.रा.अ.), भारत इत्यादि। तब भी जहां तक सामान्य जीवन पर दबाव बढ़ने की बात है, कमोबेश सारे देशों में इसके नतीजतन अलग-अलग स्तर के असंतोष का जन्म हुआ है। संयुक्त राज्य अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प की हार और बाइडन की जीत में महामारी का कुप्रबंधन भी एक प्रमुख कारण था। 

3. पिछले साल जब सं.रा.अ. में ट्रम्प प्रशासन कोरोना के संकट से आंख मिचौनी खेल रहा था, और यूरोप और बाकी दुनिया में भी तबाही मची हुई थी, उसी दौरान बगल में  छोटा सा पड़ोसी देश क्यूबा अपनी प्रभावशाली और व्यवस्थित जनस्वास्थ्य सेवाओं के जरिए महामारी के फैलाव को तकरीबन पूरी तरह से काबू मे रखे हुए था। यह हमें याद रखना चाहिए कि मेडिकल अन्तर्राष्ट्रीयवाद की बात क्यूबा के संदर्भ में ही ज्यादातर की जाती है, और स्वास्थ्य सेवाओं का निर्यात क्यूबा के अर्थतन्त्र का एक अहम हिस्सा है। अपनी स्वास्थ्य सेवाओं के  जनोन्मुख चरित्र और उनकी मजबूती के कारण 2020 में, जब बाकी विश्व महामारी के प्रकोप से त्रस्त था, क्यूबा में कोरोना से संक्रमितों की और मृतकों की संख्याएँ अल्पतम थीं।  परंतु 2021 आते ही क्यूबा में महामारी का असर दिखने लगता है। इस साल जून से संक्रमितों की संख्या में घातीय वृद्धि हुई है। ऐसी स्थिति में प्रशासकीय व्यवस्था से अलगाव और असंतोष स्वाभाविक है। यही तथ्य  जुलाई महीने में क्यूबा में हुए विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख तात्कालिक संदर्भ था। 

4. क्यूबा के हरेक संकट में अमरीका और उसके द्वारा संरक्षित पूंजीवादी आर्थिक और राजनीतिक हित अपने लिए अवसर देखते हैं। यही कारण है कि विश्व की  बड़ी तमाम मीडिया संस्थाएं और उनके दलाल जुलाई की घटनाओं को बढ़ाचढ़ा कर पेश कर रहे थे। उनका आकलन था कि क्यूबा की  राजनीति से फिदेल कास्त्रो और अन्य प्रारंभिक क्रांतिकारियों के हट जाने के बाद वहाँ के नेतृत्व के लिए इस तरह के संकट से निकलना मुश्किल होगा। अमरीकी तंत्र खुले तौर पर क्यूबा में सत्ता परिवर्तन के लिए लगातार माहौल गरम रखने की कोशिश करता रहा है। जब भाड़े वाले आतंकवादियों को शस्त्रों के साथ उतारने में कामयाब न रहा तो  कई सालों से वह आर्थिक बंदिशों द्वारा असंतोष और बगावत पैदा करने की कोशिश में लगा रहा है। इन प्रतिबंधों का असर संकट के दौर में और भी साफ दिखता है। आज जब क्यूबा ने अपने वैज्ञानिकों के मेहनत के बलबूते पर कोरोनावाइरस के खिलाफ कई बेहतरीन वैक्सीन तैयार कर लिए हैं, जो बच्चों के लिए भी कारगर हैं, तब अचानक वैक्सीन देने के लिए आवश्यक सिरिंज की कमी हो गई है। जुलाई के प्रदर्शनों में निहित असंतोष को प्रतिबंधों के तथ्य और उनके तात्कालिक असर से काट कर नहीं देखा जा सकता। 

5. ओबामा प्रशासन के वक्त इन बंदिशों में ढील दी गई थी क्योंकि यह माना जा रहा था कि इनसे बाजार का विकास होगा और नतीजे के तौर पर पूंजी-पक्षीय सामाजिक और राजनीतिक बदलाव की संभावना बढ़ेगी। उदारवादी पूंजीवादी तबके में 2000 के दशक से ही यह समझ बनती दिखाई देती है कि लातिन-अमरीका पर आर्थिक बंदिशों और राजनीतिक हस्तक्षेपों का उल्टा असर हो रहा है और क्षेत्रीय वामपंथ मजबूत होता जा रहा है। उनका मानना है कि वांछित बदलाव के लिए मिलिट्री व खुलमखुला राजनीतिक दखलंदाजी के बजाए बाजार ज्यादा कारगर साबित हो सकता है। 

6. पिछले तीन दशकों का अनुभव ऐसा ही बताता है। इस दौरान में विश्व ने कई रंगीन (प्रति)क्रांतियों को देखा है, जिसने पुराने समाजवादी और राजकीयवादी शासनों को ढहा दिया — वे वित्त-पूंजी संचालित पूंजीवादी भूमंडलीकरण के सामने नहीं टिक पाए। उन शासनों ने एक समय राष्ट्रीय आर्थिक विकास के वैकल्पिक मॉडल के रूप में अपनी पहचान बनाई थी। परंतु 1960 के दशक से कल्याणकारी पूंजीवाद के बढ़ते संकट के परिपेक्ष्य में वित्तीय पूंजी के मौन अंतःसरण ने उनके औचित्य को ही नकार दिया। अपने आप को बचाने की  होड़ में अपने अंतिम दिनों में महज सत्ताई आतंक पर वे निर्भर होते चले गए — और गठित सत्ता (constituted power) से घटक सत्ता (constituent power) अलग होती चली गई। यही 1989 से 1992 के बीच मे तथाकथित समाजवादी देशों के अन्तःस्फोटन का चरित्र था। आगे चल कर अन्य राजकीयवादी शासनों का भी यही हश्र हुआ। 

7. इन व्यवस्थाओं में जिन्होंने समय के अनुसार वित्तीय नेटवर्क में अपनी जगह बना ली, वे विश्व पूंजीवाद के लिए बाजार बनने के अलावे सस्ता अनुशासित श्रम और अन्य संसाधन मुहैया करने के साधन हो गए। उन्होंने अपने अस्तित्व को बचाने हेतु पूंजीवादी व्यवस्थाओं के साथ विकासवादी प्रतिस्पर्धा में घोर उत्पादनवाद को अपना लिया (“संचय की खातिर संचय”, “उत्पादन की खातिर उत्पादन” — मार्क्स) और अंत मे पूंजी के अंदरूनी तर्क के अंश बन गए। निष्कर्षतः, शीत युद्ध और हथियारों की प्रतिस्पर्धाई होड़ ने अपना काम कर दिखाया। ये व्यवस्थाएं कई मायने में अन्तःस्फोट के शिकार हो गए, साम्राज्यवादी शक्तियों को इन्हें आक्रमण द्वारा हटाने की जरूरत नहीं पड़ी। चीन तो पहले ही विश्व पूंजीवाद के विकास का सबसे महत्वपूर्ण इंजन बन चुका था। वियतनाम औऱ उत्तरी कोरिया में अमरीका की हार को हम सब याद करते हैं, परंतु उन जीतों के बावजूद आज वित्त-पूंजी ने वियतनाम के अर्थतन्त्र को पूर्णतः अपने शिकंजे में ले लिया है, और प्योंगयांग अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम के कारण और नव-ध्रुवीकरण की संभावनाओं के कारण जिंदा है। 

8. इस सहस्राब्दी के आते ही नए तरह का जन-प्रतिरोध पैदा होता दिखता है, और विशेषकर लातिन अमरीका में नव जनतान्त्रिक और समाजवादी लक्ष्यों को राजकीय स्वरूप देने की प्रक्रिया शुरू होती है। प्रथम दशक में वेनेजुएला, बोलीविया, अर्जेन्टीना और अन्य देशों में राजनीतिक बदलाव डॉलर के एकाधिकार को सीधी चुनौती देते हैं। उसके खिलाफ अमरीकी बंदिशें विफल होती नजर आती हैं। उलटे लातिन-अमरीका में पहली बार एक मजबूत साम्राज्यवाद-विरोधी अंतर्राष्ट्रीय तालमेल पैदा होता दिखाई देता है, जिसमें क्यूबा की राजनीतिक-वैचारिक साख साफ तौर पर बढ़ती दिखती है, और अमरीकी बंदिशों के बावजूद, उसके अर्थतन्त्र को व्यापक सहारा मिलता है। यही वजह है कि ओबामा प्रशासन को अमरीकी राजनीतिक आर्थिक डिप्लोमेसी में बदलाव लाना पड़ा, जिसके तहत वह लातिन अमरीका में फूट डालो और राज करो को ही बढ़ाते हुए दोहरी नीति अपनाता है। एक तरफ दक्षिणी अमरीकी देशों में वामपंथी शासनों के खिलाफ स्थानीय विपक्षों को खुले तौर पर वित्तीय और राजनीतिक संरक्षण देता है और दूसरी तरफ क्यूबा के साथ दोस्ताना हाथ बढ़ाते हुए आर्थिक बंदिशों में कई स्तरों पर ढील देता  है। आशा वही रही है कि क्यूबा में भी बाजार का तर्क सामाजिक और संपत्ति रिश्तों को बदलने में मदद करेगा, और अंततः राजनीतिक परिवर्तन को अंजाम देगा। 

9. 2010 के दशक में एक बार फिर लातिन अमरीका में दक्षिणपंथी और वैश्विक वित्तीय नेटवर्क के सहयोगी पार्टियों का वर्चस्व कायम होता दिखता है। इस अचानक परिवर्तन का मुख्य कारण भी यही नेटवर्क है जिसने विश्व के तमाम राज्यों को जकड़ रखा है, और राजकीयवाद के दायरे में इसके चंगुल से बचना मुश्किल है। इस बदलाव ने एक बार फिर क्यूबा की क्रांति को आत्म-रक्षात्मक रुख दे दिया था। ओबामा प्रशासन ने इस मौके का इस्तेमाल करते हुए पूंजीवादी बाजार के अंतर्गत आने को प्रेरित करता रहा। आर्थिक बंदिशों में ढील ने अवश्य ही कुछ हद तक ऐसा ही किया, और कई स्तरों पर बाजार का विस्तार हुआ है।  क्यूबा को इसी के द्वारा सांस लेने के लिए राहत भी मिली। दशकों से आवश्यक वस्तुओं के आयात-निर्यात पर सं.रा.अ. के बंदिशों का असर क्यूबा के उत्पादन और उपभोग के क्षेत्रों को प्रभावित करता रहा है। अवश्य ही इन बंदिशों का क्यूबा की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव भी पड़ा है, आर्थिक और राजनीतिक स्वावलंबन अत्यंत मजबूत हुआ है। तब भी ये प्रतिबंध आर्थिक विस्तार को संकुचित और उसकी गति को मद्धम करते रहे हैं, क्योंकि उस विस्तार और उसके सुदृढीकरण के लिए आवश्यक सामग्रियों की कमी को निरंतर झेलना पड़ता है। ओबामा प्रशासन द्वारा बंदिशों में ढील बड़ी राहत थी, परंतु उस राहत का पर्याप्त फायदा उठाने के लिए पूंजीवादी बाजार और वित्तीय पूंजी के संरचनात्मक दबाव से समझौता करना पड़ता है, और जिसके नतीजे हैं —  क्यूबा के राजनीतिक अर्थशास्त्र में पूंजीवादी संपत्ति और उत्पादन संबंधों को अहम जगह मिलती जा रही है, समन्वय और सहयोग पर आधारित सामाजिक संबंधों के खिलाफ मुनाफाखोरी और प्रतिस्पर्धात्मक मूल्यों का विकास हो रहा है, और प्रतिक्रांतिकारी हितों की राजनीतिक एकजुटता कायम होने की संभावना पैदा होती दिखाई दे रही है। इन्हीं नतीजों का संकेत जुलाई के प्रदर्शनों में दिखता है।

10. 2016 के बाद से ट्रम्प और अब बाइडेन प्रशासनों ने ओबामा की उदारवादी क्यूबा नीति को छोड़ पुरानी आक्रामक नीति को फिर से बहाल किया है। इस नीति में बदलाव एक बार फिर से बंदिशों में जकड़ कर क्यूबा के अंदर प्रतिक्रियावादी विपक्ष को सशक्त करने की कोशिश को दिखाता है — क्योंकि सं.रा.आ. के सत्ताधारी वर्ग को क्यूबा शासन की लोकप्रियता में कहीं कमी आती नहीं दिखती है। जुलाई के प्रदर्शनों में इस नीति का कुछ हद तक खुला क्रियान्वयन दिखता नजर आया। 

11. यह अवश्य है कि बाहरी दोस्तों और दुश्मनों दोनों को विपक्ष में केवल प्रतिक्रान्तिकारी लोग दिखते हैं जिन्हें मियामी फंड करता है, जबकि राजसत्ता के आलोचकों में सर्वाधिक क्रांति-समर्थक विपक्ष है जो आर्थिक सुधारों की आलोचना करता है जिनकी वजह से पूंजीवादी तबके सशक्त हो रहे हैं। यह क्यूबाई क्रांति की एक विशेषता की ओर इंगित करता है कि उसने क्रांति को स्थायित्व (स्टबिलिटी) के समानार्थी कभी  नहीं देखा। इस वजह से क्यूबा में यथास्थितिवाद के खिलाफ लगातार संघर्ष मौजूद रहा है। स्थायित्व के खूंटा-गाड़ संस्कृति के खिलाफ क्यूबा की क्रांति में अनित्यता के सिद्धांत का क्रांतिकारी समन्वय है। पूंजीवादी विश्व मे क्रांति की अपूर्णता और अविच्छिन्नता की अनिवार्यता को मानते ही हुए सामाजिक क्रांति की वर्चस्वता को लगातार पुनरुत्पादित किया जा सकता है। शायद आज भी क्यूबा के क्रांतिकारी “खाई में संसद” चलाने के दायित्व को गंभीरता से लेते हैं। और यही वजह है कि क्यूबा में आज भी क्रांति जिंदा है — हाँ, उसकी गति ग्राफ के उतार-चढ़ाव में बहुत हद तक बदलती अंतरराष्ट्रीय स्थिति निर्णायक भूमिका निभाती है। 

Bethune’s Socialized Medicine and the Public Health Crisis Today – The Bullet


Pritha Chandra and Pratyush Chandra
The Bullet

“…that consumption and the other pulmonary diseases of the workers are conditions necessary to the existence of capital.” — Karl Marx

We are at war! The heads of states throughout the globe are posing as chieftains in this quixotic war against an enemy who no one understands. War rooms are being set up to manage data, propaganda, public reactions, and to control supplies, while the foot soldiers – doctors, nurses, other medical and supporting staff – toil to deal with the actual and potential carriers of the enemy, including themselves. Of course, along with them are the baton-wielding workers of the agencies of surveillance – the police, security guards, etc. who are made to assist drones and other AIs to manage the panic and the surplus-ed population (migrants, homeless, and poor) on the streets.

Today, when international and national statesmen are opportunistically posing public hospital workers and those in so-called essential services as ‘warriors’, perhaps it is time for us to understand the reality behind and beyond these spectacular rituals of salutations. For this, we need to pay heed to what Norman Bethune meant when he exhorted his medical colleagues to “organize ourselves so that we can no longer be exploited as we are being exploited by our politicians.” He too called upon them to engage in a collectivized attack

“Medicine must be entirely reorganized and unified, welded into a great army of doctors, dentists, nurses, technicians and social service workers, to make a collectivized attack on disease and utilizing all the present scientific knowledge of its members to that end. Let us say to the people – not ‘How much have you got?’ – but, ‘How best can we serve you?’”

Norman Bethune (1890–1939) was a Canadian surgeon, and a pioneer in the field of thoracic surgery. He was a Communist and an anti-fascist who steeled himself in the Spanish Civil War, fought tuberculosis not just as a doctor but as a patient too, and died in 1939 in the Chinese liberation movement against the Japanese, after getting infected while treating patients without the necessary medical equipment. Norman Bethune was a product of an era that saw the beginning of the industrialization of medicine and medical practices. He made his medical practice a ground for critiquing capitalism and the political economy of modern medicine. We seek to discuss some of his ideas here, and the context in which they were conceived. These ideas gain new meanings in the light of the medical crisis that we face today.

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