सहारा


जब अपने ही लोग पराये हो जाएँ
तो ये मत समझो कोई नहीं है तुम्हारा
तुम्हारा सुरक्षाकवच छल ले कोई
तो ये मत समझो कहीं नहीं है सहारा

मीलों तक फैले रास्ते कितने हैं जिनको
बसेरा कहीं नहीं मिला आओ देखो
ये सभी तुम्हारी तरह ही हैं सूर्यपुत्र
सूतपुत्र और बेबस महिलाओं के बच्चे

तपती धरती ने इनको पाला है संभाला है
सूरज की किरणों ने चलना सिखाया है
जीवन से मरने तक जलते ही रहना
हलाहल इस सृष्टि ने ऐसा पिलाया है

ऐसा नहीं है ये जानते नहीं हैं
अपने पराये में फर्क करते नहीं हैं
ये आना और जाना इन्हें सब पता है
सदियों से चलती आई कथा है

तुम आओ सही और अपने को जानो
आग़ोश में इनके मिलता सहारा
जब धरती फटेगी फिर बादल छँटेगा
कहाँ होगा ये हमारा तुम्हारा

***
सड़क पर आओ तो सही फेंक दो सभी
सहारे जो बांधते हैं तुम्हें तुम्हें आश्रित
करते हैं छीनते हैं तुमको तुमसे तुममें
सूर्य है भस्म करता नवजीवन दान देता

प्रेस क्लब में


क्या हो गया है इन चेहरों को जो
भिज्ञता और संयम के प्रतीक थे
कि उनके सामने फटकना
मुश्किल था आज वे ऐसे क्यों हो गए

हर बात पर तुनकते जैसे
लगता है कि इनकी आवाज़
दब रही है भीड़ में स्वयं को
देख कर घबरा से गए हैं

अपने आप को खोते उसमें जहाँ
कोई नहीं है पहचानने वाला
भीड़ है सतत एक होती
फिर बिखरती मारती मरती

बस क्या हुआ क्या हो रहा है
क्या होने वाला है यही चर्चा
कोई नहीं जानता क्यों हो रहा
सारा तर्क वितर्क खो रहा है

कैसा ये न्याय न्यास


हे इंद्रदेव, हे मेघराज
तुम देवों के राजाधिराज
राक्षस समाज ने अमृत मथ
वचनानुकूल बाँटा तुमसे

पर कैसा ये न्याय न्यास
सत्ता की कैसी अंध प्यास
तुम देवों की कमज़ोर शक्ति
उतनी ही तेज़ चतुर भक्ति

तुम पर आसक्त विष्णु प्रधान
राक्षस गण थे बिल्कुल अजान
दे दिया मोहिनी को अमृत धन
हुए तभी वे पातालवासिनः

महाबली गौरव विराट
त्रिलोक जीत बन गए सम्राट
तुम अमरदेव साष्टांग किए
भगवन के चरणों में गिरते

फिर हुए अवतरित लघु वामन
और सत्यभक्त का हुआ परीक्षण
त्रिलोक लाँघ कर किया प्रतिष्ठित
देवों को निष्कासित सज्जन

(ओणम, २०१९)

ग्राफ


ये ग्राफ अब नीचे की तरफ मुँह बाये सरपट दौड़ रहा है
क्या क्या संकुचित होगा नष्ट होगा इतिहास से हम जानते हैं

मगर इतिहास ये नहीं तय करता कि हम क्या करेंगे
ये हमें ही बताना होगा कि इतिहास से हमने क्या सीखा

क्या हम वो गलतियाँ दोहराएँगे और इतिहास एक बार
फिर सेअपने रास्ते चलेगा इसी मोड़ पर पहुँचने के लिए

रेखाओं का खेल


लक्ष्मण बारबार रेखाएँ खींचता है मगर सीता
लांघ देती है उन रेखाओं को नए के अनुराग में
राम का रोष नई चढ़ाइयाँ चढ़ता है सीता के लिए
और सीता को बारबार अग्निपरीक्षा देनी होती है
साबित करनी होती है अपनी पवित्रता कि आज भी
है व्रता वो राम के स्वामित्व की कदमों की दासी

क्या गुदगुदी होती है पृथ्वी को जब जमीन पर
रेखाएँ बनाते हैं ये लोग और मिटाते हैं कुछ और
हँसी तो ज़रूर आती होगी इस खेल को देख कर
आसमान भी कहता होगा ये कौन सा खेल खेलते हैं
सदियों से कितनी बार रेखाएं बदलीं और खून से
सनी मिट्टी क्या मज़ा इस खेल में आता है इनको

सत्ता के घोड़े – एक कविता


ज्ञान मानचित्र की रेखाओं को नहीं मानता
न वे उसको बांध सकते हैं
इसीलिए तो वे ज्ञान की बात नहीं करते
यान की बात करते हैं

तुम सत्ता के घोड़े हो
तुम पर लद के नई ऊँचाइयाँ चढ़ेगी वो
मिलने जाएगी चंद्रमा की बुढ़िया से
जीतने जाएगी राहु को
कहीं ग्रहण न लगा दे उसके भविष्य को
आखिर भगवान को भी माननी पड़ी उसकी शक्ति
अलग करना पड़ा उसके सिर को उसके धड़ से
मस्तिष्क को शारीरिक बल से
कहीं उखाड़ न दे देवताओं का वैभव जड़ से

भगवान को भी मानना पड़ा अमरत्व उसका
जिसने छल लिया था छलिया को
उसको जिसने छल से परिश्रमी राक्षसों के
परिश्रम को पिला दिया देवों को
जो हमेशा हारते रहे मैदानों में
भागते रहे सत्ता के वीरानों में

तभी तो डरते हैं
राहु को केतु से मिलने नहीं देते
सत्ता इसी अलगाव को ही कहते हैं

सत्ता ने तुम्हें अदना बना दिया है
तुम्हारी उड़ान को लगाम पहना दिया है
अब तुम जहाँ भी जाओगे सत्ता तुम पर लदी होगी
मिमियाते तुम खड़े होगे
सारी गलतियाँ तुम्हारे सिर होगी
और जीत उसकी
उसकी थपथपाहट तुम्हारा पारिश्रमिक
उसका पुचकारना तुम्हारा ईनाम

देश देख रहा था उस दिन
और तुम सुन रहे थे उसके मन की बात
स्कूली बच्चों की तरह
तुम्हें सिखा रही थी सत्ता
बता रही थी मतलब तुम्हें तुम्हारा
और उसकी चढ़ाइयों का

और तुम इतराते
सत्ता को अपने करीब पाते

हम इतिहास के निरंतर निषेध


जनाजर का ज्वर अचानक
ज्वार बनकर फूटता
हर सदी इतिहास की
दीवार है जो टूटती

मैं गिरा हूँ मत उठाओ
मैं खुद उठूँगा और चला जाऊँगा
अपनी दयाभरी आँखों से मत देखो
वे रोकती हैं मुझे मैं होने से
मुझे अपनी तरह उठने और चलने से
ऐसा क्या है क्या तुम कभी गिरे नहीं
गिर कर उठे नहीं उठ कर चले नहीं
तमाशा मत बनाओ मेरे गिरने का
कि ऐसा ही मैं रह जाऊँ
सभी मुझे मेरे मैं से छीनते
हमेशा के लिए मैं दया का पात्र बन जाऊँ

मुझे अपनी लड़ाई खुद लड़ने दो
और तुम क्यों दोगे मैं लड़ूंगा
और लड़ता भी हूँ
तुम अपनी लड़ाई लड़ो
तभी यह हमारी लड़ाई होगी
तब नहीं जब तुम हमारे लिए लड़ते
शहीदों के लिस्ट में तुम्हारा नाम
दूसरों के लिए मर गए तुम कितने महान
और हम हमारी औकात ही क्या
अपनी रोज़ की लड़ाई के नीचे दब गए
उठ न पाए हम बेचारे
रह गए सड़क के किनारे

और तुम पथप्रदर्शक अधिनायक
हम जन तुम जननायक
हम भेड़ तुम गड़ेरिया
हम गायें तुम कन्हैया
लो हुए हम नाव अब तुम खेवैया
खेते खेते बन गए तुम जनक
तो हम हुए जनित तुम्हारे हल की नोंक से
सीता तुम राम
हम सुदामा तुम घनश्याम
हम द्रौपदी
हमारी लाज हो तुम
तुम आसमान में सूर्य
हम तुम्हारी असंख्य किरणें
हम माया हैं तुम्हारी छाया हैं
तुम्हारी विविधताओं के प्रदर्शन हेतु
परिपेक्ष हैं
स्थूल हैं
तुम्हारे चरणों की धूल हैं
फूल हैं

इतिहास में तुम्हारा ही नाम रहेगा
हम अगणित अदृश्य
चाहे कह दो इतिहास हमारा
जिसके नायक तुम्हीं हो
तुम्हीं रहोगे

परंतु तुम जड़ हममें जड़ित
सारी उपमाएँ हमसे फलित
इतिहास गाते रहो डुगडुगी बजाते रहो
इतिहास की गौरव गाथा तुम्हारे लिए है
इंसान का गौरव इसी में है
कि हम सारे गर्व को मिटाते रहे हैं
इतिहास हमें नही हमें आज चाहिए
हमें सुराज नहीं
हमें सु-अराज, स्वराज चाहिए
न राज्य न आसीन राजा
न दंड न कोई दांडिक
हम आदि अंकुर सतयुग से
इतिहास के निरंतर निषेध हैं

आज़ादी अगस्त 2019


भूमिका

घाटियों में धुंध से छनकर सबेरे धूप आई
अलस मन में नए दिन की आस अब लो जगमगाई
बाण चौखट पर गिरे हैं क्या नया है
रात सत्ता की उसी का सिर फिरा है
फिर कोई जागी है नीचे ज़िद नई
फरमान से ही क्या हिमाला जीत लेगी

1)

जो दीवार खड़ी थी वो ढह गई
हमें लगता था यहीं हिफाज़त है
रेत की थी हल्की बारिश में बह गई

वो समझते थे कि हम नंगे हैं
हम समझते थे कि हम नंगे हैं
मगर पर्दा हटा तो सच निकला

वही पर्दा था जो कपड़ा था
हमने ओढ़ा तुमने ओढ़ा था
वो कपड़ा काफ़ी चौड़ा था

वो अब पूरा जल गया
हम तुम्हारे सामने हैं
तुम हमारे सामने हो

2)

तुमने गुलदस्ते
से निकाल फेंका हमें
कि काँटे निकल आए थे
अच्छा ही है अब
आज़ाद हैं हम
जहाँ फेंका वहीं उगेंगे
और फैलते चले जाएंगे

3)

कागज़ों के बीच था सोता रहा सपना हमारा
अच्छा किया झाड़ा उन्हें फुर्र उड़ा सपना हमारा

4)

क्या कहूँ क्या चल रहा है
वक्त अब बस टल रहा है
हवा बदले वो कब बदले
अब बदले कि तब बदले
यही अब इंतज़ार चल रहा है

5)

संभावनाओं का सिमटना संभावनाएँ ख़त्म होना नहीं है
भविष्य साफ़ दिखना भी है और वही है
संभावनाओं के अंतहीन चक्रव्यूह में फंसकर
हमने संभावनाएँ ही टटोली सच्चाई से हमारा रिश्ता
बिरहन के गीत सा हो गया हम दर्द के नशे में झूमते रहे
हज़ारों रास्ते खुले हैं कि एक रास्ता नहीं मिलता
रास्ते अख्तियार करने की आज़ादी कोई आज़ादी नहीं है
अगर हमें पता ही न हो कहाँ जाना तो जाना कहाँ है
कोशिश की संभलने की तो हमने आत्मत्याग किया
हमने खुद को तुम्हारे या खुदा के हवाले किया
अच्छा ही है आज हम दीवार के रूबरू खड़े हैं
न पीछे मुड़ने की उम्मीद न आगे कोई रास्ता दिखे

6)

तुम्हारी दुर्दशा तुम्हारी ही नहीं है अपनी वेदना में
इतने मत बहो कि तुम्हारी लड़ाई का मतलब
तुमसे दूर हो जाए इतिहास के भार ने तुम्हें
बांध रखा था तुम्हारे सपने को वो लगाम थी
तुम्हे समय समय पर उड़ान भरते देखना
किसे नहीं भाता और दूसरों को ललचाना
बताना कितने आज़ाद हो तुम अपने बंधन में
तुम बताओ किसकी दशा ऐसी नहीं है

7)

मानचित्र में वो जगह तुम्हें खोजनी है
उन्हें नहीं जो वहाँ जीते हैं
सीमाएँ तुम्हारे दिल में हैं
उनके लिए कदम कदम फौज़ है
अपना रोज़ गुज़ारना है उन्हें
अपने हिसाब से गुज़ारें
यही उम्मीद थी उनकी
तुमने सीमाओं में बाँधा उन्हें
अपने आपको
फिर कहा माँगो
तो भला क्या माँगे
सीमाएँ ही तो
जो सीमित करेंगी तुम्हारे दायरे

मन की बात


साहब बता रहे थे
अपने मन की बात
सब कुछ अच्छा ही बताया उन्होंने
कैसे वो पशुओं का दर्द समझते हैं
उनके लिए रोज़ अपने घर के आगे
गाछ के नीचे खाने पीने की सुविधा करते हैं

वो हरा भरा गाछ है
दिन में सैकड़ों पक्षियों की चहलकदमी रहती है
उनके अनूठे सुरसंगम का आनन्द लेने
कई जानवर भी आते हैं
छाँव का मज़ा लेने
कुत्ते बिल्लियों चूहे बिच्छु सांप छुछुंदर
और गिलहरियों के अलावे
कहाँ से शहर के मध्य रास्ता तय करती
आ रही हैं आजकल गायें
शायद साहब को आशीर्वाद देने के लिए

साहब ने बताया कैसे इन कार्यों से
ह्रदय ही नहीं होता स्वच्छ
धन भी गोरा नहीं तो सांवला हो ही जाता है
काला नहीं रहता
और व्यवहार कहता है
हमें बरबादियों से बचना है
क्या पता क्या कब किस काम आ जाए
चाहे वो पण्य हो या परंपरा

साहब हमेशा अच्छी बात ही बताते हैं
परीक्षा में पास होना भी सिखाते हैं
बताते हैं कि फेल करने से घबराना नहीं चाहिए
रास्ता निकल ही जायेगा
कुछ तो हो ही जायेगा
हमारी परंपरा ही है जुगाड़ की
हम कुछ भी बरबाद नहीं होने देते
ब्रह्माण्ड में सभी चीज़ें उपयोगी हैं
तभी तो गणेश हमारे सहयोगी हैं
कार्य शुरू करने का मतलब
हम श्री गणेश करते हैं
उन्हीं से शुभलाभ है
सब कुछ ठीक हो ही जायेगा
कुछ तो हो ही जायेगा

आज पूरे देश में गूँज है
इसी दर्शन की
इसी भावना ने साहब को बनाया है
इसी भावना ने साहब को चढ़ाया है
चोटी पर
अगर ये सच नहीं
तो कुछ और ही होगा
कुछ तो होगा
अगर मार्स नहीं तो चन्द्रमा होगी
कुछ तो होकर रहेगा
कुछ तो होते रहेगा

सत्ता की रात – कुछ कविताएँ


सत्ता की रात में

हे उदारपंथियों
पहचानो
ये तुम्हीं हो
तुम्हारा ही विकृत रूप है
नशे में धुत्त
तुमने कर दिखाया
जो तुम्हें पहले कर दिखाना था
सही दिमाग़ से
बिन पगलाये
तुम इसको कर सकते थे
मगर तुम्हें हिम्मत कहाँ थी
समय ही कहाँ था
मठाधीशों में तिकड़म भिड़ाने से
तो लो सत्ता की रात में
मदहोश हो
मठाधीशों में मठाधीशी जमाने के लिए
एक नया चिलम चढ़ा कर
किया है वही जो तुम्हें करना था
मगर विकृत रूप में

आत्ममुग्ध

1
सत्ता के पौध हैं
सत्ता के गलियारे में ही खिलेंगे
माली बदल जाए पर वे न बदलेंगे
वे यहीं उगते हैं
सत्ता है तो वे हैं
पर उन्हें मुगालता है कि वे हैं तो सत्ता है

2
किसी को खुशफहमी पालने से
कौन रोक सकता है भला
प्रजा सोचती है उसका तन्त्र है
वे नहीं जानती कि वह मात्र यंत्र है

3
चाँद कहता भागा अंधेरा है
रात कहती तू मेरा है
सूर्य कहता रोशनी मेरी
अंतरिक्ष बस मुसका रहा

4
आत्ममुग्ध हैं सभी
आत्ममुक्त कुछ नहीं

दो भाई

हाथ में हथियार है
कौम की ललकार है
दिल मे धिक्कार है
साँप की फुफकार है

हाथ में हाथ है
साथियों का साथ है
सत्ता से प्यार है
उम्मीद शानदार है

तू

क्या हुआ
इतना कुछ हो गया लेकिन तू न हिला
समय को बदलते तूने देखा है
जीवनियों को मूर्ति होते पिघलते देखा है
क्या हुआ तुझको सब पता है
फिर भी तेरी धमनियों में खून ठंडा क्यों रहा