भोर के सिपाही


उस भोर के तुम सिपाही थे
जब आसमान पर बीती रात का
खून सूख रहा था
और नया सूरज कहीं नहीं था
तुमने उस नए सूरज को गढ़ना चाहा
यही तुम्हारा अपराध है
जो भी कुछ था झोंक दिया
भीषण आग थी लपटें उठीं ऊँची
मगर सूरज तो उगेगा ही
अपने समय से हँसेगा
हमारे सपनों पर और हम
भीड़ स्तब्ध तुम्हें दोष देंगे
क्योंकि सूरज कभी गलत नहीं होता

संकट


इन्हें ज़िंदा रक्त लेकिन
इंसान मुर्दा चाहिए
आपको जो काट लें
इनकी तरह हो जाएंगे

इस तरह इनकी तरह अब
देस निर्मित हो रहा है
गर सभी इनकी तरह हों
क्या भला ये खाएंगे

देश बदले


सब कुछ बदलना है
कि कुछ भी न बदले
वे जहाँ थे वहीं हैं
बस देखना बदले

खाली पेट जश्न मनाएँ
प्यास हो मल्हार गाएँ
नंग-धड़ंग झंडा उठाएँ
देख कैसे देश बदले

जोश ही अब जोश हो
नीचे मदहोश हो
ऊपर ही होश हो
देख ऐसे देश बदले

हमारा प्यार


व्यावहारिकताओं ने इतने वर्षों में
हमारे रिश्ते पर
धूल के कितने परत डाल दिए हैं

हमारे प्यार तक पहुँचने को
आज खुदाई की ज़रूरत पड़ेगी

वे नहीं समझेंगे
और हम भी कहाँ समझते हैं
कि सोने पर धूल के परत जम जाएँ
और वो काला दिखे
मगर जौहरी जानता है
कि परतों के नीचे सोना छिपा है
हमारा प्यार आज भी ज़िंदा है गहरा है
उसका भूत वर्तमान भविष्य सब सुनहरा है

***
प्यार खत्म नहीं होता
वो स्रोत है जीवंतताओं का
तरलताओं का
उसका सूखना
सृष्टि की एकता का टूटना है
अंतरिक्ष में तैरते
अचानक संपर्क का छूटना है

(१६/०९/२०१९)

मुद्रा और तानाशाही


मैं
और मेरे आईने
वे सब
केवल आईने

मैं अपने आप को देखता हूँ उनमें
वे मैं ही तो हैं
वे मुझमें

जो नहीं
पता नहीं

कोई नहीं

मैं
और
कुछ नहीं

सहारा


जब अपने ही लोग पराये हो जाएँ
तो ये मत समझो कोई नहीं है तुम्हारा
तुम्हारा सुरक्षाकवच छल ले कोई
तो ये मत समझो कहीं नहीं है सहारा

मीलों तक फैले रास्ते कितने हैं जिनको
बसेरा कहीं नहीं मिला आओ देखो
ये सभी तुम्हारी तरह ही हैं सूर्यपुत्र
सूतपुत्र और बेबस महिलाओं के बच्चे

तपती धरती ने इनको पाला है संभाला है
सूरज की किरणों ने चलना सिखाया है
जीवन से मरने तक जलते ही रहना
हलाहल इस सृष्टि ने ऐसा पिलाया है

ऐसा नहीं है ये जानते नहीं हैं
अपने पराये में फर्क करते नहीं हैं
ये आना और जाना इन्हें सब पता है
सदियों से चलती आई कथा है

तुम आओ सही और अपने को जानो
आग़ोश में इनके मिलता सहारा
जब धरती फटेगी फिर बादल छँटेगा
कहाँ होगा ये हमारा तुम्हारा

***
सड़क पर आओ तो सही फेंक दो सभी
सहारे जो बांधते हैं तुम्हें तुम्हें आश्रित
करते हैं छीनते हैं तुमको तुमसे तुममें
सूर्य है भस्म करता नवजीवन दान देता

प्रेस क्लब में


क्या हो गया है इन चेहरों को जो
भिज्ञता और संयम के प्रतीक थे
कि उनके सामने फटकना
मुश्किल था आज वे ऐसे क्यों हो गए

हर बात पर तुनकते जैसे
लगता है कि इनकी आवाज़
दब रही है भीड़ में स्वयं को
देख कर घबरा से गए हैं

अपने आप को खोते उसमें जहाँ
कोई नहीं है पहचानने वाला
भीड़ है सतत एक होती
फिर बिखरती मारती मरती

बस क्या हुआ क्या हो रहा है
क्या होने वाला है यही चर्चा
कोई नहीं जानता क्यों हो रहा
सारा तर्क वितर्क खो रहा है

कैसा ये न्याय न्यास


हे इंद्रदेव, हे मेघराज
तुम देवों के राजाधिराज
राक्षस समाज ने अमृत मथ
वचनानुकूल बाँटा तुमसे

पर कैसा ये न्याय न्यास
सत्ता की कैसी अंध प्यास
तुम देवों की कमज़ोर शक्ति
उतनी ही तेज़ चतुर भक्ति

तुम पर आसक्त विष्णु प्रधान
राक्षस गण थे बिल्कुल अजान
दे दिया मोहिनी को अमृत धन
हुए तभी वे पातालवासिनः

महाबली गौरव विराट
त्रिलोक जीत बन गए सम्राट
तुम अमरदेव साष्टांग किए
भगवन के चरणों में गिरते

फिर हुए अवतरित लघु वामन
और सत्यभक्त का हुआ परीक्षण
त्रिलोक लाँघ कर किया प्रतिष्ठित
देवों को निष्कासित सज्जन

(ओणम, २०१९)

ग्राफ


ये ग्राफ अब नीचे की तरफ मुँह बाये सरपट दौड़ रहा है
क्या क्या संकुचित होगा नष्ट होगा इतिहास से हम जानते हैं

मगर इतिहास ये नहीं तय करता कि हम क्या करेंगे
ये हमें ही बताना होगा कि इतिहास से हमने क्या सीखा

क्या हम वो गलतियाँ दोहराएँगे और इतिहास एक बार
फिर सेअपने रास्ते चलेगा इसी मोड़ पर पहुँचने के लिए

रेखाओं का खेल


लक्ष्मण बारबार रेखाएँ खींचता है मगर सीता
लांघ देती है उन रेखाओं को नए के अनुराग में
राम का रोष नई चढ़ाइयाँ चढ़ता है सीता के लिए
और सीता को बारबार अग्निपरीक्षा देनी होती है
साबित करनी होती है अपनी पवित्रता कि आज भी
है व्रता वो राम के स्वामित्व की कदमों की दासी

क्या गुदगुदी होती है पृथ्वी को जब जमीन पर
रेखाएँ बनाते हैं ये लोग और मिटाते हैं कुछ और
हँसी तो ज़रूर आती होगी इस खेल को देख कर
आसमान भी कहता होगा ये कौन सा खेल खेलते हैं
सदियों से कितनी बार रेखाएं बदलीं और खून से
सनी मिट्टी क्या मज़ा इस खेल में आता है इनको