कौन सुनेगा दूर की धुन को


एक ही रंग में रंग गया सब कुछ
गोरा हो या काला
राजा जो मतवाला है सो
सारा जग मतवाला

एक ही भाषा एक ही आशा
क्या कहता है अगला पासा
ताश के पत्ते बन उड़ते हैं
एक ही धुन में सब जग नासा

सब की नैया धार में उतरी
दिखता कोई नहीं किनारा
एक दिशा में सब बहते हैं
कौन चलेगा उल्टी धारा

कलुश भेद तम कौन हरेगा
सूली पर अब कौन चढ़ेगा
सब को है बस एक ही चिंता
इसका सिर गिर किसका चढ़ेगा

सब तो या चाणक्य गुरु हैं
या फिर कान्हा रथ पकड़े हैं
या हैं धनुर्धर महारथी सब
जो हर दम ही रण में खड़े हैं

कौन सुनेगा दूर की धुन को
कौन बनेगा आज का बुनकर
कल की तैयारी करने को
कौन लाएगा रूई धुनकर