क्रांति और भक्त


क्रांति क्रांति हे क्रांति देवि
भक्तों के स्वर यों गूँज रहे
तुम कहाँ गई हो इन्हें छोड़
ये हर पल तुम को ढूंढ़ रहे

तुम इनकी खबर न लेती हो
तुम इनको कुछ न देती हो
लो ये दीवाने क्लांत हुए
रोते रोते सब शांत हुए

अब ऐसी हालत हो गई है
हर आहट पर ये चौंक रहे
इनकी गति अब यूँ देख-देख
सब श्वान इन्हीं पर भौंक रहे

हर छोर मोड़ पर तुम दिखती
हर देवि में तेज तुम्हारा है
जिस ओर हवा भी बहती हो
सब इनके लिए इशारा है

पता नहीं क्या होगा तब
जब देवि तुम्हारा आना हो
हर ओर तुम्हारे मंदिर हैं
किस अर्थ तुम्हारा पाना हो

सब रमे हुए हैं भक्ति में
आभास तुम्हारा इनको है
सब तुम्हें जानते तुमसे ज्यादा
चाह तुम्हारी जिनको है

कण कण में जब तुम्हीं दिखो
हर तरफ तुम्हारी ही छाया
जब देवि तुम्हीं हर ओर मिलो
क्या काम करे काया-माया