सपना


हम निकल पड़े थे वहाँ उम्मीद में कि दुनिया बदले
खड़े हैं आज भी उस छोर पर कि कारवाँ गुज़रे
इक-इक कर के दुनिया की हवा ने
उम्मीद के गुलिस्तां से
चुन लिया है गुलों की रंगीनी
हरे पत्तों से उनकी हरियाली
शोख यौवन से सारी शोखी
रह गए हैं तो बस कंटीले बिस्तर
ढंकने को है तो बस सपनों की चादर

उसने हर रूप निहार कर देखा
हर आकार फाड़ कर देखा
सपनों की बीज हर कहीं लेकिन
खोज कर खोद ले जाए नहीं मुमकिन
सपना साकार ही हो जाए तो सपना कैसा
छीन सकता है उसकी भाषा को
छू नहीं सकता उसकी आशा को