यादों में धुआँ और आग


यह धुआँ है 
कभी आग लगी थी जंगलों में
पेड़ पशु कई ज़िंदगियाँ भस्म हुईं थीं

सरपट दौड़ते जानवरों में
एक वह भी था
जिसने पीछे मुड़ कर देखा

लपट आसमान को छूते
अपने जीभ से लपकते
जो कुछ भी सामने आया

चिंगारियाँ दूत बन विनाश के सन्देशवाहक
विस्तार देते उसके प्रचंड रूप को 
कोई भेद नहीं उसकी नज़रों में 

न छोटा न बड़ा
अपने स्पर्श से सबकुछ
एक जैसा 

समानांत सबका
असीम शक्ति
महसूस करता

बस एक ही था 
जिसने पीछे मुड़ कर देखा 
सब कुछ देखा 

वही था 
जो भागते भीड़ से अलग था
उसने पीछे मुड़ कर देखा

आग की भीषणता को
जागते देखा
फैलते देखा

छुप कर  देखा
सामने आकर देखा   
शांत होते बुझते देखा

याद है
आग से पहले का जीवन 
आग में लहराते हुए

उसके मित्रगण परिजन
और परजन  
सभी याद हैं

भागते सब एक से
कुचलते एक दूसरे को
सब याद हैं

इसी आग ने तो 
उसको आदमी बनाया
जिसने मुड़कर देखा 

अपनी याद में 
उसको जिन्न की तरह 
संजोए रखता है 

उस आग की याद 
आज तक हमारे साथ है 
हमारे अवचेतन में  

कितनी बार उस आग को
सेंकते राख हो गए
कितने ही लोग

गांव के गांव
शहर के शहर
फूंक दिए उन हाथों को 

जिन्होंने ने उसे लगाया था
फिर भी याद है
बोरसी रसोईघर और बीड़ियों में

भस्म होने का आनंद है यह
रोज़ में खोने का
कैसा आनंद है यह

मगर याद सब कुछ है  
किसी कोने में 
आज भी धू धू करता 

जुलाई 23, 2019

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