सत्ता के तभी तो दावेदार हैं


स्वामी ने कहा
ये तो जंगल हो गया है
इसमें मेरा महल खो गया है
अब इन झाड़ों को काट दो
जो भी फैलता नज़र आए उन्हें छांट दो
ऐसे तो नहीं चलेगा
मेरा गौरव तब कैसे पलेगा

नौकर ने बात मानी
भर दी हमेशा की तरह हामी
लगा दिया मशीनों को
सारे अल्हड़ पौधों को छांट दिया
सारे अक्खड़ तनों को काट दिया

मच गया हाहाकार
तभी हुआ चमत्कार
जो शांति के प्रतीक थे
अपने-अपने कोनों में ही ठीक थे
न झेल पाए वे यह क्रूरता
कर दी क्रांति की उद्घोषना
हवा में तैरती थी
शूरता

कर दिया नींद स्वामी का हराम
मचा दिया हर दिशाओं में कोहराम
सामने था नौकर
लग रही थी उसको ठोकर
झाड़ फैलते गए
मशीनों को घेर लिया
कटते रहे पटते रहे
मगर अंत ही नहीं हुआ
मशीनों को ओवरटाइम ने
कर दिया धुँआ

स्वामी ने बिगुल बजाई
नौकर को संदेसा पठाई
आ रहा हूँ मैं
सुनूंगा कहानी दोनों ओर की
अपने आगे शान्ति दूत भिजवाई

स्वामी अपने नौकर को फटकारता है
ऐसा क्यों किया
ये तो अभी फूल हैं
इनको संजोना है हमें
इनसे बात करनी चाहिए थी
इन्हें समझाना चाहिए था

और तुमलोगों को भी समझना चाहिए
बुज़ुर्ग हैं
हमारी व्यवस्था के ये दुर्ग हैं
इज्ज़त से पेश आना चाहिए
तुम्हें भी तौर सीखना होगा
तुम फूल हो
तुम्हारा काम है सुगंध फैलाना
तुम्हीं तो गौरव हो हमारे
ध्रुव तारे

चलो अच्छा हुआ
हम सब अपनी गलतियों से सीखते हैं
अब ख़त्म हो यह झगड़ा
और सम्बन्ध बनाओ तगड़ा
दुर्ग हैं ये तुम्हारी सीमा दिखाते हैं
कूदने की सीमा फांदने की सीमा
और आप भी कड़ाई कीजिए धीमा

शांत हो गए स्वामी
नौकर ने भरी हामी
अब कौन बनेगा हरामी

कितने समझदार हैं
सत्ता के तभी तो दावेदार हैं