हवा तो निकलनी ही है


समय पर बांध सत्ता है वो भ्रम है
नहीं क्योंकि वो सत्य नहीं है ऐसा नहीं है
वह सत्य है मगर शाश्वत नहीं है
बांध को टूटना ही है उसको टूटना ही होता है

समय दस्तक देता है घड़ी के टिकटिक की तरह
मगर समय घंटों के रहम पर नहीं है
घंटियाँ हमें सतर्क करती हैं
बांध कभी भी टूट सकता है

कितना सैलाब रोकोगे देख लो
उसका आक्रोश बढ़ता चला जाएगा
नतीजा हमारे हदों में नहीं है
उबलते पानी को भाप बनना ही है

समय को पहचानों हर मौसम के लिये
तैयार हो ऐसा हो नही सकता
तुमने कैलेण्डर बना लिया घड़ी बांध ली
तो सोचा समय को बांध लिया

समय का रूप ही क्या है बढ़ती धार है
अदृश्य तलवार है चक्र में क्या बांधोगे
सत्ता की हवा निकलनी ही है
आज नहीं तो कल हमें इंतज़ार है