प्रेस क्लब में


क्या हो गया है इन चेहरों को जो
भिज्ञता और संयम के प्रतीक थे
कि उनके सामने फटकना
मुश्किल था आज वे ऐसे क्यों हो गए

हर बात पर तुनकते जैसे
लगता है कि इनकी आवाज़
दब रही है भीड़ में स्वयं को
देख कर घबरा से गए हैं

अपने आप को खोते उसमें जहाँ
कोई नहीं है पहचानने वाला
भीड़ है सतत एक होती
फिर बिखरती मारती मरती

बस क्या हुआ क्या हो रहा है
क्या होने वाला है यही चर्चा
कोई नहीं जानता क्यों हो रहा
सारा तर्क वितर्क खो रहा है