कैसा ये न्याय न्यास


हे इंद्रदेव, हे मेघराज
तुम देवों के राजाधिराज
राक्षस समाज ने अमृत मथ
वचनानुकूल बाँटा तुमसे

पर कैसा ये न्याय न्यास
सत्ता की कैसी अंध प्यास
तुम देवों की कमज़ोर शक्ति
उतनी ही तेज़ चतुर भक्ति

तुम पर आसक्त विष्णु प्रधान
राक्षस गण थे बिल्कुल अजान
दे दिया मोहिनी को अमृत धन
हुए तभी वे पातालवासिनः

महाबली गौरव विराट
त्रिलोक जीत बन गए सम्राट
तुम अमरदेव साष्टांग किए
भगवन के चरणों में गिरते

फिर हुए अवतरित लघु वामन
और सत्यभक्त का हुआ परीक्षण
त्रिलोक लाँघ कर किया प्रतिष्ठित
देवों को निष्कासित सज्जन

(ओणम, २०१९)