हम इतिहास के निरंतर निषेध


जनाजर का ज्वर अचानक
ज्वार बनकर फूटता
हर सदी इतिहास की
दीवार है जो टूटती

मैं गिरा हूँ मत उठाओ
मैं खुद उठूँगा और चला जाऊँगा
अपनी दयाभरी आँखों से मत देखो
वे रोकती हैं मुझे मैं होने से
मुझे अपनी तरह उठने और चलने से
ऐसा क्या है क्या तुम कभी गिरे नहीं
गिर कर उठे नहीं उठ कर चले नहीं
तमाशा मत बनाओ मेरे गिरने का
कि ऐसा ही मैं रह जाऊँ
सभी मुझे मेरे मैं से छीनते
हमेशा के लिए मैं दया का पात्र बन जाऊँ

मुझे अपनी लड़ाई खुद लड़ने दो
और तुम क्यों दोगे मैं लड़ूंगा
और लड़ता भी हूँ
तुम अपनी लड़ाई लड़ो
तभी यह हमारी लड़ाई होगी
तब नहीं जब तुम हमारे लिए लड़ते
शहीदों के लिस्ट में तुम्हारा नाम
दूसरों के लिए मर गए तुम कितने महान
और हम हमारी औकात ही क्या
अपनी रोज़ की लड़ाई के नीचे दब गए
उठ न पाए हम बेचारे
रह गए सड़क के किनारे

और तुम पथप्रदर्शक अधिनायक
हम जन तुम जननायक
हम भेड़ तुम गड़ेरिया
हम गायें तुम कन्हैया
लो हुए हम नाव अब तुम खेवैया
खेते खेते बन गए तुम जनक
तो हम हुए जनित तुम्हारे हल की नोंक से
सीता तुम राम
हम सुदामा तुम घनश्याम
हम द्रौपदी
हमारी लाज हो तुम
तुम आसमान में सूर्य
हम तुम्हारी असंख्य किरणें
हम माया हैं तुम्हारी छाया हैं
तुम्हारी विविधताओं के प्रदर्शन हेतु
परिपेक्ष हैं
स्थूल हैं
तुम्हारे चरणों की धूल हैं
फूल हैं

इतिहास में तुम्हारा ही नाम रहेगा
हम अगणित अदृश्य
चाहे कह दो इतिहास हमारा
जिसके नायक तुम्हीं हो
तुम्हीं रहोगे

परंतु तुम जड़ हममें जड़ित
सारी उपमाएँ हमसे फलित
इतिहास गाते रहो डुगडुगी बजाते रहो
इतिहास की गौरव गाथा तुम्हारे लिए है
इंसान का गौरव इसी में है
कि हम सारे गर्व को मिटाते रहे हैं
इतिहास हमें नही हमें आज चाहिए
हमें सुराज नहीं
हमें सु-अराज, स्वराज चाहिए
न राज्य न आसीन राजा
न दंड न कोई दांडिक
हम आदि अंकुर सतयुग से
इतिहास के निरंतर निषेध हैं